-करीना थायत
भारत विकास और आर्थिक प्रगति की नई इबारत लिखने की बात करता है। लेकिन इस विकास का अर्थ तभी पूरा होगा, जब गांव की महिलाएं और किशोरियां भी अपने अधिकारों, अवसरों और फैसलों पर बराबरी की हिस्सेदार बनें। किसी देश की प्रगति केवल शहरों की चमक से नहीं, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि गांव की महिलायें और किशोरी कितनी सुरक्षित, शिक्षित, आत्मनिर्भर और सम्मानजनक जीवन जी पा रही है।
नारी सशक्तिकरण का अर्थ केवल आर्थिक रूप से सक्षम होना नहीं है। इसका अर्थ है अपने जीवन से जुड़े फैसले लेने की स्वतंत्रता, शिक्षा और रोजगार तक समान पहुंच, सार्वजनिक जीवन में भागीदारी और सम्मान के साथ जीने का अधिकार है। जब कोई महिला बिना डर के अपनी बात रख सके, अपने बच्चों की शिक्षा का निर्णय ले सके, अपनी आजीविका चुन सके और समाज में सम्मान के साथ जी सके, तभी सशक्तिकरण अपने वास्तविक अर्थों में दिखाई देता है।
पिछले कुछ दशकों में केंद्र से लेकर सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की सरकारों द्वारा महिलाओं के लिए अनेक सरकारी योजनाएं शुरू की गई हैं। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान से लेकर स्वयं सहायता समूहों, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, कौशल विकास कार्यक्रमों और महिलाओं के स्वास्थ्य एवं पोषण से जुड़ी योजनाओं ने अनेक सकारात्मक बदलावों की शुरुआत की है। इन प्रयासों ने लाखों महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और स्वरोजगार से जोड़ा है। इसके बावजूद यह भी सच है कि ग्रामीण भारत के अनेक हिस्सों में इन योजनाओं का लाभ अभी भी समान रूप से नहीं पहुंच पाया है। कहीं जानकारी का अभाव है, कहीं सामाजिक संकोच, कहीं संसाधनों की कमी और कहीं वर्षों से चली आ रही रूढ़िवादी सोच और परंपरा महिलाओं को आगे बढ़ने से रोक देती है।
ग्रामीण समाज में सबसे बड़ी चुनौती केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि सोच की भी है। आज भी अनेक परिवारों में लड़कियों की शिक्षा को लड़कों जितना महत्व नहीं दिया जाता। कई जगह लड़कियों की पढ़ाई जल्दी रुक जाती है क्योंकि घरेलू जिम्मेदारियां उन्हें स्कूल से पहले सौंप दी जाती हैं। महिलाओं की राय परिवार के महत्वपूर्ण निर्णयों में अक्सर अंतिम प्राथमिकता बनकर रह जाती है। यदि किसी गांव की महिलाएं शिक्षित हों, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हों और पंचायत से लेकर परिवार तक निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी सक्रिय भागीदारी हो, तो उसका प्रभाव केवल महिलाओं तक सीमित नहीं रहता बल्कि ऐसे परिवारों में बच्चों की शिक्षा बेहतर होती है, स्वास्थ्य संबंधी निर्णय अधिक जागरूकता के साथ लिए जाते हैं, पोषण की स्थिति सुधरती है और घरेलू आय के नए स्रोत विकसित होते हैं। यही कारण है कि दुनिया भर के विकास संबंधी अध्ययनों में महिलाओं के सशक्तिकरण को गरीबी कम करने और सामाजिक विकास का सबसे प्रभावी माध्यम माना गया है।
ग्रामीण भारत में परिवर्तन की सबसे सकारात्मक बात यह है कि अब बदलाव की इच्छा केवल महिलाओं तक सीमित नहीं रह गई है। बड़ी संख्या में युवा यह मानने लगे हैं कि महिला और पुरुष के बीच अवसरों की समानता होनी चाहिए। पंचायतों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की बढ़ती भागीदारी ने भी यह साबित किया है कि अवसर मिलने पर महिलाएं नेतृत्व की जिम्मेदारियों को प्रभावी ढंग से निभा सकती हैं। यह अलग बात है कि अभी उनकी भूमिका बहुत अधिक प्रभावी रूप मने सामने नहीं आई है. वहीं स्वयं सहायता समूहों ने भी हजारों गांवों में महिलाओं को बचत, उद्यमिता और सामुदायिक नेतृत्व से जोड़कर आत्मविश्वास की नई पहचान दी है। यह बदलाव बताता है कि जब अवसर और विश्वास साथ मिलते हैं, तो महिलाएं केवल अपने परिवार का ही नहीं, बल्कि पूरे समाज का भविष्य बदल सकती हैं।
हालांकि यह भी स्वीकार करना होगा कि केवल महिलाओं से बदलाव की उम्मीद करना पर्याप्त नहीं है। नारी सशक्तिकरण महिलाओं का अकेला संघर्ष नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है। यदि पुरुष समानता के इस अभियान में सहभागी बनेंगे, तभी सामाजिक परिवर्तन स्थायी रूप से संभव होगा। बराबरी का समाज टकराव से नहीं, साझेदारी से बनता है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुषों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब घर के पुरुष बराबरी को अपना दायित्व मानते हैं, तब महिलाओं के लिए फैसले लेना, शिक्षा जारी रखना और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी करना आसान हो जाता है।
शिक्षा इस परिवर्तन की सबसे मजबूत सीढ़ी बनी है। एक शिक्षित किशोरी केवल अपनी पढ़ाई पूरी नहीं करती, बल्कि स्वास्थ्य, पोषण, कानून, तकनीक और अपने अधिकारों के प्रति भी अधिक जागरूक होती है। वह बाल विवाह, लैंगिक भेदभाव और हिंसा जैसी सामाजिक चुनौतियों का सामना करने का साहस विकसित करती है। इसलिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कोई भी लड़की केवल गरीबी, दूरी, असुरक्षा या सामाजिक दबाव के कारण शिक्षा से वंचित न रहे।
वास्तव में, महिलाओं को केवल योजनाओं के लाभार्थी के तौर पर ही नहीं , बल्कि विकास की दिशा तय करने वाली साझेदार के रूप में देखा जाना चाहिए। स्वरोजगार, डिजिटल साक्षरता, कृषि, स्थानीय उद्यम, पर्यावरण संरक्षण और पंचायत स्तर की योजनाओं में उनकी भागीदारी बढ़ाना समय की आवश्यकता है। जब महिलाएं विकास प्रक्रिया का नेतृत्व करेंगी, तब योजनाओं का लाभ भी अधिक प्रभावी और व्यापक रूप से समाज तक पहुंचेगा। आज जरूरत केवल नई योजनाओं की नहीं, बल्कि ऐसे गांवों की है जहां हर लड़की और महिला बिना भेदभाव के अपने अधिकारों, अवसरों और फैसलों तक पहुंच सके। समानता की शुरुआत कानूनों से जरूर होती है, लेकिन वह सबसे पहले घर की चौखट पर दिखाई देती है।


