हर साल दशहरे पर रावण का अंत होता है और अच्छाई की बुराई पर जीत होती है। मैदानों में रावण के विशाल पुतले खड़े किए जाते हैं, आतिशबाजी होती है, तीर चलाया जाता है और कुछ ही पलों में दस सिर वाला रावण आग की लपटों में घिर जाता है। लोग तालियां बजाते हैं, जय श्रीराम के नारे लगाते हैं और घर लौटते समय संतोष महसूस करते हैं कि आज फिर बुराई पर अच्छाई की जीत हो गई।
लेकिन जरा सोचिए, यदि स्वर्ग में कहीं बैठा रावण यह सब देख रहा होगा, तो शायद वह भी मुस्कुराता होगा। सोचता होगा “वाह रे मनुष्य! मैंने तो एक बार सीता जी का हरण किया था, जिसके लिए प्रभु श्री राम ने मेरा अंत कर दिया। लेकिन तुम तो हर साल मेरा पुतला जलाते हो और फिर भी अपने भीतर बैठे रावण को बचाकर रखते हो। आखिर तुम मुझसे इतने नाराज क्यों हो? मैंने तो कम से कम अपनी बुराई की कीमत अपने प्राण देकर चुकाई थी, तुम अपनी बुराइयों के साथ सम्मान से जीते हो!”
रावण का पुतला जलाने में कोई बुराई नहीं है। यह हमारी परंपरा है और बुराई के अंत का प्रतीक भी। समस्या तब पैदा होती है, जब हम प्रतीक को ही वास्तविकता मान लेते हैं। हमें लगता है कि मैदान में खड़ा पुतला जल गया, इसलिए बुराई भी समाप्त हो गई। जबकि सच्चाई यह है कि रावण का पुतला तो कुछ मिनटों में जल जाता है, लेकिन उसके भीतर छिपे अहंकार, लालच, स्वार्थ और वासना को जलाने में पूरी जिंदगी लग सकती है।
दशहरे की शाम जिस मैदान में रावण जलता है, उसी समाज में किसी बेटी के साथ अन्याय होता है। जिस शहर में अच्छाई की जीत के नारे गूंजते हैं, उसी शहर में कोई कमजोर व्यक्ति ताकतवर के शोषण का शिकार होता है। कहीं किसी महिला की गरिमा कुचली जाती है, कहीं किसी गरीब का हक मारा जाता है, कहीं रिश्तों में विश्वास टूटता है और कहीं सत्ता तथा धन के अहंकार में इंसानियत पीछे छूट जाती है।
विडंबना यह है कि इन बुराइयों में शामिल लोग भी रावण दहन देखने पहुंचते हैं। वे भी तालियां बजाते हैं, तस्वीरें खिंचवाते हैं और बुराई के अंत का उत्सव मनाते हैं। शायद उन्हें यह एहसास ही नहीं होता कि जिस बुराई को वे आग के हवाले कर रहे हैं, उसका कोई न कोई रूप उनके अपने व्यवहार में भी मौजूद है।
हम रावण के दस सिर तो गिन लेते हैं, लेकिन अपने भीतर बैठे एक सिर के अहंकार को भी पहचान नहीं पाते।
हम दूसरों की गलतियों पर तुरंत उंगली उठा देते हैं, लेकिन अपनी गलतियों के लिए बहाने खोज लेते हैं। दूसरे का क्रोध हमें बुराई लगता है, अपना क्रोध स्वाभिमान। दूसरे का लालच हमें गलत लगता है, अपना लालच जरूरत। दूसरे का अहंकार दिखाई देता है, लेकिन अपना अहंकार हमें आत्मसम्मान नजर आता है। यही वह भ्रम है, जो हमें हर साल रावण जलाने के बाद भी रावण से मुक्त नहीं होने देता।
राम केवल रावण का अंत करने वाले योद्धा नहीं हैं। वे मर्यादा, सत्य, कर्तव्य और संयम के प्रतीक भी हैं। इसलिए भगवान राम का नाम लेना जितना महत्वपूर्ण है, उनके आदर्शों को अपने व्यवहार में उतारना भी उतना ही जरूरी है। यदि हम राम की जय बोलते हैं, तो हमें उनके आदर्शों के अनुरूप निर्बल की रक्षा, स्त्री का सम्मान और सत्य का साथ देने का साहस भी दिखाना होगा।
दशहरा हमें दूसरों की बुराइयां गिनाने का अवसर नहीं, अपने भीतर झांकने का अवसर देता है। हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या हमने कभी अपने स्वार्थ के लिए किसी का नुकसान किया? क्या हमने किसी का अपमान किया? क्या हमने किसी कमजोर की मजबूरी का फायदा उठाया? क्या हमने गलत होते देखकर भी चुप रहना उचित समझा?
इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं, लेकिन रावण के वास्तविक अंत की शुरुआत इन्हीं सवालों से होती है।
क्योंकि रावण का पुतला जलाना एक परंपरा है, लेकिन अपने भीतर के रावण को जलाना एक जिम्मेदारी।
इस दशहरे पर आतिशबाजी जरूर कीजिए, उत्सव मनाइए और परंपरा निभाइए, लेकिन साथ ही अपने भीतर की किसी एक बुराई को समाप्त करने का संकल्प भी लीजिए। किसी का अपमान करने की आदत छोड़िए, किसी जरूरतमंद की मदद कीजिए, किसी अन्याय के खिलाफ आवाज उठाइए और अपने व्यवहार में थोड़ी अधिक संवेदनशीलता लाइए।
शायद तब दशहरा केवल कैलेंडर पर आने वाला एक त्योहार नहीं रहेगा, बल्कि हमारे जीवन में बदलाव लाने वाला दिन बन जाएगा।
और अगर स्वर्ग से रावण सचमुच हमें देख रहा होगा, तो इस बार उसे हंसने का अवसर नहीं मिलेगा। वह शायद पहली बार यह स्वीकार करेगा कि मनुष्य ने उसके पुतले को जलाने के साथ-साथ अपने भीतर की बुराई को भी चुनौती देना शुरू कर दिया है।
क्योंकि जिस दिन मनुष्य अपने भीतर के रावण को पहचानकर उसका अंत करना सीख जाएगा, उस दिन रावण दहन केवल एक आयोजन नहीं रहेगा—वह सचमुच अच्छाई की जीत का उत्सव बन जाएगा।

रावण तो जल जाएगा, क्या हमारे भीतर का रावण भी जलेगा?
ram


