– महेन्द्र तिवारी
भारतीय राजनीति के फलक पर नीतीश कुमार एक ऐसी पहेली हैं, जिसे सुलझाने का दावा हर कोई करता है, लेकिन पूरी तरह कोई समझ नहीं पाता। एक ऐसा नेता, जिसके पास लालू प्रसाद यादव जैसा नैसर्गिक करिश्मा नहीं है, न ही उनके पास भाजपा जैसा विशाल सांगठनिक ढांचा है, फिर भी वह साल-दर-साल बिहार की सत्ता की धुरी बने हुए हैं। यह राजनीतिक उत्तरजीविता का ऐसा उदाहरण है, जो राजनीति विज्ञान के छात्रों के लिए किसी शोध से कम नहीं। नीतीश कुमार के व्यक्तित्व को समझने के लिए हमें उस दौर में पीछे जाना होगा, जब बिहार ‘जंगलराज’ के तमगे से जूझ रहा था। 2005 में जब उन्होंने सत्ता संभाली, तो उनके सामने एक ऐसा राज्य था जिसकी सड़कें गायब थीं, जहां शाम ढलते ही लोग घरों में दुबक जाते थे और जहां विकास की परिभाषा केवल सरकारी विज्ञापनों तक सीमित थी। उस समय नीतीश कुमार ने ‘सुशासन बाबू’ की जो छवि गढ़ी, वह रातों-रात नहीं बनी थी। उसके पीछे दशकों का संघर्ष और समाजवाद की वह विचारधारा थी, जिसे उन्होंने राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण से सीखा था। नीतीश कुमार होना इसलिए कठिन है क्योंकि उन्हें हर कदम पर एक संतुलन साधना पड़ता है एक तरफ अपनी समाजवादी साख बचाए रखने की चुनौती और दूसरी तरफ सत्ता के समीकरणों को साधने की मजबूरी।
उनकी राजनीति का सबसे दिलचस्प और विवादित पहलू उनका पाला बदलना रहा है। आलोचक उन्हें ‘पलटू राम’ कहते हैं, लेकिन अगर इसे गहराई से देखें, तो यह एक ऐसे नेता की छटपटाहट भी हो सकती है जो अपने एजेंडे को लागू करने के लिए किसी भी हद तक समझौता करने को तैयार है। क्या यह सत्ता का लालच है या बिहार के विकास की मजबूरी? इस पर बहस अंतहीन हो सकती है, लेकिन एक सच यह भी है कि नीतीश कुमार ने कभी भी अपनी व्यक्तिगत ईमानदारी और छवि पर दाग नहीं लगने दिया। भारतीय राजनीति में जहां भ्रष्टाचार एक सामान्य शिष्टाचार बन गया हो, वहां एक मुख्यमंत्री का बेदाग बने रहना वाकई आसान नहीं है। उनकी ताकत उनके वोट बैंक में नहीं, बल्कि उनकी कार्यशैली में रही है। उन्होंने बिहार में एक नया वर्ग तैयार किया ‘मौन मतदाता’। इसमें महिलाएं और अति पिछड़े वर्ग शामिल हैं। जब नीतीश ने लड़कियों को साइकिल दी, तो वह केवल एक वाहन नहीं था, वह बिहार की आधी आबादी के लिए आजादी का परवाना था। सड़क पर साइकिल चलाती उन लड़कियों ने बिहार के सामाजिक ढांचे को बदल दिया। नीतीश कुमार को पता था कि अगर उन्हें बड़े जनाधार वाले नेताओं से लड़ना है, तो उन्हें समाज के उन हिस्सों तक पहुंचना होगा जिन्हें अब तक राजनीति में केवल ‘नंबर’ समझा जाता था।
नीतीश कुमार का शासन मॉडल अक्सर नौकरशाही पर बहुत अधिक निर्भर रहा है। उनके बारे में कहा जाता है कि वे राजनेताओं से ज्यादा अफसरों पर भरोसा करते हैं। यह उनकी ताकत भी रही और कमजोरी भी। ताकत इसलिए क्योंकि इसने योजनाओं को धरातल पर उतारने में मदद की, और कमजोरी इसलिए क्योंकि इसने उन्हें अपनी ही पार्टी के नेताओं से दूर कर दिया। एक अकेला नेता जो अपनी शर्तों पर सरकार चलाना चाहता है, उसके लिए गठबंधन की राजनीति किसी