स्वतंत्रता के बाद से आज तक बच्चों की शिक्षा और उनका विकास

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बात उन दिनों की है जब मैं चौथी – पाँचवीं कक्षा में पढ़ता था तब गुरुजन हमें भारतीय महीने, तिथि, गिनती आदि भी सिखाते थे। हम एक, दो, तीन, चार, …. भी बोलते लिखते थे तो One, Two, Three, Four, … भी बोलते लिखते थे। 1, 2, 3, 4, … भी लिखते थे तो १, २, ३, ४, .. भी। अंग्रेजी महीने जनवरी, फरवरी, मार्च, अप्रैल.. भी सिखाते थे तो भारतीय महीने चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन भी सिखाते थे। उन में पंद्रह-पंद्रह दिन के दो पक्ष शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष होते हैं। प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक कृष्ण पक्ष और प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक शुक्ल पक्ष होता है। कौन सा त्यौहार कौन से महीने के कौनसे पक्ष और कौनसी तिथि को आता है की जानकारी भी दी जाती थी।

गुरुजनों द्वारा हमें भारतीय माप तोल माशा, रत्ती, तोला, भरी, सेर, पंसेरी, धड़ी, मण, क्विंटल, गज, हाथ आदि के बारे में भी बताया जाता था। केवल गांव में ही नहीं बल्कि शहरों में भी माप तोल के देसी शब्द सुनने को मिल जाते हैं, लेकिन देखने में आता है नापतोल की जानकारी के बिना कभी-कभी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

आजकल के इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को ना तो हिंदी में गिनती लिखनी, बोलनी आती है और ना ही समझते हैं कि इसे क्या बोलते हैं। यदि उन्हें 39, 49, 59, 69, 79, 89 की संख्या पूछ ली जाए तो बता भी नहीं सकते। अफसोस नव पीढ़ी ना तो भारतीय महीनों के बारे में जानती है और ना ही तिथियों के बारे में जानती है। और तो और देखने में आया है कई बच्चे तो हिंदी में वार रविवार, सोमवार, … तक नहीं जानते। उन्हें तो Sunday, Monday, … याद है।

सुलेख (Handwriting}), श्रुतलेख (Dictation) लिखवाना, एक-एक को खड़ा करके हर बच्चे से हिंदी और इंग्लिश की पुस्तक पढ़वाना, हर बच्चे को कम से कम 40 तक पहाड़ा (Table) याद होना, जोड़ बाकी गुणा मौखिक रूप से याद होना और पूछते ही तपाक से सही जवाब देना, स्मरण शक्ति बढ़ाना जैसे मस्तिष्किय क्षमता बढ़ाने वाली, ज्ञान में वृद्धि करने वाली चीजें सिखाई जाती थी। पाव, आधा, पोना, सवा, ढाया का पहाड़ा भी सीखाते थे। एक आना, दो आना, चार आना, आठ आना, बारह आना, सोलह आना में हिसाब कैसे करते हैं भी सिखाया जाता था। वैसे यह सब चीजें पांचवी कक्षा तक पढ़ने वाले हर बच्चे को याद होती थी।

हमें प्रतिदिन प्रश्नों के उत्तर, पहाड़े आदि याद करने के लिए दिए जाते थे और दूसरे दिन कक्षा में पूछे जाते थे। यदि याद करके स्कूल ना जाते अथवा कुछ गलत काम करते तो गुरुजन हमें दंड भी देते थे। परंतु घरवाले कभी आकर बेवजह सपोर्ट नहीं लेते थे। गुरुजन भी बेवजह किसी को दंड नहीं देते थे।

एसयूपीडब्ल्यू कैंप और स्काउट के माध्यम से समाजोपयोगी कार्य करवाए जाते थे। सामुदायिक चेतना का, सेवा भावना का विकास होता था। चारित्रिक विकास के लिए नैतिक शिक्षा दी जाती थी। देश दुनिया की जानकारी के लिए प्रार्थना सभा में समाचार पत्र पढ़वाया जाता था या पढ़ कर सुनाया जाता था। शारीरिक विकास हेतु नियमित रूप से व्यायाम करवाया जाता था। बच्चों की रुचि के अनुसार हर प्रकार के खेल खिलाए जाते थे।

