परमाणु तकनीक से हाइड्रोजन बनाने में भारत प्रथम

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-महेन्द्र तिवारी
भारत ने विज्ञान, ऊर्जा और तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में एक ऐसी ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया है। तमिलनाडु के कलपक्कम स्थित इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र में देश ने दुनिया की पहली ऐसी हाइड्रोजन उत्पादन सुविधा का सफलतापूर्वक शुभारंभ किया है जो बिजली के बजाय परमाणु रिएक्टर से प्राप्त ऊष्मा का उपयोग करती है। यह उपलब्धि केवल भारत के लिए ही नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र के लिए भी एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण मोड़ मानी जा रही है। आज पूरी दुनिया स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा की तलाश में जुटी हुई है। जीवाश्म ईंधनों पर दुनिया की अत्यधिक निर्भरता ने जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण और ऊर्जा सुरक्षा जैसी अनेक गंभीर चुनौतियां पैदा कर दी हैं। ऐसे कठिन समय में हाइड्रोजन को भविष्य के सबसे सुरक्षित ईंधन के रूप में देखा जा रहा है। हाइड्रोजन का उपयोग आने वाले समय में परिवहन, इस्पात उद्योग, उर्वरक निर्माण, रसायन और अन्य भारी उद्योगों में बड़े पैमाने पर किया जा सकता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उपयोग के दौरान इससे बिल्कुल भी कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं होता है। अब तक दुनिया भर में अधिकांश स्वच्छ हाइड्रोजन उत्पादन विद्युत आधारित इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया से ही किया जाता रहा है। इस पारंपरिक प्रक्रिया में पानी को बिजली की सहायता से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित किया जाता है। यदि यह आवश्यक बिजली सौर ऊर्जा या पवन ऊर्जा से प्राप्त की जाए तो तैयार होने वाली गैस को हरित हाइड्रोजन कहा जाता है। लेकिन इस पुरानी प्रक्रिया में बहुत बड़ी मात्रा में बिजली की आवश्यकता होती है, जिससे उत्पादन की कुल लागत अत्यधिक बढ़ जाती है और व्यावसायिक व्यवहार्यता कम हो जाती है। भारत ने इसी बड़ी चुनौती का व्यावहारिक समाधान खोजने की दिशा में पूरी दुनिया को एक नया रास्ता दिखाया है। कलपक्कम में स्थापित की गई नई सुविधा बिजली का भारी उपयोग करने के बजाय परमाणु रिएक्टर से निकलने वाली अत्यधिक ऊष्मा का सीधे उपयोग करती है। इससे ऊर्जा की बर्बादी बहुत कम होती है और पूरी उत्पादन प्रक्रिया पहले के मुकाबले कहीं अधिक दक्ष बन जाती है। भारतीय वैज्ञानिकों का अटूट विश्वास है कि भविष्य में यह उन्नत तकनीक बड़े पैमाने पर बेहद कम लागत में स्वच्छ हाइड्रोजन उपलब्ध कराने में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगी। यह गौरवशाली परियोजना परमाणु ऊर्जा विभाग, इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के संयुक्त तथा निरंतर प्रयासों का एक बेहद सुखद परिणाम है। इस अत्याधुनिक सुविधा का आधिकारिक उद्घाटन 26 जून 2026 को किया गया। इसे कई वर्षों के गहन शोध, कठिन परीक्षणों और जटिल तकनीकी विकास के बाद अंतिम रूप दिया गया है। इस संयंत्र की सफलता ने भारत के परमाणु अनुसंधान इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया है। इस विशिष्ट संयंत्र में कॉपर क्लोरीन ऊष्मा-रासायनिक चक्र का उपयोग किया गया है। यह एक विशेष और जटिल रासायनिक तकनीक है जिसमें तांबा और क्लोरीन आधारित रासायनिक अभिक्रियाओं की एक पूरी श्रृंखला के माध्यम से पानी से हाइड्रोजन को अलग किया जाता है। इस पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया में मुख्य ऊर्जा स्रोत केवल ऊष्मा ही होती है। यही कारण है कि इसमें बाहरी बिजली की आवश्यकता बहुत कम पड़ती है और पूरी प्रक्रिया बेहद किफायती हो जाती है।

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