सावन : शिव भक्ति, श्रद्धा और साधना का पावन पर्व

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-सुनील कुमार महला
3 अगस्त को श्रावण मास का पहला सोमवार है। श्रावण मास भगवान शिव की उपासना/आराधना और व्रत के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।श्रद्धालु व्रत-उपवास, पूजा-अर्चना, रुद्राभिषेक, जलाभिषेक तथा कांवड़ यात्रा के माध्यम से भगवान भोलेनाथ के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि सावन/श्रावण मास भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और प्रकृति के अद्भुत समन्वय का प्रतीक है।सावन का महीना प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देता है। वर्षा ऋतु में धरती हर तरफ हरियाली से आच्छादित हो जाती है, नदियाँ और जलस्रोत भर जाते हैं तथा कृषि कार्य अपने चरम पर होता है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में इस समय वृक्षारोपण, जल संरक्षण और प्रकृति के सम्मान को विशेष महत्व दिया गया है। यह वह महीना है जब हमारे देश में स्थान-स्थान पर अनेक धार्मिक उत्सवों और मेलों का आयोजन होता है। ये उत्सव, मेले व सांस्कृतिक आयोजन समाज में एकता, सहयोग और सांस्कृतिक समरसता को बढ़ावा देते हैं। संयम, सात्विक आहार, आत्मानुशासन और सेवा-भाव जैसे जीवन-मूल्य भी इसी मास की विशेष पहचान है।शिव परम चेतना हैं। संस्कृत में ‘शिव’ शब्द का अर्थ है- जो कल्याणकारी हैं, मंगलकारी हैं, शुभ हैं, और हितकारी हैं। वास्तव में, शिव शांति और अद्वैत (एकत्व) का स्वरूप हैं। इसीलिए संस्कृत में बड़े ही खूबसूरत शब्दों में कहा गया है-‘शिवं शान्तमद्वैतम्।’

शिव पुराण के अनुसार-‘शिव परब्रह्म हैं।वे अनादि (जिनका आदि नहीं), अनंत (जिनका अंत नहीं) हैं।सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार—तीनों का मूल कारण वही हैं। कुछ प्रसंगों में तो ब्रह्मा और विष्णु भी शिव से प्रकट हुए बताए गए हैं। शिव निराकार भी हैं और भक्तों के लिए साकार रूप भी धारण करते हैं।शिवलिंग उनके अनंत, निराकार स्वरूप(सगुण और निर्गुण दोनों) का प्रतीक माना गया है। सरल शब्दों में कहें तो शिव ही सृष्टि हैं, शिव ही पालनकर्ता हैं और शिव ही संहारकर्ता हैं। शिव योग विज्ञान के प्रथम गुरु हैं। ये शिव ही हैं, जिन्होंने सप्तऋषियों को योग का ज्ञान दिया।मान्यता है कि कांतिसरोवर (केदारनाथ के पास) तट पर शिव ने अपना ज्ञान सप्तऋषियों (सात ऋषियों) को दिया था। सरल शब्दों में कहें तो वे योगेश्वर या यूं कहें कि प्रथम योगी (आदियोगी) हैं, जिन्होंने मानव सभ्यता को योग, ध्यान और आत्म-ज्ञान का मार्ग दिखाया। ‘शिव’ का अर्थ है-‘जो नहीं है।’ अर्थात वह शून्यता जिससे समस्त सृष्टि उत्पन्न होती है। सच तो यह है कि शिव असीम संभावनाओं और पूर्ण चेतना का प्रतीक हैं। शिव पूर्ण मौन, ध्यान और साक्षीभाव के प्रतीक हैं।उनका तांडव जीवन की ऊर्जा और परिवर्तन का प्रतीक है। वे संसार से भागने वाले नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए पूर्ण जागरूकता का संदेश देते हैं।शिव केवल एक देवता नहीं, बल्कि चेतना, कल्याण, मौन, योग और आत्मबोध के सर्वोच्च प्रतीक हैं। वे देवों के देव-‘ महादेव’ हैं।भक्ति परंपरा उन्हें महादेव और परमेश्वर मानती है। वहीं पर योग परंपरा उन्हें आदियोगी मानती है। दार्शनिक परंपरा उन्हें परम चेतना या ब्रह्म का प्रतीक मानती है। शिव स्वयंभू’ (जो स्वयं प्रकट हुए हों) हैं।

