आज़ादी का मतलब मनमानी नहीं, जिम्मेदारी है

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-बाल मुकुंद ओझा
15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ था। लाखों देशवासियों ने कुर्बानियां देकर आजादी प्राप्त की थी तब जाकर यह हमें प्राप्त हुई है। 15 अगस्‍त 2026 को आजाद भारत 79 साल का हो जाएगा। हमारे-आपके बीच बहुत से ऐसे लोग भी हैं, जिनके लिए आजादी का मतलब मनमानी और स्वच्छंदता है। कानून कायदे और स्थापित नियम तोड़ना हमारा शगल बन चुका है। चौराहों पर ट्रैफिक नियमों के पालन की बात हो चाहे बंद रेलवे क्रॉसिंग से झुककर निकलने की । ट्रेन निकलने का इंतजार करने के बजाय लोग बाइक और साइकिलों को झुकाकर बैरियर के नीचे निकलने में कोई संकोच नहीं करते हैं। सड़क पर दौड़ने वाले वाहनों पर भी कार्रवाई का कोई खौफ नहीं है। जहां मर्जी हुई खड़ा कर दिया। राह चलते पीक थूकना आम बात है। कुछ खा रहे है तो उसे भी सड़क पर फेंकना अपनी शान समझते है। लड़की दिख गयी तो टिक्का टिप्पणी करने से नहीं चूकेंगे। अव्यवस्थाओं के लिए हम सिस्टम के सिर दोष मढ़ते-मढ़ते थक जाते हैं, लेकिन कभी खुद के गिरेबां में झांक कर देखने की जरूरत नहीं समझते। यह सोचने विचारने की बात है कि क्या इसी दिन के लिए देश आजाद हुआ था कि देशवासी मनमानी करें। हम अपने दिल पर हाथ रखकर मंथन करें क्या यही आजादी के मायने हैं। क्या हाथ में सविधान की प्रति लहराकर संसद ठप्प करना आज़ादी है। हम इस बहुमूल्य आजादी का वास्तविक अर्थ भूलते जा रहे। गरीबी, शोषण, बीमारी और भेदभाव से मुक्ति की बातें भाषणों और कागजों में दफ़न हो रही है। इन बुनियादी समस्याओं को हल करने के स्थान पर हम आपसी मतभेदों में उलझ कर रह गए है। आज लोग आज़ादी के मनमाने अर्थ निकाल रहे है। कुछ लोग कहते है हमें मोदी से आज़ादी चाहिए तो कुछ कहते है भ्रष्टाचार ,तुष्टिकरण और वंशवाद से आज़ादी चाहिए। आज़ादी के 79 साल पूरे होने के बाद हम यह कह सकते हैं युवा को रोजगार मिला या नहीं मगर हाथ में मोबाइल अवश्य आ गया है। देश की प्रगति और विकास का सही अर्थों में लेखाजोखा ले तो आज भी हम गरीबी, बेकारी, महंगाई और भ्रष्टाचार का राग अलाप रहे है। हम कहने को कह सकते है कि हमने सुई से जहाज तक का सफर पूरा कर लिया है। मगर पिछले पचास सालों पर नज़र डालें तो ज्ञात होगा आज भी हम उन्हीं मुद्दों के इर्द गिर्द अपना ताना बाना बुन रहे है जो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी के कांटे के रूप में चुभ रहे है। इंदिरा गाँधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था और आज भी हम गरीबी के खिलाफ संघर्ष में उलझे हुए है। हाँ, गरीबों को मुफ्त अनाज जरूर बांट रहे है। कहने का तात्पर्य है 50 सालों में इन्हीं मुद्दों के इर्द गिर्द हमारी आज़ादी घूम फिर रही है। युवाओं के लिए रोजगार की बाते गौण हो गई है। गरीब के लिए रोटी ,कपड़ा और मकान की बात दोयम हो गई है। महिलाओं की स्वतंत्रता कागजों में दफन हो रही है। सरकारी नौकर के लिए आजादी का अर्थ जेब भरना है। देश और समाज का हर पक्ष अपनी अपनी बात पर ढृढ़ता से कायम है। अपने कुर्ते को दूसरे के कुर्ते से अधिक उजला बताया जा रहा है। भ्रष्टाचार की विष बेल लगातार बढ़ती ही जा रही है। सहिष्णुता को कुश्ती का अखाडा बना लिया गया है। परस्पर समन्वय, प्रेम, भातृत्व और सचाई को दर किनार कर घृणा और असहिष्णुता हम पर हावी हो रही है। आजादी के दीवाने चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, तिलक, गाँधी, नेहरू, पटेल और लोहिया के सिद्धांतों और विचारों के अपने अपने हित में अर्थ निकाले जा रहे है। आजादी के बाद कई दशकों तक सत्तासीन लोग सत्तासुख को अब तक नहीं भूल पाए है और राज करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान रहे है। वहीँ नए सत्तासुख पाने वाले देश को असली आजादी और लोकतंत्र का धर्म सिखा रहे है। साम्प्रदायिकता को लेकर देश दो फाड् हो रहा है। सेकुलर शब्द की नयी नयी परिभाषाएँ गढ़ी जा रही है। दल बदलते ही कल के सेकुलर आज के सांप्रदायिक हो जाते है और सांप्रदायिक रातों रात सेकुलर बन जाते है। बलिहारी है भारत के लोकतंत्र की, इन सब के बावजूद गाँधी की दुहाई के साथ देश आगे बढ़ता जा रहा है। हमारे देश में आजादी के अर्थ समय के साथ बदलते रहे है। सबने अपने-अपने ढंग से आजादी का मतलब निकाला है। गरीब आदमी के लिए आजादी का अर्थ गरीबी से आजादी है। अशिक्षित व्यक्ति के लिए आजादी का अर्थ अशिक्षा से आजादी है। राजनीतिक दलों के लिए आजादी का मतलब सत्ता प्राप्ति है।

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