बाल मुकुंद ओझा
पूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म दिवस 5 सितम्बर को हर साल शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन समाज और देश के विकास में शिक्षकों के योगदान पर प्रकाश डाला जाता है। आज देश में शिक्षा और शिक्षक की भूमिका पर नित नये प्रयोग चल रहे है। अनेक संगठनों ने शिक्षा की गति और दुर्गति पर सवाल उठाये है। आज़ादी के 80 साल बाद भी शिक्षा और शिक्षक को लेकर देशवासी भ्रमित है। पांच सितम्बर को हम सदा की भांति शिक्षक दिवस मना रहे है तो जेहन में अनेक सवाल खड़े होना लाजमी है। यह सच है हमारी शिक्षा प्रणाली तेजी से आधुनिक और तकनीकी रूप लेती जा रही है, जिससे ज्ञान और विज्ञान के अवसरों में तो बढ़ोतरी हुई है मगर संस्कार के क्षेत्र में हम पिछड़ गए है। सड़कों पर आज जिस प्रकार के प्रदर्शन हो रहे है, और जिस प्रकार के नारे लग रहे है वे शिक्षा की गति और प्रगति के साथ दुर्गति पर प्रकाश डाल रहे है। इस दौरान छात्रों के नैतिक, सामाजिक और मानसिक विकास से जुड़ी चुनौतियां भी सामने आई हैं। स्कूलों पर प्रदर्शन हो रहे है। शिक्षक की कार्यप्रणाली को खंगाला जा रहा है। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश और राजस्थान में सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश, फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, साक्षात्कार और लाइव स्ट्रीमिंग पर लगे प्रतिबंधों को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। यहाँ तक तो ठीक है मगर ऐसी नया स्थिति उत्पन्न हो गई की संगठनों को शिक्षा संस्थाओं पर नारे बाज़ी और आंदोलन की नौबत आ गई। इन सवालों के जवाब में ही शिक्षा और शिक्षक की भूमिका तलाशी जाने की जरुरत है।
भारत में गुरूकुल की शिक्षा को आज भी याद किया जाता है। गुरूकुल की शिक्षा में हमारे आपसी सम्बन्धों, सामाजिक सांस्कृतिक एकता, गौरवशाली परम्पराओं को प्रमुखता से केन्द्र बिन्दु में रखा जाता था ताकि बालक पढ़ लिखकर चरित्रवान बने और उसमें नैतिक संस्कारों का समावेश हो। गुरुकुल शिक्षा का आधार, संस्कारों की बुनियाद है। संस्कारों के बिना सार्थक शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती। गुरुकुल शिक्षा अंधेरे से प्रकाश की यात्रा है तथा संस्कार हमारी जीवन-शैली हैं। संस्कार हमें दिशा बोध के साथ-साथ कर्त्तव्यों का भी बोध कराते हैं। मगर आज की शिक्षा प्रणाली संस्कारों से हट कर अंक प्राप्ति तक सीमित हो कर रह गई है। आज ज्ञान विज्ञान का स्थान अंक अर्जित करने पर अधिक हो गया है।
हमारे समाज में संस्कारित शिक्षा को लेकर बड़ी बड़ी बातें की जाती है। लोग गुरुकुल की शिक्षा को याद करते हुए यह कहने से नहीं चूकते कि आज देश में असहिष्णुता के बढ़ते वातावरण और महिलाओं को लेकर जो कुछ भी घटित हो रहा है वह हमारी बुनियादी शिक्षा की कमजोरियों को इंगित करती है। हम लाख भाषण और चर्चा करें मगर जब तक हमारी शैक्षिक बुनियाद शुरू से ही मज़बूत नहीं होंगी तब तक समाज में घटित होने वाली लोमहर्षक घटनाओं पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता। आज शिक्षक दिवस पर हमें इन्हीं सब बातों पर मंथन की जरुरत है। डॉ राधाकृष्णन छात्रों को लगातार प्रेरित करते थे कि वे उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतारें। वे जिस विषय को पढ़ाते थे, पढ़ाने के पहले स्वयं उसका अच्छा अध्ययन करते थे। दर्शन जैसे गंभीर विषय को भी वे अपनी शैली की नवीनता से सरल और रोचक बना देते थे। उनकी मान्यता थी कि यदि सही तरीके से शिक्षा दी जाए तो समाज की अनेक बुराइयों को मिटाया जा सकता है। उनका मानना था कि करूणा, प्रेम और श्रेष्ठ परंपराओं का विकास भी शिक्षा के उद्देश्य हैं। वे कहते थे कि जब तक शिक्षक शिक्षा के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं होता और शिक्षा को एक मिशन नहीं मानता तब तक अच्छी व उद्देश्यपूर्ण शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती।
पांच सितम्बर के दिन हमें डॉ राधाकृष्णन के विचारों के अनुरूप देश को ढालने और मजबूत बनाने की आवश्यकता है। संस्कारित, नैतिक और चरित्रवान समाज के निर्माण के उनके सपने को पूरा करने की जिम्मेदारी शिक्षकों के साथ साथ समाज की भी है। लेकिन सबसे पहले हमें आज की हमारी बुनियादी शिक्षा पर विचारने की जरुरत है। जब तक हमारी बुनियाद मजबूत नहीं होगी तब तक देश को मजबूत बनाने की बात कोरी कल्पना होगी। हमें यह देखना होगा कि हम किस प्रकार की शिक्षा अपने नौनिहालों को दे रहे और देना चाहते है जिनके बूते देश और समाज के दिशा निर्धारण की बात करते हैं। शिक्षक समाज की आधारशिला है। किसी राष्ट्र के वास्तविक निर्माता उस देश के शिक्षक होते हैं। शिक्षक निश्चय ही समाज और राष्ट्र के भविष्य का निर्धारण करते है इसमें कोई दो राय नहीं है मगर आज के दिन हमें बिना लाग लपेट के शिक्षा की वर्तमान दशा और दिशा पर भी चिंतन और मंथन करने की जरुरत है।

गुरुकुल से लेकर आधुनिक शिक्षा के सफर में शिक्षक की भूमिका
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