बाड़मेर। सीमावर्ती जिले बाड़मेर में प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर इन दिनों नई चर्चा देखने को मिल रही है। जिले के लोगों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में प्रशासन के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव नजर आया है। जहां पहले कई योजनाओं के दावों और प्रचार पर सवाल उठते थे, वहीं अब जमीन पर काम और लोगों की समस्याओं के समाधान को प्राथमिकता मिलती दिखाई दे रही है।
मौजूदा जिला कलक्टर सुश्री चिन्मयी गोपाल के कार्यकाल में प्रशासनिक सक्रियता अलग अंदाज में सामने आई है। जल संकट को लेकर गांवों तक टैंकरों की व्यवस्था और विभागों को जवाबदेह बनाने जैसे फैसलों ने लोगों का ध्यान खींचा है। स्थानीय स्तर पर यह माना जा रहा है कि प्रशासन अब सीधे राहत देने और समस्याओं के समाधान पर ज्यादा ध्यान दे रहा है।
स्वास्थ्य सेवाओं के मोर्चे पर भी बदलाव महसूस किया गया है। राजकीय चिकित्सालय में लंबे समय से प्रभावित सेवाओं को दोबारा सुचारू करने की दिशा में कदम उठाए गए। इससे आम मरीजों को राहत मिली और प्रशासन की सक्रियता को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया भी सामने आई।
वहीं इससे पहले जिले में विकास योजनाओं और जल संरक्षण को लेकर बड़े स्तर पर दावे किए गए थे। लेकिन बाद में कई मामलों में सवाल उठे और आरोप लगे कि कुछ योजनाओं की तस्वीर कागजों में ज्यादा दिखाई गई, जबकि जमीन पर हालात अलग थे। इसी वजह से प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर लंबे समय तक बहस बनी रही।
उस दौरान पानी, चिकित्सा और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी शिकायतें भी लगातार सामने आती रहीं। ग्रामीण इलाकों में लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ा और कई बार प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर सवाल उठे।
अब बाड़मेर में लोगों के बीच तुलना साफ दिखाई दे रही है। आमजन का कहना है कि प्रचार और सोशल मीडिया से कुछ समय के लिए माहौल जरूर बनता है, लेकिन भरोसा उसी प्रशासन पर कायम होता है जो सीधे लोगों के बीच पहुंचकर समस्याओं का समाधान करे। यही वजह है कि जिले में मौजूदा कामकाज को लेकर लोगों के बीच अलग तरह की चर्चा बनी हुई है।



