प्रधानमंत्री मोदी की विदेशी यात्राएँ भारत के लिए अर्थलाभदायक?

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-सौरभ वार्ष्णेय
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राएँ केवल औपचारिक कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने भारत की वैश्विक पहचान, आर्थिक हितों और सामरिक प्रभाव को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने का कार्य किया है। वर्ष 2014 में सत्ता संभालने के बाद से लेकर जून 2026 तक प्रधानमंत्री मोदी लगभग 100 विदेश यात्राएँ कर 78 देशों का दौरा कर चुके हैं। यह आँकड़ा स्वयं इस बात का प्रमाण है कि भारत ने बीते एक दशक में विश्व मंच पर अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राएँ पिछले एक दशक से भारतीय राजनीति और कूटनीति के केंद्र में रही हैं। समर्थकों के लिए ये यात्राएँ भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रतीक हैं, जबकि आलोचक इन्हें अत्यधिक प्रचार आधारित और महँगी कूटनीति मानते हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या इन यात्राओं से वास्तव में भारत को ठोस लाभ मिला है?
भारत की विदेश नीति आज केवल सीमाओं की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापार, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीक, रक्षा सहयोग और वैश्विक प्रभाव बढ़ाने का माध्यम भी बन चुकी है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने कार्यकाल में अमेरिका, यूरोप, खाड़ी देशों, अफ्रीका तथा हिंद महासागर क्षेत्र के देशों के साथ संबंधों को नई दिशा देने का प्रयास किया है। हाल की उनकी सेशेल्स हिंद महासागर में स्थित एक खूबसूरत द्वीपीय देश है। यात्रा भी समुद्री सुरक्षा, ब्लू इकोनॉमी और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक भूमिका को मजबूत करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इन यात्राओं का सबसे बड़ा लाभ आर्थिक क्षेत्र में दिखाई देता है। वैश्विक कंपनियों के साथ संपर्क बढऩे से भारत में निवेश आकर्षित हुआ है। डिजिटल अर्थव्यवस्था, सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और विनिर्माण क्षेत्र में भारत को नई संभावनाएँ मिली हैं। हाल के वर्षों में अनेक वैश्विक कंपनियों ने भारत में बड़े निवेश की घोषणाएँ की हैं, जिससे रोजगार और औद्योगिक विकास को गति मिलने की उम्मीद है।
रणनीतिक दृष्टि से भी भारत की स्थिति पहले की तुलना में अधिक सशक्त हुई है। हिंद महासागर क्षेत्र में भारत अपनी उपस्थिति मजबूत कर रहा है और छोटे द्वीपीय देशों के साथ रक्षा एवं समुद्री सहयोग बढ़ा रहा है। सेशेल्स को भारत निर्मित गश्ती पोत सौंपना इसी नीति का हिस्सा है।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की स्वीकार्यता भी बढ़ी है। अनेक देशों ने भारत की वैश्विक भूमिका का समर्थन किया है तथा भारत को एक उभरती महाशक्ति के रूप में देखा जाने लगा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की भारतीय दावेदारी को भी विभिन्न देशों का समर्थन प्राप्त हो रहा है।
हालाँकि, विदेश यात्राओं की सफलता का मूल्यांकन केवल स्वागत समारोहों और समझौतों की संख्या से नहीं किया जा सकता। यह भी देखना आवश्यक है कि कितने समझौते धरातल पर उतरते हैं, कितना निवेश वास्तव में आता है और उससे देश के आम नागरिक को कितना लाभ मिलता है। कुछ मामलों में व्यापारिक विवाद, वैश्विक तनाव और भू-राजनीतिक चुनौतियाँ भी भारत के सामने बनी हुई हैं।
आधुनिक विश्व व्यवस्था में सक्रिय कूटनीति किसी भी उभरती शक्ति के लिए अनिवार्य है। प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं ने भारत की अंतरराष्ट्रीय पहचान को मजबूत किया है, नए साझेदार बनाए हैं और भारत को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रभावशाली स्थान दिलाने का प्रयास किया है। लेकिन इन यात्राओं की वास्तविक सफलता का पैमाना यही होगा कि वे देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार, सुरक्षा और आम नागरिक के जीवन में कितनी सकारात्मक परिवर्तनकारी भूमिका निभाती हैं।
विदेश नीति का अंतिम उद्देश्य राष्ट्रीय हितों की पूर्ति होना चाहिए। यदि विदेश यात्राएँ निवेश, तकनीक, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक शक्ति के रूप में भारत को लाभ पहुँचा रही हैं, तो उन्हें केवल राजनीतिक दृष्टि से नहीं बल्कि राष्ट्रीय विकास की व्यापक रणनीति के रूप में देखा जाना चाहिए। भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका इसी संतुलित और परिणामोन्मुख कूटनीति पर निर्भर करेगी।

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