दीपावली : दीपों की रोशनी में कहीं धुंधला न पड़ जाए इंसानियत का उजाला

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दीपावली भारतीय संस्कृति का ऐसा महापर्व है, जिसकी रोशनी केवल घरों की देहरी और आंगन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना, पारिवारिक परंपराओं और सामाजिक जीवन को भी आलोकित करती है। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि अंधकार कितना ही गहरा क्यों न हो, विश्वास का एक छोटा-सा दीप भी उसके विरुद्ध संघर्ष का सामर्थ्य रखता है। दीपावली का वास्तविक संदेश भी यही है कि मनुष्य अपने भीतर के अज्ञान, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष और निराशा को मिटाकर ज्ञान, सद्भाव, करुणा और सकारात्मकता का प्रकाश फैलाए।
भारतीय जनमानस में दीपावली का संबंध भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात अयोध्या आगमन से जुड़ा है। जनश्रुति और सांस्कृतिक परंपरा के अनुसार, अयोध्यावासियों ने अपने आराध्य के स्वागत में दीप जलाकर पूरी नगरी को प्रकाशमय कर दिया था। तभी से दीपावली केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सत्य की विजय, मर्यादा की प्रतिष्ठा और लोकमंगल की कामना का प्रतीक बन गई। यह पर्व हमें बताता है कि सत्ता से बड़ा आदर्श होता है, वैभव से बड़ी मर्यादा होती है और विजय से अधिक महत्वपूर्ण होता है मानवीय मूल्यों का संरक्षण।
समय के साथ दीपावली मनाने के तौर-तरीकों में बदलाव आया है। पहले मिट्टी के दीपक, घरों की सजावट, पारिवारिक मिलन, पारंपरिक मिठाइयां और आपसी शुभकामनाएं इस पर्व की आत्मा हुआ करती थीं। आज बाजारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति ने इसके स्वरूप को काफी प्रभावित किया है। महंगे उपहार, आकर्षक सजावट, दिखावे की प्रतिस्पर्धा और आतिशबाजी ने उत्सव के मूल भाव को कहीं-कहीं पीछे छोड़ दिया है। प्रश्न यह नहीं कि हम उत्सव को आधुनिक क्यों बना रहे हैं, बल्कि प्रश्न यह है कि आधुनिकता की दौड़ में कहीं उसकी आत्मीयता तो नहीं खो रहे?
दीपावली की वास्तविक सुंदरता महंगे बिजली के झालरों में नहीं, बल्कि उस मिट्टी के दीपक में भी है, जिसे कोई कुम्हार पूरे परिश्रम और उम्मीद के साथ तैयार करता है। जब हम स्थानीय कारीगरों से दीपक, सजावटी वस्तुएं और हस्तनिर्मित सामग्री खरीदते हैं, तब हम केवल खरीदारी नहीं करते, बल्कि किसी परिवार की आजीविका और परंपरागत हुनर को भी संबल प्रदान करते हैं। त्योहारों की खुशियां तभी व्यापक बनेंगी, जब उनकी रोशनी समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेगी।
इस पर्व के साथ खाद्य पदार्थों की शुद्धता का प्रश्न भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। दीपावली आते ही मिठाइयों, मावे, घी, तेल, सूखे मेवों और अन्य खाद्य सामग्रियों की मांग बढ़ जाती है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि इसी बढ़ती मांग का लाभ उठाकर कुछ असामाजिक तत्व मिलावटखोरी जैसे घृणित कृत्य में संलग्न हो जाते हैं। जिस मिठाई को हम अपने प्रियजनों के प्रति स्नेह और शुभकामना के प्रतीक के रूप में भेंट करते हैं, यदि वही स्वास्थ्य के लिए खतरा बन जाए तो उत्सव की पवित्रता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
