-द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दो 6-इंच तोपों से हुई थी शुरुआत, 1964 में नौसेना को मिली जिम्मेदारी; बदलते समय के साथ तटीय सुरक्षा का स्वरूप भी हुआ आधुनिक
विशाखापट्टनम। आंध्र प्रदेश का विशाखापट्टनम देश के प्रमुख समुद्री शहरों में शामिल है। एक ओर यह महत्वपूर्ण व्यावसायिक बंदरगाह है, वहीं दूसरी ओर भारतीय नौसेना के लिए इसका रणनीतिक महत्व बेहद खास है। इसी समुद्री और सामरिक महत्व के कारण विशाखापट्टनम में वर्षों पहले ऐसी रक्षा व्यवस्था विकसित की गई थी, जिसका उद्देश्य समुद्र की ओर से आने वाले संभावित सैन्य खतरे से तट और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की रक्षा करना था। इसी इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है Naval Coast Battery, Visakhapatnam (NCB-V)।
Naval Coast Battery को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि यह किसी सामान्य बैटरी या बिजली से जुड़ी व्यवस्था का नाम नहीं है। यह एक तटीय सैन्य रक्षा व्यवस्था है, जिसमें समुद्र की ओर से आने वाले संभावित दुश्मन के जहाजों या अन्य सैन्य खतरों पर नजर रखने और आवश्यकता पड़ने पर उनके खिलाफ कार्रवाई करने की क्षमता विकसित की गई थी। आज समुद्री सुरक्षा की तकनीक बहुत आगे बढ़ चुकी है और आधुनिक तटीय रक्षा में रडार, संचार प्रणाली, समुद्री निगरानी, युद्धपोत, विमान, हेलीकॉप्टर और विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों का समन्वय शामिल है, लेकिन Naval Coast Battery का इतिहास भारत की तटीय सुरक्षा व्यवस्था के विकास को समझने में महत्वपूर्ण है।
विशाखापट्टनम में Coastal Battery की स्थापना का इतिहास द्वितीय विश्व युद्ध के दौर से जुड़ा है। वर्ष 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के बाद भारत के समुद्री तटों और महत्वपूर्ण बंदरगाहों की सुरक्षा को लेकर विशेष तैयारियां की गई थीं। उस समय विशाखापट्टनम का सामरिक महत्व तेजी से बढ़ रहा था। यहां बंदरगाह होने के साथ-साथ समुद्री गतिविधियां भी महत्वपूर्ण थीं। ऐसे में समुद्र की दिशा से संभावित हमले से बचाव के लिए तट पर भारी तोपों की तैनाती की आवश्यकता महसूस की गई।
उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार वर्ष 1940 में यहां 5th Indian Heavy Battery की स्थापना की गई और दो 6-इंच की भारी तोपें तैनात की गईं। इन तोपों का उद्देश्य समुद्र की दिशा से आने वाले संभावित दुश्मन जहाजों के खिलाफ लंबी दूरी से कार्रवाई करने की क्षमता रखना था। दिसंबर 1941 में इस इकाई का नाम बदलकर 5th Indian Coast Battery कर दिया गया। उस समय तटीय रक्षा का सबसे महत्वपूर्ण आधार भारी तोपें ही हुआ करती थीं। समुद्र में आने वाले युद्धपोतों को तट के पास पहुंचने से पहले रोकना तटीय तोपखाने की प्रमुख भूमिका थी।
विशाखापट्टनम में इस सैन्य व्यवस्था की स्थापना के दौरान तटीय क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति को भी ध्यान में रखा गया था। समुद्र की ओर खुला क्षेत्र होने के कारण यहां से समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने और आवश्यकता पड़ने पर तोपों का इस्तेमाल करने की क्षमता विकसित की गई। उस समय इस क्षेत्र में मछुआरों की बस्तियां भी थीं। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि सैन्य जरूरतों के चलते कुछ परिवारों को दूसरी जगह स्थानांतरित किया गया और आगे चलकर वहां Kotha Jalaripeta जैसी बस्ती विकसित हुई।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विशाखापट्टनम का महत्व और बढ़ गया। वर्ष 1942 में जापानी विमानों द्वारा विशाखापट्टनम पर हमला किए जाने का भी इतिहास में उल्लेख मिलता है। उस दौर में जापानी सेना दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हिस्सों में तेजी से आगे बढ़ रही थी और भारत के पूर्वी समुद्री तट पर भी खतरे की आशंका बनी हुई थी। ऐसे माहौल में विशाखापट्टनम जैसे महत्वपूर्ण बंदरगाह और नौसैनिक क्षेत्र की सुरक्षा के लिए तटीय रक्षा व्यवस्था का महत्व और अधिक बढ़ गया।