पर्यावरण सुरक्षा की शिक्षा दी जाती थी। जीव जंतुओं के प्रति दया भाव की शिक्षा दी जाती थी। साफ सफाई स्वच्छता की शिक्षा दी जाती थी। यहां एक-दो घटनाक्रम का उल्लेख कर रहा हूँ। कई लोग इसे मजाक मान सकते हैं कि ऐसा हो सकता है क्या?, पर यह सत्य है। अभी कुछ दिनों पूर्व मैं एक मंदिर के पार्क में बैठा था। वहां एक 20 – 22 साल का एक युवक आया। उसके हाथ में जल भरा लोटा था। पास आकर पूछता है अंकल पीपल का पेड़ कौन सा है? मुझे जल चढ़ाना है? मैं उसे गौर से देख रहा था। समझ में नहीं आया कि उस नौजवान युवक को क्या कहूँ? फिर जब पुजारी जी ने उसे पीपल के पेड़ की तरफ इशारा करते हुए बताया कि वह है पीपल का पेड़ तो वह बोला – ओह! यही है क्या पीपल का पेड़? इसी प्रकार का एक और वाकया है – एक 12 – 13 साल के बच्चे को मैंने नीम की कच्ची-कच्ची पत्तियां लाने के लिए भेजा। बड़ी अजीब स्थिति थी। पहले जाकर आया और बोला मेरे हाथ नहीं आ रही है। दोबारा भेजा तो किसी फूल के पेड़ की पत्तियां तोड़ कर ले आया और तीसरी बार भेजा तो बबूल के पेड़ की पत्तियां ले आया। बेहद चिंतनीय विषय है कि इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ने वाले हाई क्लास एजुकेशन प्राप्त बच्चों का सामान्य ज्ञान (GK) बहुत कमजोर हो चुका है।

हम जब पढ़ते थे तब स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर सबको विद्यालय में उपस्थित होना अनिवार्य था। तब विद्यालयों में स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस की तैयारियां 15 दिन पूर्व से ही होने लगती थी। देशभक्ति से ओतःप्रोत सांस्कृतिक कार्यक्रम करवाए जाते थे। देशभक्ति की शिक्षा दी जाती थी। अफसोस है आजकल शहरों की बड़ी इंग्लिश मीडियम स्कूलों में राष्ट्रीय दिवसों पर देशभक्ति कार्यक्रम आयोजित ही नहीं किए जाते हैं पर एनुअल डे पर फंक्शन आयोजित होते है क्योंकि यह भी उनके एक स्वार्थ का, लालच का, कमाई का जरिया बन गया है। शहरों में निजी स्कूलों में पढ़ने वाले प्रायः सभी बच्चों के अभिभावकों ने अपने बच्चों को स्कूल लाने ले जाने के लिए स्कूल वाहन लगवा रखे हैं। राष्ट्रीय पर्व से एक दिन पूर्व ही स्कूल प्रबंधन द्वारा बच्चों को कह दिया जाता है कल आपको लेने के लिए बस नहीं आएगी जो बच्चे स्कूल आना चाहे वह अपने पेरेंट्स के साथ आ जाएं। ध्वजारोहण के तुरंत पश्चात बच्चों को अभिभावकों के साथ वापस भेज दिया जाता है। स्थिति यह है कि आजकल बच्चों को स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस का मतलब ही पता नहीं है।

1980 के दौर में गांव की समाज सेवी संस्था द्वारा संचालित एक निजी स्कूल में 8 -10 रुपये मासिक फीस लगती थी। 20 से 25 रुपये किताबों के सेट के लगते और पचास रुपये की कॉपी एवं अन्य स्टेशनरी सामग्री खरीदते थे। यानी कुल मिलाकर अधिक से अधिक डेढ़ सौ – दो सौ रुपये वर्ष भर की पढ़ाई में खर्च होते थे और सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की मात्र 5 रुपये वार्षिक फीस लगती थी और अधिकतम सौ रुपये तक किताब कॉपी एवं अन्य सामग्री के खर्च होते थे। मध्यम वर्गीय और गरीब परिवारों के बच्चे पुरानी किताबें खरीदते थे ताकि कुछ कम पैसे लगे। कम पैसे खर्च करके भी उच्च ज्ञान प्राप्त होता था। आज भारी भरकम फीस भरकर और अन्य बेशुमार खर्चे करके भी बच्चे ज्ञान से शून्य होते जा रहे हैं।

तब बच्चे के पूर्ण रूप से शारीरिक, मानसिक, बौधिक, भावनात्मक, चारित्रिक विकास पर ध्यान दिया जाता था। बच्चे की तार्किक क्षमता को बढ़ाने पर बल दिया जाता था। सामुदायिक विकास भावना बढ़ाना, स्वावलंबी बनना आदि सीखाया जाता था अर्थात उसके सर्वांगीण विकास के प्रति ध्यान दिया जाता था तो आज क्यों नहीं दिया जाता। जब उस समय शिक्षक गण बच्चों को ऐसे सीखा समझा सकते थे तो आज भी सिखा सकते हैं और सिखाना भी चाहिए। बच्चे की पीठ पर अनावश्यक बोझ लादने की वजाय इस पर चिंतन होना चाहिए। और हां! साथ में घर में भी उसे उचित माहौल मिले। पहले हम बच्चों को वैसा माहौल मिलता था। दादा-दादी, माता-पिता, घर, परिवार, रिश्तेदार, अड़ोसी-पड़ोसी … सभी जनों के बीच में रहते थे और सबके बीच में रहकर वह जीवन व्यवहार की हर बात सीखते थे। इसलिए बच्चे को नितांत अकेला छोड़ने की बजाए उसे परिवार और समाज के बीच में रखना चाहिए ताकि वह जीवन व्यवहार की हर बात सीख सके। अस्तु स्वतंत्रता के बाद से आज तक बच्चों की शिक्षा और उनके विकास पर पुनः एक बार चिंतन जरूर है।

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