जलती हुई मोमबत्ती को दोनों सिरों से पकड़ने जैसा है। कभी भाजपा का हिंदुत्व, तो कभी राजद का ‘माय’ समीकरण इन दो पाटों के बीच अपनी ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘विकासवादी’ छवि को बचाए रखना किसी बाजीगर का ही काम हो सकता है। नीतीश कुमार ने बिहार को बिजली दी, सड़कें दीं और शराबबंदी जैसा साहसी (भले ही विवादास्पद) फैसला लिया। शराबबंदी के पीछे का तर्क विशुद्ध रूप से सामाजिक था, जो उनके महिला वोट बैंक को मजबूती देता था। हालांकि, इसके क्रियान्वयन में हुई विफलताओं ने उनकी प्रशासनिक साख पर सवाल भी उठाए, लेकिन नीतीश अपनी जिद पर अड़े रहे। यह जिद ही उन्हें खास बनाती है और यही उनके लिए मुश्किलें भी खड़ी करती है।
नीतीश कुमार के राजनीतिक सफर का एक और पहलू उनकी ‘तन्हाई’ है। वे एक ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिनके पास अपनी पार्टी जेडीयू के भीतर भी कोई स्पष्ट उत्तराधिकारी नहीं है। वे एक ऐसे बरगद के पेड़ की तरह हैं जिसकी छाया तो बहुत है, लेकिन उसके नीचे दूसरा कोई पौधा नहीं पनप पाया। यह स्थिति एक नेता के लिए असुरक्षा का कारण भी बन सकती है और उसकी अपरिहार्यता का प्रमाण भी। आज के दौर में जब राजनीति सोशल मीडिया के शोर और इवेंट मैनेजमेंट से चलती है, नीतीश कुमार अभी भी पुराने ढर्रे की उस गंभीर राजनीति में विश्वास रखते हैं जहां फाइलों का अध्ययन और आंकड़ों की बाजीगरी प्राथमिक होती है। वे एक ‘मैकेनिकल इंजीनियर’ हैं और उनकी राजनीति में भी वही इंजीनियरिंग साफ दिखती है। वे जानते हैं कि किस पुर्जे को कब और कहां फिट करना है ताकि सत्ता की मशीन चलती रहे। लेकिन इस मशीन को चलाने की कीमत उन्हें अपनी साख की अस्थिरता से चुकानी पड़ी है। जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता का ग्राफ कभी ऊपर तो कभी नीचे जाता रहा है, फिर भी वे प्रासंगिक बने रहे।
नीतीश कुमार होना इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि उनके ऊपर हमेशा एक ‘बड़े भाई’ की छाया रही है। कभी वह छाया लालू प्रसाद यादव की थी, तो कभी भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की। इस छाया से बाहर निकलकर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखना और यह सुनिश्चित करना कि बिहार की बागडोर उन्हीं के हाथ में रहे, एक निरंतर चलने वाला युद्ध है। उन्होंने बिहार को उस हीन भावना से बाहर निकाला जो 90 के दशक के अंत में घर कर गई थी। उन्होंने ‘बिहार गौरव’ की बात की, प्रवासी बिहारियों को वापस आने का न्योता दिया और राज्य के बजट को कई गुना बढ़ाया। लेकिन इन सबके बावजूद, पलायन और बेरोजगारी जैसे राक्षसों को वे पूरी तरह काबू नहीं कर पाए। यह उनकी राजनीति की एक दुखद विडंबना है कि जिस राज्य को उन्होंने विकास की पटरी पर दौड़ाने की कोशिश की, वहां का युवा आज भी रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर देखने को मजबूर है। एक मुख्यमंत्री के रूप में इस विफलता का बोझ ढोना और फिर भी यह कहना कि “सब ठीक है,” वाकई आसान नहीं है।
