नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर अधिकारों से जुड़े एक अहम मामले पर सुनवाई करते हुए बड़ा कदम उठाया है। कोर्ट ने Transgender Persons (Protection of Rights) Amendment Act, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार और सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी किया है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने 6 हफ्ते के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामला अब तीन जजों की बड़ी बेंच के पास जाएगा।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक NALSA Judgment 2014 के खिलाफ है, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को स्वयं अपनी लैंगिक पहचान तय करने का अधिकार दिया गया था। वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि नया कानून ‘सेल्फ आइडेंटिफिकेशन’ के अधिकार को कमजोर करता है।
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने यह सवाल उठाया कि क्या इस व्यवस्था का दुरुपयोग संभव है, जबकि याचिकाकर्ताओं ने कहा कि आरक्षण जैसी कोई व्यवस्था अभी लागू ही नहीं है, इसलिए आशंका आधारहीन है।
नए संशोधन में पहचान प्रक्रिया को मेडिकल बोर्ड की सिफारिश से जोड़ दिया गया है, जिस पर निजता और गरिमा के उल्लंघन के आरोप लगाए जा रहे हैं। वहीं सरकार का कहना है कि यह कदम जबरन या गलत लिंग परिवर्तन जैसी स्थितियों को रोकने के लिए जरूरी है।
कोर्ट ने फिलहाल कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया है, क्योंकि कानून अभी लागू नहीं हुआ है, लेकिन मामला संवैधानिक बहस के एक बड़े मोड़ पर पहुंच चुका है।



