पेट्रोल बचत का ज्ञान, सरकारी गाड़ियों में खानदान

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– डॉ. प्रियंका सौरभ
देश में जब भी पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें बढ़ती हैं, तब अचानक सरकारों, अधिकारियों और नेताओं को “ईंधन बचत” की चिंता सताने लगती है। टीवी चैनलों पर संदेश चलने लगते हैं, अखबारों में विज्ञापन छपते हैं और मंचों से जनता को समझाया जाता है कि अनावश्यक वाहन प्रयोग बंद करें, कार पूलिंग अपनाएँ, कम दूरी पैदल तय करें और राष्ट्रहित में ईंधन की बचत करें। सुनने में यह सब बहुत आदर्शवादी और जिम्मेदार लगता है, लेकिन जैसे ही आम आदमी सड़क पर उतरता है, उसे इस आदर्शवाद का दूसरा चेहरा दिखाई देने लगता है।

एक तरफ आम नागरिक पेट्रोल पंप पर हर बढ़े हुए रुपये का हिसाब लगाता है, दूसरी तरफ सरकारी गाड़ियों का काफिला सत्ता के रुतबे की तरह सड़कों पर दौड़ता दिखाई देता है। जनता को बचत का पाठ पढ़ाने वाले वही लोग अक्सर अपने परिवार की छोटी-छोटी निजी जरूरतों के लिए भी सरकारी गाड़ियों का इस्तेमाल करते देखे जाते हैं। बच्चों को स्कूल छोड़ना हो, पत्नी को बाजार जाना हो, रिश्तेदारों को लाना-ले जाना हो या निजी कार्यक्रम में शामिल होना हो—सरकारी वाहन हर समय सेवा में तैयार रहते हैं। तब जनता के मन में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि आखिर ईंधन बचाने का बोझ केवल आम आदमी के हिस्से में ही क्यों आता है?

वास्तव में यह समस्या केवल पेट्रोल या डीज़ल की नहीं है, बल्कि मानसिकता की है। हमारे यहाँ सत्ता और पद को अक्सर सेवा नहीं, विशेषाधिकार समझ लिया जाता है। जैसे ही कोई व्यक्ति बड़े पद पर पहुँचता है, उसके आसपास सुविधाओं का ऐसा घेरा बन जाता है जिसमें सरकारी संसाधनों को निजी जीवन का हिस्सा मान लिया जाता है। सरकारी गाड़ी फिर केवल प्रशासनिक कार्य का माध्यम नहीं रहती, बल्कि प्रतिष्ठा और प्रभाव का प्रतीक बन जाती है। यही कारण है कि कई बार सरकारी वाहन कार्यालय से अधिक परिवार की सुविधाओं के लिए दौड़ते दिखाई देते हैं।

विडंबना देखिए कि जिस देश में करोड़ों लोग रोज़ाना महँगे पेट्रोल के कारण अपनी यात्राएँ सीमित कर रहे हैं, वहाँ जनता के टैक्स से चलने वाली गाड़ियों का निजी उपयोग सामान्य बात मान ली जाती है। आम आदमी अपने बच्चे की फीस भरने और पेट्रोल डलवाने के बीच संतुलन बैठाता है, जबकि सत्ता के गलियारों में सरकारी ईंधन पर पारिवारिक आराम चलता रहता है। यही दृश्य जनता के भीतर असंतोष पैदा करता है, क्योंकि त्याग का उपदेश वही दे रहा होता है जो स्वयं त्याग करने को तैयार नहीं दिखता।

इतिहास गवाह है कि समाज केवल भाषणों से नहीं बदलता, उदाहरणों से बदलता है। यदि नेता और अधिकारी वास्तव में ईंधन बचत को लेकर गंभीर हैं, तो सबसे पहले उन्हें स्वयं अपने घर से शुरुआत करनी चाहिए। यदि सरकारी गाड़ियाँ केवल सरकारी कार्यों तक सीमित हो जाएँ, यदि बच्चों के स्कूल आने-जाने और शॉपिंग जैसी निजी गतिविधियों में उनका प्रयोग बंद हो जाए, तो यह किसी बड़े अभियान से अधिक प्रभावशाली संदेश होगा। जनता वही अपनाती है जो वह अपने नेतृत्व में देखती है।

आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि सत्ता और जनता के बीच नैतिक दूरी बढ़ती जा रही है। जब जनता देखती है कि उसे सादगी और बचत का पाठ पढ़ाने वाले लोग स्वयं विलासिता और विशेषाधिकार में जी रहे हैं, तब उसका विश्वास कमजोर होता है। लोकतंत्र केवल कानूनों से नहीं चलता, बल्कि नैतिक विश्वसनीयता से भी चलता है। यदि शासन करने वाले लोग स्वयं नियमों का पालन न करें, तो जनता से अनुशासन की अपेक्षा करना केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है।

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