खुशहाली, सौभाग्य और प्रेम का पर्व है हरियाली तीज

ram

बाल मुकुंद ओझा
सावन महाशिवरात्रि के बाद हरियाली तीज का बड़ा महत्व है। इसे श्रावणी तीज भी कहा जाता है। पंचांग के अनुसार, इस साल सावन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का प्रारंभ 14 अगस्त को शाम 6 बजकर 46 मिनट पर होगा। वहीं इस तिथि का समापन 15 अगस्त को शाम 5 बजकर 28 मिनट पर हो जाएगा। ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, इस साल हरियाली तीज का व्रत 15 अगस्त को रखा जाएगा। भारत तीज त्योहारों का देश है। हमारी संस्कृति तीज-त्योहारों, पर्व-उत्सवों से सजी है। सावन महीने को पूजा-पाठ और व्रत के लिए सबसे उत्तम मास माना जाता है। हरियाली तीज का त्योहार उत्तर भारत में बड़े ही धूम धाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। उत्तर भारत की विवाहित महिलाओं के बीच यह लोकप्रिय त्योहार में से एक है। तीज अखंड सौभाग्य और परिवार की खुशहाली के लिए किया जाता है। हरियाली तीज सुहाग का पर्व है। धर्म ग्रंथों के अनुसार सावन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरियाली तीज का पर्व मनाया जाता है। इस बार ये पर्व 15 अगस्त को है। सावन महीने में हरियाली तीज को लेकर महिलाओं में उत्साह देखते ही बनता है। महिलाएं इस दिन माता पार्वती की पूजा अर्चना कर उनसे अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मांगती हैं। पौराणिक मान्यता है इस व्रत को करने से वैवाहिक जीवन भी खुशहाल बना रहता है।यह पर्व महिलाओं के सबसे प्रिय पर्वों में से एक है। इस दिन सुहागन महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए और कुंवारी युवतियां अपने मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए तीज का व्रत रखती हैं। तीज का व्रत सबसे कठिन व्रतों में से एक माना गया है। इस व्रत का विशेष पुण्य प्राप्त होता है। यह व्रत दांपत्य जीवन को खुशहाल बनाता है।
मान्यता है इस दिन घर की साफ-सफाई कर अच्छे से सजाना चाहिए। पूजा शुरू करने से पहले एक चौकी पर मिट्टी में गंगा जल मिलाकर शिवलिंग, भगवान गणेश, माता पार्वती की प्रतिमा बनाएं। इसके बाद एक थाली में सुहाग की सामग्री जिसमें बिंदी, सिंदूर, चूड़ी, मेहंदी, नेल पॉलिश, अक्षत, धूप, दीप, गंधक आदि सजाकर अर्पित करें। भगवान शिव को उनकी प्रिय चीजों का भोग लगाकर शिव और पार्वती की आरती करनी चाहिए।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस तिथि को ही भगवान शिव और माता पार्वती का दोबारा मिलन हुआ था, इसलिए हरियाली तीज का महत्व अत्यधिक है। इस व्रत में भगवान शिव-मां पार्वती का पूजन किया जाता है। इस दिन महिलाएं विशेष तौर पर हरी साड़ी, हरे रंग की चूड़ी और सोलह श्रृंगार करती हैं। इस दिन देश के अनेक स्थानों पर युवतियां झूले भी झूलती हैं। इस पर्व पर सावन के महीने में जब प्रकृति अपने ऊपर हरियाली की चादर चढ़ा लेती हैं, तो इस मनोरम क्षण का आनंद लेने के लिए महिलाएं लोक गीत जाती हैं।
कथा के अनुसार माता गौरी ने पार्वती के रूप में हिमालय के घर पुनर्जन्म लिया था। माता पार्वती बचपन से ही शिव को वर के रूप में पाना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने कठोर तप किया। एक दिन नारद जी पहुंचे और हिमालय से कहा कि पार्वती के तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उनसे विवाह करना चाहते हैं। यह सुन हिमालय बहुत प्रसन्न हुए। दूसरी ओर नारद मुनि विष्णुजी के पास पहुंच गए और कहा कि हिमालय ने अपनी पुत्री पार्वती का विवाह आपसे कराने का निश्चय किया है। इस पर विष्णुजी ने भी सहमति दे दी।
नारद इसके बाद माता पार्वती के पास पहुंच गए और बताया कि पिता हिमालय ने उनका विवाह विष्णु से तय कर दिया है। यह सुन पार्वती बहुत निराश हुईं और पिता से नजरें बचाकर सखियों के साथ एक एकांत स्थान पर चली गईं और सुनसान जंगल में पहुंचकर माता पार्वती ने एक बार फिर तप शुरू किया। उन्होंने रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और उपवास करते हुए पूजन शुरू किया। भगवान शिव इस तप से प्रसन्न हुए और मनोकामना पूरी करने का वचन दिया। इस बीच माता पार्वती के पिता पर्वतराज हिमालय भी वहां पहुंच गए। वह सत्य बात जानकर माता पार्वती की शादी भगवान शिव से कराने के लिए राजी हो गए। शिव कहते हैं, ’हे पार्वती! तुमने जो कठोर व्रत किया था उसी के फलस्वरूप हमारा विवाह हो सका। इस व्रत को निष्ठा से करने वाली स्त्री को मैं मनोवांछित फल देता हूं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *