आजादी के आठ दशक : लोकतंत्र की जड़ें गहरी हुईं, चुनौतियां भी कम नहीं

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-राजेश जैन
भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। आजादी के आठ दशक केवल कैलेंडर के पन्नों पर बीते वर्ष नहीं हैं, बल्कि यह उस लोकतांत्रिक प्रयोग की लंबी यात्रा है, जिसमें एक गरीब, विविधतापूर्ण और नवस्वतंत्र देश ने अपने नागरिकों को बराबरी का अधिकार, मतदान की ताकत और सरकार चुनने का अवसर दिया। 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब दुनिया के कई पर्यवेक्षकों को संदेह था कि इतनी भाषाओं, धर्मों, जातियों, संस्कृतियों और आर्थिक विषमताओं वाला देश लोकतंत्र को लंबे समय तक संभाल पाएगा या नहीं। आज आठ दशक बाद भारत का लोकतंत्र न केवल कायम है, बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुका है।

हमारे लोकतंत्र की बुनियादी ताकत

आजादी के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ राष्ट्र निर्माण नहीं थी, बल्कि नागरिकों को यह विश्वास दिलाना भी था कि सत्ता जनता की है। संविधान ने इस विश्वास को संस्थागत रूप दिया। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का फैसला उस समय असाधारण था, जब देश का बड़ा हिस्सा निरक्षर था और गरीबी व्यापक थी। भारत ने नागरिकों से यह नहीं पूछा कि वे कितने पढ़े-लिखे हैं, कितने संपन्न हैं या किस सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं। हर वयस्क को एक वोट मिला। यही भारतीय लोकतंत्र की बुनियादी ताकत बनी।

इन आठ दशकों में हमने चुनावों को सत्ता परिवर्तन का शांतिपूर्ण माध्यम बनते देखा। केंद्र से लेकर राज्यों तक कई सरकारें बदलीं। एक दल का लंबे समय तक प्रभुत्व रहा तो उसके बाद गठबंधन राजनीति का दौर आया। क्षेत्रीय दलों ने राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित किया और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों, दलितों, आदिवासियों और महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी। पंचायतों और स्थानीय निकायों में आरक्षण ने लोकतंत्र को गांवों और कस्बों तक पहुंचाया। यह लोकतंत्र की गहरी होती जड़ों का संकेत है।

भारत ने आर्थिक मोर्चे पर भी लंबी दूरी तय की है। खाद्यान्न संकट से आत्मनिर्भरता तक, लाइसेंस-परमिट राज से उदारीकरण तक और नकदी आधारित अर्थव्यवस्था से डिजिटल भुगतान तक की यात्रा असाधारण रही है। अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा, सूचना प्रौद्योगिकी, फार्मा, स्टार्टअप और डिजिटल सार्वजनिक इंफ्रस्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में भारत ने दुनिया को अपनी क्षमता दिखाई है। करोड़ों लोगों को बैंकिंग, मोबाइल और इंटरनेट से जोड़ने ने आर्थिक और सामाजिक जीवन को बदल दिया है। सड़क, रेल, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे में भी उल्लेखनीय विस्तार हुआ है।

भारतीय लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती

लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा उपलब्धियों की सूची से नहीं होती। उसकी परीक्षा इस बात से होती है कि सत्ता में बैठे व्यक्ति और संस्थाएं नागरिक के अधिकारों के साथ कैसा व्यवहार करती हैं। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। चुनाव लोकतंत्र का जरूरी हिस्सा हैं, पूरा लोकतंत्र नहीं। लोकतंत्र की आत्मा संसद की बहस, स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष संस्थाओं, स्वतंत्र मीडिया, असहमति के सम्मान और नागरिक स्वतंत्रताओं में बसती है।

यहीं से हमारी चिंता शुरू होती है। आज भारतीय लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक ध्रुवीकरण है। विचारों का मतभेद लोकतंत्र की खूबसूरती है, लेकिन मतभेद जब दुश्मनी में बदल जाए तो लोकतांत्रिक संवाद कमजोर पड़ने लगता है। सोशल मीडिया ने नागरिकों की आवाज को अपूर्व ताकत दी है, लेकिन इसी माध्यम ने फेक न्यूज, दुष्प्रचार और भावनात्मक उन्माद को भी तेजी से फैलाने की क्षमता पैदा की है। सूचना की बाढ़ के बीच सत्य की पहचान कठिन होती जा रही है। लोकतंत्र के लिए यह नई चुनौती है, क्योंकि जागरूक मतदाता के बिना चुनाव तो हो सकते हैं, लेकिन स्वस्थ लोकतंत्र नहीं।