अक्सर यह सवाल उठता है कि नीतीश कुमार का अंतिम लक्ष्य क्या है? क्या वे प्रधानमंत्री बनना चाहते थे? या वे केवल बिहार के इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज कराना चाहते हैं? उनकी महत्वाकांक्षाएं हमेशा उनके चेहरे की झुर्रियों और उनकी नपी-तुली बातों के पीछे छिपी रहती हैं। वे एक ऐसे खिलाड़ी हैं जो अपने पत्ते तभी खोलते हैं जब सामने वाला अपनी चाल चल चुका होता है। उनकी यह अनिश्चितता उनके सहयोगियों के लिए डरावनी और विरोधियों के लिए चुनौतीपूर्ण होती है। नीतीश कुमार ने बिहार की राजनीति को ‘जाति’ से निकालकर ‘जमात’ और ‘विकास’ की ओर ले जाने की कोशिश की, लेकिन अंततः उन्हें भी जातिगत जनगणना जैसे हथियारों का सहारा लेना पड़ा। यह इस बात का प्रमाण है कि जमीन की हकीकतें कितनी भी आदर्शवादी राजनीति को घुटने टेकने पर मजबूर कर सकती हैं।
नीतीश कुमार के व्यक्तित्व का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा उनका व्यक्तिगत संयम है। वे चकाचौंध से दूर रहते हैं, उनका परिवार राजनीति से कोसों दूर है और वे अपनी निजी जिंदगी को बहुत गोपनीय रखते हैं। भारतीय राजनीति के इस दौर में, जहां परिवारवाद एक बड़ी समस्या है, नीतीश कुमार का इस मामले में अडिग रहना उन्हें सम्मान दिलाता है। लेकिन यही संयम उन्हें कभी-कभी ‘अहंकारी’ या ‘संपर्कविहीन’ नेता के रूप में भी चित्रित कर देता है। उनके बारे में प्रसिद्ध है कि वे एक बार जो तय कर लेते हैं, फिर किसी की नहीं सुनते। यह दृढ़ता ही थी जिसने बिहार में कानून का राज स्थापित किया, लेकिन यही जिद आज उनकी पार्टी के भीतर असंतोष का कारण भी बनती है।
अंत में, नीतीश कुमार होना एक निरंतर द्वंद्व में जीने जैसा है। यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो आधुनिक बिहार का निर्माता कहलाना चाहता है, लेकिन जिसे अपनी कुर्सी बचाने के लिए बार-बार उन सिद्धांतों से समझौता करना पड़ता है जिन्हें उसने कभी पवित्र माना था। वे एक ऐसे नायक हैं जिनके चरित्र में शेड्स ऑफ ग्रे अधिक हैं। न तो वे पूरी तरह ‘सफेद’ आदर्शवादी हैं और न ही पूरी तरह ‘काले’ अवसरवादी। वे समय की मांग के अनुसार रंग बदलने वाले एक कुशल राजनेता हैं, जो जानते हैं कि राजनीति संभावनाओं का खेल है। बिहार के इतिहास में नीतीश कुमार का मूल्यांकन केवल उनके पाला बदलने के आधार पर नहीं होगा, बल्कि उस बदलाव के आधार पर होगा जो उन्होंने एक आम बिहारी के जीवन में लाने की कोशिश की। उनके विरोधी चाहे जो कहें, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने बिहार को एक ‘पहचान’ दी है। एक ऐसी पहचान, जो अराजकता से दूर और प्रगति की ओर अग्रसर है। 2026 के इस दौर में भी, जब राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है, नीतीश कुमार का प्रासंगिक बने रहना यह साबित करता है कि वे सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति का एक अनिवार्य अध्याय हैं। और सच यही है कि उस अध्याय को लिखना या उसे जी पाना, वाकई हर किसी के बस की बात नहीं है। नीतीश कुमार होना, दरअसल, अपनी ही छाया से लड़ते हुए सत्ता के शिखर पर बने रहने की एक अंतहीन साधना है।



