विशाखापट्टनम। पहाड़ों के बाहर जितनी खूबसूरत दुनिया दिखाई देती है, उसके भीतर भी प्रकृति ने एक अलग संसार रचा है। आंध्र प्रदेश की अराकू घाटी में स्थित बोरा केव्स इसका शानदार उदाहरण हैं। अनंतगिरी पहाड़ियों के बीच बनी ये प्राकृतिक गुफाएं अपनी चट्टानी संरचनाओं, खनिजों और उनसे जुड़ी लोक मान्यताओं के कारण पर्यटकों को आकर्षित करती हैं।
भारत सरकार की विकास संचार एवं सूचना प्रसार योजना के तहत आंध्र प्रदेश के मीडिया दौरे पर पहुंचे राजस्थान के पत्रकारों के दल ने दौरे के पांचवें दिन बोरा केव्स का भ्रमण किया। पत्र सूचना कार्यालय, जयपुर के सहायक निदेशक अमित कनौजिया की अगुवाई में पहुंचे दल ने गुफाओं की प्राकृतिक बनावट और पर्यटन से जुड़े पहलुओं को करीब से देखा।
हजारों बूंदों ने तैयार किया प्राकृतिक संसार
बोरा केव्स मूल रूप से चूना-पत्थर की प्राकृतिक गुफाएं हैं। लंबे समय तक पानी के रिसाव और बहाव ने चट्टानों पर असर डाला और धीरे-धीरे भूमिगत सुरंगों तथा विशाल कक्षों का निर्माण होता गया।
गुफा के अंदर जगह-जगह छत से नीचे की ओर लटकती संरचनाएं दिखाई देती हैं। इन्हें स्टैलेक्टाइट कहा जाता है। वहीं जमीन से ऊपर की ओर बढ़ने वाली संरचनाओं को स्टैलेग्माइट कहा जाता है। कई संरचनाएं देखने में इंसान, जानवर या पक्षियों जैसी प्रतीत होती हैं, जिससे गुफा का अनुभव और दिलचस्प हो जाता है।
1807 में सामने आई थी गुफा
बोरा गुफाओं की खोज का श्रेय 1807 में जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया से जुड़े विलियम किंग जॉर्ज को दिया जाता है। इसके बाद धीरे-धीरे इस क्षेत्र की पहचान एक महत्वपूर्ण भू-विज्ञान और पर्यटन स्थल के रूप में बनी।
वर्तमान में बोरा केव्स अल्लूरी सीताराम राजू जिले में स्थित हैं। गुफा के भीतर शिवलिंग जैसी प्राकृतिक संरचना भी मौजूद है। इसके ऊपर चट्टान से पानी की बूंदें गिरती रहती हैं। स्थानीय मान्यता में इसी क्षेत्र को गोस्थनी नदी के उद्गम से भी जोड़ा जाता है।
गुफा के अंदर खनिजों की अलग दुनिया
बोरा केव्स की चट्टानों में चूना-पत्थर के साथ कैल्साइट, अभ्रक और क्वार्टज जैसे खनिजों की मौजूदगी बताई जाती है। गुफा के भीतर चमगादड़ और गोल्डन गेको जैसे जीव भी पाए जाते हैं। काई और शैवाल की विभिन्न प्रजातियां भी यहां के वातावरण को अलग पहचान देती हैं।
पर्यटकों के लिए गुफा के अंदर प्रकाश की व्यवस्था की गई है। रोशनी पड़ने पर चट्टानों की आकृतियां और उनकी बनावट साफ दिखाई देती है। इससे गुफा के भीतर मौजूद प्राकृतिक संरचनाओं को देखने का अनुभव और बेहतर हो जाता है।
गाय से जुड़ी कहानी आज भी सुनाई जाती है
बोरा केव्स से जुड़ी एक स्थानीय आदिवासी लोककथा भी लोगों के बीच प्रचलित है। कहानी के अनुसार, एक गाय चरते समय गुफा की छत में बने छेद से नीचे गिर गई थी। गाय की तलाश में पहुंचे चरवाहे को गुफा का पता चला। अंदर जाने पर उसे शिवलिंग जैसी आकृति दिखाई दी।
हालांकि इस कहानी को स्थानीय लोककथा माना जाता है और इसका ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। फिर भी यह मान्यता बोरा केव्स से जुड़े सांस्कृतिक और धार्मिक पहलू को दर्शाती है।
बोरा केव्स की खासियत सिर्फ इसकी गुफाएं नहीं हैं। यहां भू-विज्ञान, प्राकृतिक विरासत, आदिवासी लोकविश्वास और धार्मिक आस्था एक ही जगह दिखाई देती है। यही वजह है कि अराकू घाटी आने वाले पर्यटकों के लिए यह क्षेत्र एक अलग तरह का प्राकृतिक अनुभव देने वाला प्रमुख पर्यटन स्थल बना हुआ है।