संसद की भूमिका पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। संसद सिर्फ कानून पारित करने की मशीन नहीं है। वह राष्ट्रीय विमर्श का सर्वोच्च मंच है, जहां सरकार से सवाल पूछे जाते हैं, नीतियों की समीक्षा होती है और विपक्ष जनता की चिंताओं को आवाज देता है। जब संसद में बहस कम होती है और राजनीतिक टकराव अधिक दिखाई देता है, तब लोकतांत्रिक संस्थाओं की गुणवत्ता प्रभावित होती है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में जीत और हार स्थायी नहीं होती, लेकिन संस्थाओं की प्रतिष्ठा लंबे समय तक रहती है।

मीडिया भी लोकतंत्र का महत्वपूर्ण प्रहरी है। तकनीक ने पत्रकारिता को व्यापक पहुंच दी है, लेकिन आर्थिक दबाव, राजनीतिक प्रभाव, टीआरपी और डिजिटल क्लिक की दौड़ ने पत्रकारिता के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं। लोकतंत्र में मीडिया का काम केवल सत्ता की प्रशंसा या विरोध करना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना और जनता को तथ्य उपलब्ध कराना है। आलोचना को राष्ट्रविरोध मान लेना और हर आलोचना को राजनीतिक विरोध समझ लेना; दोनों ही लोकतांत्रिक सोच के लिए खतरनाक हैं।

अवसरों की बराबरी अभी अधूरी

इसके साथ सामाजिक और आर्थिक असमानता का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। संविधान ने बराबरी का अधिकार दिया, लेकिन वास्तविक जीवन में अवसरों की बराबरी अभी अधूरी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और न्याय तक पहुंच में असमानता लोकतंत्र की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। यदि एक नागरिक के पास वोट तो है, लेकिन उसके पास गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सम्मानजनक रोजगार और न्याय तक पहुंच नहीं है, तो लोकतंत्र की औपचारिक समानता वास्तविक समानता में तब्दील नहीं हो पाती।

युवाओं की आकांक्षाएं भी लोकतंत्र के सामने एक नई कसौटी हैं। भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में है। यह युवा केवल रोजगार नहीं चाहता; वह अवसर, पारदर्शिता, सम्मान और अपनी आवाज की सुनवाई चाहता है। परीक्षा प्रणाली, भर्ती प्रक्रिया, पेपर लीक, बेरोजगारी और प्रतियोगिता के बढ़ते दबाव जैसे मुद्दे सिर्फ प्रशासनिक समस्याएं नहीं हैं। ये नागरिक और राज्य के बीच भरोसे से जुड़े सवाल हैं। सरकारों की सबसे बड़ी पूंजी आर्थिक संसाधन नहीं, जनता का विश्वास होता है। एक बार यह विश्वास कमजोर हुआ तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की चमक भी फीकी पड़ने लगती है।

लोकतंत्र को अगले चरण के लिए तैयार करना होगा

आठ दशक की यात्रा में हमने देश को बदल दिया है, लेकिन अब लोकतंत्र को भी अगले चरण के लिए तैयार करना होगा। हमें ऐसे लोकतंत्र की जरूरत है, जहां चुनाव अधिक पारदर्शी हों, राजनीतिक दलों के भीतर भी लोकतंत्र मजबूत हो, संसद में सार्थक बहस हो, संस्थाएं राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर काम करें, मीडिया तथ्य और स्वतंत्रता के साथ खड़ा रहे और नागरिक असहमति व्यक्त करने से न डरें।

आजादी की 80वीं वर्षगांठ पर सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि हमने क्या-क्या हासिल किया। सवाल यह होना चाहिए कि हमने लोकतंत्र को कितना गहरा किया। सड़कें, पुल, एक्सप्रेसवे, डिजिटल नेटवर्क और आर्थिक विकास राष्ट्र की ताकत हैं, लेकिन नागरिक का भरोसा लोकतंत्र की असली ताकत है।
1947 में हमने राजनीतिक आजादी हासिल की थी। 2026 में चुनौती यह है कि उस आजादी को संस्थागत मजबूती, सामाजिक न्याय, आर्थिक अवसर और नागरिक गरिमा में बदलें। आठ दशक की यात्रा हमें गर्व करने का कारण देती है, लेकिन आत्मसंतोष का नहीं। दरअसल, लोकतंत्र कोई ऐसी इमारत नहीं है, जिसका निर्माण एक बार पूरा हो जाए। अपने सवालों से, अपनी असहमति से, अपने मत से और सबसे बढ़कर, संविधान में अपने विश्वास से इसे हर पीढ़ी को फिर से बनाना पड़ता है।

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