उस समय Coastal Battery का मूल काम समुद्र की दिशा से आने वाले दुश्मन के युद्धपोतों को रोकना था। यदि किसी शत्रु जहाज की गतिविधि संदिग्ध दिखाई देती थी तो तटीय रक्षा इकाइयां उसकी पहचान, निगरानी और आवश्यकता के अनुसार कार्रवाई में भूमिका निभाती थीं। हालांकि उस समय की तकनीक आज की तुलना में काफी सीमित थी। निगरानी के लिए मानव पर्यवेक्षण, दूरबीन, संचार नेटवर्क और अन्य उपलब्ध साधनों पर अधिक निर्भरता थी। भारी तोपें तटीय रक्षा की मुख्य मारक क्षमता मानी जाती थीं।
समय के साथ भारत की रक्षा जरूरतें बदलीं और तटीय सुरक्षा का ढांचा भी विकसित होता गया। स्वतंत्रता के बाद भारतीय नौसेना की भूमिका बढ़ी और समुद्री सीमाओं की सुरक्षा को लेकर आधुनिक व्यवस्था विकसित होने लगी। वर्ष 1964 में Coastal Batteries की जिम्मेदारी भारतीय नौसेना को सौंपने का निर्णय लिया गया। इसके बाद विशाखापट्टनम की तटीय रक्षा इकाई को Naval Coast Battery, Visakhapatnam यानी NCB-V के नाम से जाना जाने लगा।
नौसेना के अधीन आने के बाद तटीय सुरक्षा को व्यापक समुद्री रक्षा व्यवस्था के साथ जोड़ा गया। इसका महत्व इसलिए भी बढ़ा क्योंकि विशाखापट्टनम धीरे-धीरे भारतीय नौसेना के पूर्वी तट के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में शामिल होता गया। आज यहां भारतीय नौसेना की Eastern Naval Command स्थित है, जो देश के पूर्वी समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
Naval Coast Battery की भूमिका को केवल तोप चलाने तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। तटीय रक्षा की मूल अवधारणा में समुद्र की दिशा से आने वाले संभावित खतरे की पहचान, उस पर नजर रखना, महत्वपूर्ण तटीय और नौसैनिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा करना तथा जरूरत पड़ने पर उपलब्ध रक्षा संसाधनों के जरिए खतरे का मुकाबला करना शामिल रहा है। आधुनिक दौर में यह काम पहले की तुलना में कहीं अधिक तकनीकी और बहुस्तरीय हो चुका है।
आज समुद्री सुरक्षा में रडार आधारित निगरानी, संचार नेटवर्क, समुद्री गश्त, युद्धपोत, नौसैनिक विमान, हेलीकॉप्टर, Coast Guard, Marine Police और विभिन्न खुफिया एवं सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय महत्वपूर्ण है। किसी भी संदिग्ध समुद्री गतिविधि का पता चलने पर विभिन्न एजेंसियों के बीच सूचना साझा की जाती है और आवश्यकता के अनुसार कार्रवाई की जाती है। इस तरह तटीय सुरक्षा अब केवल किसी एक स्थान पर लगी तोपों या किसी एक सैन्य इकाई की जिम्मेदारी नहीं रह गई है, बल्कि यह एक व्यापक और एकीकृत सुरक्षा तंत्र बन चुकी है।
विशाखापट्टनम के संदर्भ में यह व्यवस्था और भी महत्वपूर्ण है। शहर में प्रमुख बंदरगाह होने के साथ-साथ भारतीय नौसेना का महत्वपूर्ण आधार है। पूर्वी समुद्री तट से बंगाल की खाड़ी और आगे हिंद महासागर क्षेत्र तक समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने के लिहाज से विशाखापट्टनम की रणनीतिक स्थिति महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि यहां तटीय सुरक्षा व्यवस्था को हमेशा विशेष महत्व दिया गया है।
वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भी विशाखापट्टनम की Naval Coast Battery को हाई अलर्ट पर रखा गया था। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार उस समय तैनात सैन्यकर्मियों और हथियारों की तैयारियों को बनाए रखने के लिए अभ्यास किए जाते थे। युद्ध के समय तटीय क्षेत्र की सुरक्षा और समुद्र की ओर से किसी संभावित खतरे का सामना करने के लिए ऐसी इकाइयों की operational readiness बेहद महत्वपूर्ण थी।
भारत की समुद्री सुरक्षा के इतिहास में 1971 का युद्ध विशेष महत्व रखता है। इस युद्ध में भारतीय नौसेना ने पश्चिमी और पूर्वी दोनों समुद्री क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पूर्वी पाकिस्तान में सैन्य अभियान के दौरान समुद्री मार्गों की नाकेबंदी और पाकिस्तान की समुद्री क्षमता को सीमित करने में नौसेना की भूमिका रही। ऐसे समय में पूर्वी तट के महत्वपूर्ण नौसैनिक केंद्रों की सुरक्षा भी अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