खाद्य पदार्थों में मिलावट केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है। ऐसे अवसरों पर खाद्य सुरक्षा एवं औषधि नियंत्रण विभाग तथा संबंधित प्रशासनिक एजेंसियों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। बाजारों में नियमित निरीक्षण, संदिग्ध खाद्य सामग्री के नमूने लेना, मिलावट करने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई और उपभोक्ताओं में जागरूकता आवश्यक है। राजस्थान में खाद्य सुरक्षा के लिए संचालित ‘शुद्ध के लिए युद्ध अभियान’ जैसी पहल का प्रभावी क्रियान्वयन भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण है। साथ ही उपभोक्ताओं को भी सजग रहना होगा। सस्ती और आकर्षक सामग्री के प्रलोभन में पड़ने के बजाय विश्वसनीय प्रतिष्ठानों से खरीदारी करनी चाहिए तथा किसी भी संदिग्ध खाद्य पदार्थ की सूचना संबंधित विभाग को देनी चाहिए। आखिर शुद्धता के बिना उत्सव की मिठास अधूरी है।
दीपावली के उल्लास के बीच पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अत्यधिक आतिशबाजी से वायु और ध्वनि प्रदूषण बढ़ता है। इसका प्रभाव बच्चों, बुजुर्गों, बीमार व्यक्तियों और पशु-पक्षियों पर विशेष रूप से पड़ता है। त्योहार मनाने का अधिकार सबको है, लेकिन किसी दूसरे के स्वास्थ्य, शांति और जीवन की कीमत पर नहीं। हमें ऐसी दीपावली की ओर बढ़ना चाहिए, जिसमें दीपों की चमक हो, लेकिन धुएं का अंधकार न हो; उल्लास हो, लेकिन किसी के लिए पीड़ा न हो। पर्यावरण के अनुकूल उत्सव आज समय की मांग है।
दीपावली का एक महत्वपूर्ण पक्ष आर्थिक गतिविधियों से भी जुड़ा है। इस अवसर पर छोटे दुकानदारों, कारीगरों, फूल विक्रेताओं, मिठाई निर्माताओं, वस्त्र व्यवसायियों और असंख्य श्रमिकों को रोजगार तथा आय के अवसर प्राप्त होते हैं। इसलिए हमारी खरीदारी की आदतों में स्थानीय उत्पादों और छोटे व्यापारियों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। स्वदेशी और स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहन देना केवल आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर समाज के निर्माण में हमारी भागीदारी भी है।
लेकिन दीपावली का सबसे बड़ा संदेश आर्थिक या भौतिक समृद्धि से भी आगे जाता है। हमारे आसपास ऐसे अनेक लोग हैं, जिनके घरों में अभाव का अंधकार है। किसी के पास भोजन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं, कोई बीमारी से जूझ रहा है, तो कोई अकेलेपन और पारिवारिक उपेक्षा का शिकार है। ऐसे लोगों तक सहायता, संवेदना और अपनत्व पहुंचाना ही दीपावली की सबसे बड़ी सार्थकता है। किसी जरूरतमंद परिवार को मिठाई और वस्त्र देना, किसी निराश व्यक्ति के जीवन में आशा जगाना अथवा किसी श्रमिक के श्रम का उचित सम्मान करना भी एक प्रकार से दीप प्रज्वलित करना ही है।
हमें यह भी समझना होगा कि दीपावली केवल घरों की सफाई का अवसर नहीं, बल्कि अपने विचारों और व्यवहार की समीक्षा का भी समय है। यदि हमारे मन में जाति, वर्ग, भाषा और धर्म के आधार पर भेदभाव है, यदि हमारे व्यवहार में संवेदनहीनता है और यदि हम अपने सामाजिक दायित्वों से विमुख हैं, तो लाखों दीप जलाने के बावजूद जीवन में वास्तविक प्रकाश नहीं आ सकता। सच्ची दीपावली वह है, जहां रिश्तों में विश्वास हो, समाज में सद्भाव हो, व्यवहार में शुचिता हो और प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने का अवसर मिले।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम दीपावली को केवल परंपरा के निर्वाह तक सीमित न रखें, बल्कि इसे सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाएं। बच्चों को इस पर्व का सांस्कृतिक और नैतिक महत्व बताएं, परिवारों में आत्मीयता बढ़ाएं, बाजार में शुद्धता का आग्रह करें, पर्यावरण की रक्षा करें और जरूरतमंदों की सहायता को उत्सव का अभिन्न हिस्सा बनाएं।

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