स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है ध्वनि प्रदूषण

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-बाल मुकुन्द ओझा
पृथ्वी पर वायु और जल प्रदूषण के साथ ध्वनि प्रदूषण भी संकट का बड़ा कारण बन गया है। जब कभी ध्वनि आवश्यकता से अधिक तेज़ होती है तब उसे ध्वनि प्रदूषण कहते हैं। यह प्रदूषण जल तथा वायु प्रदूषण से एकदम भिन्न है, क्योंकि इसका दुष्प्रभाव तुरन्त होता है और स्थायी हानि हो जाती है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार वर्तमान में दुनियाभर में लगभग डेढ़ अरब लोग ध्वनि प्रदूषण के कारण कम सुनाई देने की समस्या के शिकार है। रिपोर्ट के मुताबिक यदि 2050 तक इस स्थिति में कोई सुधार नहीं होता है तो विश्व की 25 प्रतिशत आबादी कम सुनाई देने की अवस्था के साथ अपना जीवन जीने को मज़बूर होंगीे। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1972 में असहनीय ध्वनि को प्रदूषण का अंग माना हैं। तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण एवं यातायात के कारण ध्वनि प्रदूषण एक गंभीर समस्या के रूप में उभरा है और इसका कुप्रभाव मनुष्यों के ऊपर ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों एवं वनस्पतियों पर भी पड़ता है। फैक्ट्री, यातायात और निर्माण से सबसे अधिक ध्वनि प्रदूषण होता है और यह बच्चों व बुजुर्गों के लिए सबसे ज्यादा हानिकारक है। ध्वनि प्रदूषण मुख्यतः दो प्रकार के स्रोतों से होता है। प्राकृतिक स्रोत बिजली की कड़क, बादलों की गड़गड़ाहट, तेल हवाएं, ऊंचे स्थान से गिरता जल, आंधी, तूफान, ज्वालामुखी का फटना एवं उच्च तीव्रता वाली जल वर्षा आदि। कृत्रिम स्रोत यह स्रोत मानव जनित है। उदाहरणार्थ- मोटर वाहनों से उत्पन्न होने वाला शोर, वायुयानो से होने वाला शोर, रेलगाड़ियों तथा उनकी सीटी से होने वाला शोर, लाउडस्पीकरों एवं म्यूजिक सिस्टम से होने वाला शोर, टेलीफोन की घण्टी आदि से उत्पन्न होने वाला शोर आदि। ध्वनि प्रदूषण या अत्यधिक शोर किसी भी प्रकार के अनुपयोगी ध्वनियों को कहते हैं, जिससे मानव और जीव जन्तुओं को परेशानी होती है। इसमें यातायात के दौरान उत्पन्न होने वाला शोर मुख्य कारण है। जनसंख्या और विकास के साथ ही यातायात और वाहनों की संख्या में भी वृद्धि होती जिसके कारण यातायात के दौरान होने वाला ध्वनि प्रदूषण भी बढ़ने लगता है। अत्यधिक शोर से सुनने की शक्ति भी चले जाने का खतरा होता है।
भारत में औद्योगिकीकरण और शहरीकरण की बढ़ती हुई मांग लोगों में अवांछित आवाज के प्रदर्शन का कारण हैं। रणनीतियों का समझना, योजना बनाना और उन्हें प्रयोग करना ध्वनि प्रदूषण को रोकना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। वो आवाज जिसका हम प्रतिदिन निर्माण करते हैं जैसे, तेज संगीत सुनना, टीवी, फोन, मोबाइल का अनावश्यक प्रयोग, यातायात का शोर, कुत्ते का भौंकना, आदि ध्वनि उत्पन्न करने वाले स्त्रोत शहरी जीवन का एक अहम हिस्सा होने के साथ ही सबसे ज्यादा परेशान करने वाले, सिर दर्द, अनिद्रा, तनाव आदि कारण बनता हैं। ध्वनि प्रदूषण ने इसके स्त्रोत, प्रभाव और ध्वनि प्रदूषण को रोकने के उपायों के बारे में सामान्य जागरुकता की तत्काल आवश्यकता का निर्माण किया है। कार्यस्थल, शैक्षणिक संस्थान, आवासीय क्षेत्र, अस्पताल आदि स्थानों पर ध्वनि का तेज स्तर रोका जाना चाहिये। युवा बच्चों और विद्यार्थियों को तेज आवाज करने वाली गतिविधियों जैसे किसी भी अवसर पर तेज आवाज पैदा करने वाले उपकरणों और यंत्रो का प्रयोग आदि में शामिल न होने के लिये प्रोत्साहित किया जाना चाहिये। तेज आवाज करने वाले पटाखों के विशेष अवसरों जैसे त्योहारों, पार्टियों, शादियों, आदि में प्रयोग को कम करना चाहिये। ध्वनि प्रदूषण से संबंधित विषयों को पाठ्यपुस्तकों में जोड़ा जाये और विद्यालय में विभिन्न गतिविधियों जैसे लेक्चर, चर्चा आदि को आयोजित किया जा सकता है, ताकि नयी पीढ़ी अधिक जागरुक और जिम्मेदार नागरिक बन सके। स्वास्थ्य के लिहाज से ध्वनि प्रदूषण काफी हानिकारक है। इससे व्यक्ति बहरेपन से लेकर कई तरह की गंभीर बीमारियों का शिकार हो सकता है। ऐसे में ध्वनि प्रदूषण और फोन का कम इस्तेमाल करना चाहिए और जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए। शोर, हवा के माध्यम में संचरण करता है। ध्वनि की तीव्रता को नापने की निर्धारित इकाई को डेसीबल कहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि 100 डेसीबल से अधिक की ध्वनि हमारी श्रवण शक्ति को प्रभावित करती है। मनुष्य को यूरोटिक बनाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 1999 के दिशा निर्देशों में रिहाइशी क्षेत्रों के लिए 55 डीबी मानक की सिफारिश की थी, जबकि यातायात व व्यवसायिक क्षेत्रों के लिए यह सीमा 70 डीबी थी। इससे अधिक शोर ध्वनि प्रदूषण की श्रेणी में आएगा। प्रदूषण चाहे वह दूषित वायु के कारण हो या अत्यधिक ध्वनि के कारण, दोनों ही हमारे मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य के लिये, जीव-जंतुओं के पृथ्वी पर अस्तित्व के लिये तथा सांस्कृतिक धरोहरों के लिये खतरनाक है। इसका निवारण समय रहते आवश्यक है। स्वस्थ वातावरण हमारे स्वास्थ्य एवं विकास के लिये अत्यंत आवश्यक है।

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