हम सभी यह जानते हैं कि सावन में शिवलिंग पर जल और बेलपत्र चढ़ाने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं, लेकिन यहां प्रश्न यह उठता है कि आखिर सावन मास में ही भगवान शिव का जलाभिषेक क्यों होता है ? तो यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि सावन के महीने में ही समुद्र मंथन हुआ था, जिसमें से महाविनाशकारी ‘हलाहल’ विष निकला था। कहते हैं कि जब महादेव ने सृष्टि की रक्षा के लिए इस विष को अपने कंठ में धारण किया, तो उनके शरीर का तापमान अत्यधिक बढ़ गया और कंठ नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए। विष की ज्वाला और ताप को शांत करने के लिए सभी देवताओं ने भगवान शिव को जल और औषधियां अर्पित कीं। वास्तव में,सावन की वर्षा और जल चढ़ाने की परंपरा इसी घटना से जुड़ी है ताकि महादेव के शरीर को शीतलता मिले। सावन का महीना रुद्र रूप के उस पक्ष को दर्शाता है जो संहार के बाद पुनर्गठन और नवजीवन लाता है। शास्त्रों के अनुसार, भीषण गर्मी से जब हमारी पृथ्वी तप रही होती है,तो सावन में जब शिवजी जल ग्रहण करते हैं, तो वे प्रसन्न होकर पृथ्वी पर वर्षा के रूप में अपनी कृपा बरसाते हैं।वायु पुराण के अनुसार, सावन के दौरान जल की हर बूंद में ‘रुद्र’ का अंश माना जाता है, जो प्रकृति का पुनर्जन्म करता है।यह भी मान्यता है कि सावन में भगवान शिव ही ‘सृष्टि का भार’ संभालते हैं, जैसा कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) को भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा (क्षीरसागर) में चले जाते हैं। सावन के महीने में महादेव पृथ्वी लोक के सबसे करीब होते हैं और अपने भक्तों की पुकार तुरंत सुनते हैं। सावन मास में भगवान शिव को बेलपत्र अर्पित किया जाता है। दरअसल ,बेलपत्र का त्रिकोण और वैज्ञानिक पहलू है। बेलपत्र के तीन पत्ते शिवजी के तीन नेत्रों, तीन गुणों (सत्व, रज, तम) और त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का प्रतीक हैं। बेलपत्र में प्राकृतिक रूप से विषैले तत्वों को सोखने और शीतलता प्रदान करने के गुण होते हैं। यही कारण है कि विष के प्रभाव को कम करने के लिए जल के साथ-साथ बेलपत्र भी अर्पित किया गया था। यहां पाठकों को यह भी बताता चलूं कि लोग सावन के सोमवार को केवल एक वार मानकर व्रत रखते हैं, लेकिन ‘सोम’ का अर्थ इससे कहीं अधिक व्यापक है। सोम का मतलब है चन्द्रमा और हम सभी जानते हैं कि भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा विराजमान हैं, जो मन की शांति और शीतलता का प्रतीक हैं।सावन मास में कांवड़ यात्रा का भी विशेष महत्व माना गया है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि पहली कांवड़ यात्रा भगवान परशुराम जी ने की थी। उन्होंने पहली बार कांवड़ में गंगाजल लाकर भगवान शिवजी का अभिषेक किया था। एक अन्य कथा के अनुसार, लंकापति रावण (जो शिवजी का महान भक्त था) ने समुद्र मंथन के विष से पीड़ित शिवजी को राहत देने के लिए पुरा महादेव (गढ़मुक्तेश्वर/बागपत) में कांवड़ से गंगाजल लाकर चढ़ाया था।

अंत में यही कहूंगा कि सावन केवल धार्मिक रीती-रिवाजों का महीना नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, भक्ति और स्वयं के भीतर की ऊर्जा को संतुलित करने का एक सूक्ष्म आध्यात्मिक विज्ञान है।सावन का महीना आत्मशुद्धि, संयम, प्रकृति-प्रेम और लोककल्याण का भी संदेश देता है। सावन हमें सिखाता है कि शिव की भक्ति का वास्तविक अर्थ सत्य, करुणा, सेवा, धैर्य और आत्मसंयम को जीवन में अपनाना है। यदि हम इन मूल्यों को अपने आचरण का हिस्सा बना लें, तो यही सावन का सबसे बड़ा फल और भगवान शिव के प्रति सच्ची श्रद्धा होगी।

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