Naval Coast Battery का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसके इतिहास से यह समझने में मदद मिलती है कि भारत में Coastal Defence किस प्रकार विकसित हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में जहां समुद्र से आने वाले जहाजों के खिलाफ भारी तोपों पर निर्भरता थी, वहीं आज समुद्री सुरक्षा अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित है। अब किसी संभावित खतरे की पहचान के लिए कई स्तरों की निगरानी व्यवस्था काम करती है। समुद्र में गश्त करने वाले जहाजों से लेकर तटीय रडार और हवाई निगरानी तक, अलग-अलग माध्यम एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
मुंबई में हुए 26/11 के आतंकी हमलों के बाद भारत में तटीय सुरक्षा को लेकर विशेष रूप से व्यापक समीक्षा की गई। इसके बाद तटीय निगरानी और विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय को और मजबूत किया गया। भारतीय नौसेना को व्यापक समुद्री सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण समन्वयकारी भूमिका दी गई, जबकि Coast Guard, Marine Police, Customs, Fisheries और अन्य एजेंसियां भी इस व्यवस्था का हिस्सा बनीं।
विशाखापट्टनम में Joint Operations Centre (East) जैसी व्यवस्थाएं भी समुद्री सुरक्षा में विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय के लिए महत्वपूर्ण हैं। समय-समय पर यहां तटीय सुरक्षा अभ्यास भी किए जाते हैं, जिनमें नौसेना, Coast Guard, Marine Police और अन्य संबंधित एजेंसियां हिस्सा लेती हैं। इन अभ्यासों का उद्देश्य किसी वास्तविक आपात स्थिति में विभिन्न एजेंसियों की प्रतिक्रिया और आपसी समन्वय को परखना होता है।
आज के समय में किसी समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा का मतलब केवल दुश्मन के युद्धपोतों से बचाव नहीं है। समुद्री तस्करी, अवैध गतिविधियां, संदिग्ध नौकाएं, समुद्री आतंकवाद और अन्य सुरक्षा चुनौतियां भी तटीय सुरक्षा के दायरे में आती हैं। इसलिए समुद्र में चलने वाली नौकाओं और जहाजों की निगरानी, संदिग्ध गतिविधियों की पहचान तथा जरूरत पड़ने पर संबंधित एजेंसियों को सूचना देना भी आधुनिक समुद्री सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
हालांकि Naval Coast Battery की मूल अवधारणा और आज की आधुनिक Coastal Defence व्यवस्था में काफी अंतर है। पुराने दौर में तटीय बैटरियों की पहचान मुख्य रूप से भारी तोपों और किलेबंदी से होती थी। आज मिसाइल तकनीक, रडार, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी, उपग्रह आधारित सूचनाएं, समुद्री गश्त और नेटवर्क आधारित कमांड एवं कंट्रोल जैसी क्षमताओं ने तटीय रक्षा को पूरी तरह बदल दिया है। इसलिए Naval Coast Battery के ऐतिहासिक महत्व को उसके समय की सैन्य तकनीक और परिस्थितियों के संदर्भ में देखना अधिक उचित है।
विशाखापट्टनम की Naval Coast Battery इस बात का उदाहरण है कि किसी देश की समुद्री सुरक्षा जरूरतें समय के साथ कैसे बदलती हैं। वर्ष 1940 में दो 6-इंच की तोपों से शुरू हुई तटीय रक्षा व्यवस्था ने उस दौर में समुद्र से आने वाले संभावित हमले के खिलाफ सुरक्षा कवच का काम किया। बाद में 1964 में यह व्यवस्था नौसेना के अधीन आई और विशाखापट्टनम के बढ़ते नौसैनिक महत्व के साथ इसका व्यापक रणनीतिक संदर्भ भी मजबूत हुआ।
आज विशाखापट्टनम को भारत के प्रमुख नौसैनिक शहरों में गिना जाता है। यहां मौजूद नौसैनिक प्रतिष्ठान, बंदरगाह, जहाज निर्माण और समुद्री गतिविधियां इसे पूर्वी तट का महत्वपूर्ण केंद्र बनाती हैं। ऐसे में समुद्री सुरक्षा का महत्व केवल सैन्य दृष्टि से ही नहीं, बल्कि देश की आर्थिक और सामरिक सुरक्षा से भी जुड़ा है।
Naval Coast Battery का इतिहास इसी बड़े बदलाव की कहानी बताता है—एक ऐसा दौर जब समुद्र की ओर नजर रखने के लिए तट पर भारी तोपें तैनात की जाती थीं और आज का दौर, जब समुद्र की सुरक्षा के लिए अत्याधुनिक सेंसर, रडार, संचार नेटवर्क, नौसैनिक पोत, विमान और कई सुरक्षा एजेंसियां मिलकर काम करती हैं। विशाखापट्टनम की यह ऐतिहासिक तटीय रक्षा व्यवस्था भारतीय समुद्री सुरक्षा के उस सफर की महत्वपूर्ण कड़ी है, जिसने समय के साथ आधुनिक Coastal Defence का रूप लिया।



