इंडि की एकता : मुंह में राम बगल में छुरी

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-बाल मुकुन्द ओझा
बंगाल, तमिलनाडु और केरलम चुनावों के बाद दिखावे के लिए विपक्ष की एकता के गीत अवश्य गाये जा रहे है मगर असल में इंडि गठबंधन में दरार चौड़ी होती जा रही है। अपनी करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने भाजपा के खिलाफ विपक्ष की एकता का आह्वान किया तो डीएमके के प्रमुख स्टालिन ने कांग्रेस पर विश्वासघात का आरोप लगाते देर नहीं की। सबसे पहले बात करते है बंगाल की। बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता ने कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों को एक सीट देना भी गंवारा नहीं किया। सीपीएम के नेता हन्नान मौला ने ममता के एकजुटता के बयान की खुलकर आलोचना की। सीपीएम के एक वरिष्ठ नेता मो सलीम ने उनकी पहचान ‘अपराधी और लुटेरी’ तक बता दी है। अपने केंद्रीय नेतृत्व के विपरीत बंगाल कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने भी ममता की आलोचना की। अब ममता के सुर में सुर मिलाने वाले राहुल गाँधी ने भी अपने चुनाव प्रचार के दौरान तृणमूल कांग्रेस के शासन में गुण्डागर्दी और भ्रष्टाचार के आरोप लगाने में गुरेज नहीं किया था। जिन विपक्षी दलों को वो अबतक भाव देने के लिए तैयार नहीं थीं, वो पार्टियां अब उन्हें जरा भी भाव देने के लिए तैयार नहीं हैं। वहीं तमिलनाडु में डीएमके ने अपने साथ चुनावी गठबंधन तोड़ने के कांग्रेस के कदम को “पीठ में छुरा घोंपना” और “विश्वासघात” बताया है। इंडि की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ने जिस तरह से तमिलनाडु में गठबंधन के डूबते जहाज से छलांग लगाकर विरोधी दल के जहाज पर कूद कर जान बचाने की कोशिश की है, उसने भी टीएमसी अध्यक्ष के मंसूबे पर पानी फेर दिया है। केरलम में कांग्रेस ने वामपंथियों को पराजित कर उनके हाथ से सत्ता छीनने में कामयाब हुई है। अगले साल के शुरू में यूपी पंजाब सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने जा रहे है। पंजाब में कांग्रेस का मुकाबला आम आदमी पार्टी से होगा जहाँ एक बार फिर इंडि की एकता छीन भिन्न हो जाएगी। इससे पूर्व दिल्ली और हरियाणा में भी विपक्ष की एकता तार तार हो चुकी है। लगता है इंडि गठबंधन को मजबूत बनाकर भाजपा के खिलाफ संघर्ष का विपक्ष का यह प्रयास ख्याली पुलाव से अधिक साबित होने वाला नहीं है।
सच तो यह है एनडीए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मिलजुलकर मुकाबला करने के लिए बनाये गए इंडि गठबंधन में शामिल दलों का आपसी मतभेद समय के साथ और भी बढ़ता जा रहा है। संसद के बजट सत्र में कुछ मुद्दों पर एका दिखाने के बाद गठबंधन में शामिल पार्टियों ने अपनी अपनी डफली और अपना अपना राग अलापना शुरू कर दिया है।
इंडि गठबंधन में शामिल दल लाख दावा करे मगर सच तो यही है कि एकता अब तार तार हो गई है। इससे पूर्व ममता बनर्जी ने इंडि नेतृत्व पर सवाल उठाये तो लालू यादव सरीखों ने ममता को नेतृत्व सौंपने की वकालत की थी। संसद के शीतकालीन सत्र की शुरुआत से ही कांग्रेस अडानी मुद्दे पर काफी आक्रामक रही। विपक्ष के सांसदों ने इस मुद्दे पर संसद भवन परिसर में विरोध-प्रदर्शन भी किया लेकिन एसपी और टीएमसी के सांसद इस प्रदर्शन में शामिल नहीं हुए। इसी भांति महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में करारी हार होने के बाद कांग्रेस ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम पर सवाल उठाए थे। इंडिया गठबंधन के सदस्य और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस के इस रुख की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि अगर आप ईवीएम के जरिए जीत मिलने पर जश्न मनाते हैं तो कुछ महीनों बाद चुनाव में हारने पर ईवीएम को खारिज नहीं कर सकते हैं। इसी तरह अडानी के मुद्दे पर शरद पवार की एनसीपी और अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी का रुख कांग्रेस से अलग देखा गया। संभल के सवाल पर कांग्रेस और अखिलेश अलग अलग खड़े दिखाई दिए। इसी बीच राजद नेता तेजस्वी यादव ने कहा कि, इंडिया गठबंधन बनने के दौरान यह तय हो गया था कि यह गठबंधन केवल लोकसभा चुनाव के लिए है, विधानसभा चुनाव के लिए यह गठबंधन नहीं है।

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