कीट प्रकृति के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मधुमक्खियाँ, तितलियाँ और अनेक अन्य कीट परागण, जैविक अपघटन तथा खाद्य श्रृंखला को बनाए रखने में सहायक होते हैं। किंतु सभी कीट लाभदायक नहीं होते। मच्छर, दीमक, टिड्डी, फल मक्खी और विभिन्न फसल-हानिकारक कीट मानव स्वास्थ्य, कृषि उत्पादन और संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचा सकते हैं। इसलिए कीटों का अंधाधुंध विनाश नहीं, बल्कि वैज्ञानिक एवं संतुलित कीट प्रबंधन आवश्यक है, ताकि लाभदायक कीटों का संरक्षण हो और हानिकारक कीटों पर प्रभावी नियंत्रण रखा जा सके। कीटों जैसे मच्छर, चूहे, दीमक और कॉकरोच आदि से होने वाले स्वास्थ्य, कृषि एवं संपत्ति संबंधी नुकसान के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रत्येक वर्ष 6 जून को विश्व कीट जागरूकता दिवस (वर्ल्ड पेस्ट डे) मनाया जाता है। यह दिवस लोगों को हानिकारक कीटों से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों, फसलों के नुकसान और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करता है। मलेरिया, डेंगू, जीका वायरस, प्लेग, चिकनगुनिया, वेस्ट नाइल वायरस और लाइम रोग जैसी अनेक बीमारियाँ कीटों तथा रोडेंट्स (चूहों) के माध्यम से फैलती हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि कीट-पतंगे और अन्य हानिकारक जीव आकार में भले ही छोटे दिखाई देते हों, लेकिन मानव स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और वैश्विक अर्थव्यवस्था को वे अत्यंत गंभीर नुकसान पहुँचाते हैं। दुनिया की 5 अरब से अधिक आबादी वेक्टर-जनित अर्थात कीटों से फैलने वाली बीमारियों के खतरे में जीवन व्यतीत करती है। मच्छरों, मक्खियों, चूहों और अन्य वाहक जीवों से फैलने वाली बीमारियों के कारण हर वर्ष विश्वभर में 7 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हो जाती है। भंडारण के दौरान वैश्विक स्तर पर लगभग 8 से 10 प्रतिशत अनाज कीटों के कारण नष्ट हो जाता है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार कीट और रोग विश्व की लगभग 40 प्रतिशत फसलों को नुकसान पहुँचाते हैं। टिड्डी, तना छेदक, माहू, फल मक्खी और सफेद मक्खी जैसे कीट कृषि उत्पादन में भारी कमी लाते हैं। बहरहाल, यदि हम यहां पर भारत की बात करें तो देश में कीट एवं अन्य कृषि पेस्ट हर वर्ष लगभग एक लाख करोड़ रुपये की आर्थिक क्षति पहुँचाते हैं तथा इनके कारण फसलों का लगभग 15 से 25 प्रतिशत हिस्सा नष्ट हो जाता है। यही कारण है कि कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा के लिए प्रभावी कीट प्रबंधन अत्यंत आवश्यक माना जाता है।
आज ग्लोबल वार्मिंग और बदलते मौसम के कारण कीटों की संख्या तथा उनका जीवनकाल बढ़ रहा है। पहले जो कीट ठंडी सर्दियों में नष्ट हो जाते थे, वे अब गर्म होते पर्यावरण के कारण अधिक समय तक जीवित रह रहे हैं। बढ़ते तापमान के कारण कीट तेजी से प्रजनन कर रहे हैं और नए क्षेत्रों में फैल रहे हैं। अनुमान है कि यदि वैश्विक तापमान लगभग 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है तो गेहूँ में कीटों से होने वाली हानि लगभग 46 प्रतिशत, मक्का में 31 प्रतिशत तथा चावल में 19 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। पाठकों को बताता चलूं कि विश्व में कीटों की ज्ञात प्रजातियों की संख्या लगभग 10 लाख (1 मिलियन) है, जबकि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक मानी जाती है। सभी कीट हानिकारक नहीं होते। मधुमक्खियाँ, तितलियाँ और अनेक अन्य कीट परागण, जैव-विविधता तथा पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए कीट नियंत्रण का अर्थ सभी कीटों का विनाश नहीं, बल्कि हानिकारक प्रजातियों का वैज्ञानिक नियंत्रण है।
आज कीट नियंत्रण केवल रासायनिक दवाओं या जहर के छिड़काव तक सीमित नहीं है। आधुनिक कीट प्रबंधन में डेटा-संचालित तकनीकों, जैविक नियंत्रण, निगरानी प्रणालियों और पर्यावरण-अनुकूल उपायों पर जोर दिया जा रहा है, ताकि पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना प्रभावी नियंत्रण किया जा सके। कीट नियंत्रण सीधे तौर पर खाद्य सुरक्षा से जुड़ा है, क्योंकि कीट खेतों में खड़ी फसलों और गोदामों में रखे अनाज दोनों को नुकसान पहुँचाते हैं। इतना ही नहीं, बाढ़, भूकंप, चक्रवात और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के बाद कीटों तथा रोग फैलाने वाले जीवों की संख्या बढ़ जाती है, जिससे महामारी फैलने का खतरा भी बढ़ जाता है। इसलिए आपदा प्रबंधन में भी कीट नियंत्रण एक महत्वपूर्ण घटक माना जाता है। वहीं दीमक और अन्य लकड़ी खाने वाले कीट घरों, इमारतों और अन्य संरचनाओं को भीतर से खोखला कर देते हैं, जिससे हर वर्ष अरबों रुपये की संपत्ति का नुकसान होता है। हानिकारक कीटों पर नियंत्रण से केवल स्वास्थ्य और कृषि ही नहीं, बल्कि संपत्ति की भी सुरक्षा होती है।
अंत में निष्कर्ष के तौर पर यही कहूंगा कि कीट कृषि उत्पादन, मानव स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, संपत्ति और अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डालते हैं। हानिकारक कीटों पर नियंत्रण पर्यावरण संरक्षण, जनस्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।सरल शब्दों में कहें तो हानिकारक कीटों को नियंत्रित करना उचित और आवश्यक है, लेकिन यह कार्य वैज्ञानिक, संतुलित और पर्यावरण-अनुकूल तरीके से होना चाहिए, ताकि लाभदायक कीटों और प्रकृति को अनावश्यक नुकसान न पहुंचे। यह भी कहा जा सकता है कि हानिकारक कीटों को मारना तभी उचित माना जाता है जब वे मानव स्वास्थ्य, कृषि उत्पादन, खाद्य सुरक्षा या संपत्ति के लिए गंभीर खतरा बन रहे हों। इसका उद्देश्य प्रकृति का विनाश नहीं, बल्कि मनुष्य और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना है।इस संदर्भ में आधुनिक दृष्टिकोण समेकित कीट प्रबंधन का है, जिसमें जैविक, यांत्रिक और पर्यावरण-अनुकूल उपायों को प्राथमिकता दी जाती है तथा रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग आवश्यकता पड़ने पर ही किया जाता है।इन सबके बीच लाभदायक कीटों का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसलिए जागरूकता, स्वच्छता और वैज्ञानिक कीट प्रबंधन ही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।



