सामाजिक न्याय का सन्देश : रोटी, कपड़ा और मकान

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बाल मुकुन्द ओझा
हमारे देश में आज़ादी के 77 साल बाद भी लोग रोटी, कपड़ा और मकान की बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे है। इस विषम स्थिति में सामाजिक न्याय की बात करना जले पर नमक छिड़कने के बराबर है। फिर भी देश और दुनिया सामाजिक न्याय दिवस एक बार फिर मनाने जा रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने हर साल 20 फरवरी को विश्व सामाजिक न्याय दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया। इस वर्ष 2026 की थीम सभी के लिए सामाजिक सुरक्षा और सम्मानजनक काम रखी गई है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि इस दिवस पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सभी वंचितों को रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में यथेष्ट कार्य करना चाहिए। यह दिवस रोटी, कपड़ा, मकान, सुरक्षा, चिकित्सा, अशिक्षा, गरीबी, और बेरोजगारी जैसे मुद्दों से निपटने के प्रयासों को बढ़ावा देने की जरूरत को पहचानने के लिए मनाने की शुरूआत की गयी है। गौर करने बात है दुनियां से जब तक अमीरी और गरीबी की खाई नहीं मिटेगी तब तक आम आदमी को सामाजिक न्याय प्राप्त करने की बातें बेमानी कही जाएगी। चाहे जितना चेतना और जागरूकता के गीत गालों कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। अब तो यह मानने वालों की तादाद कम नहीं है कि जब तक धरती और आसमान रहेगा तब तक आदमजात अमीरी और गरीबी नामक दो वर्गों में बंटा रहेगा। शोषक और शोषित की परिभाषा समय के साथ बदलती रहेगी मगर भूख और गरीबी का तांडव कायम रहेगा। अमीरी और गरीबी का अंतर कम जरूर हो सकता है मगर इसके लिए संपन्न और विकसित देशों को अपनी मानसिकता बदल कर कमजोर देशों को समुचित सहायता सुलभ करानी होंगी । सामाजिक न्याय हासिल करने के लिए अमीरी और गरीबी की बाधा को पाटना जरुरी है।
भारत की बात करें तो मोदी सरकार ने देश में सामाजिक और आर्थिक विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समुचित रूप से पहुँचाने का प्रयास अवश्य किया है। मगर चिंता की बात है यह है की तमाम प्रयासों के बावजूद अरबपतियों की संख्या में बढ़ोत्तरी संपन्न अर्थव्यवस्था का संकेत नहीं है। यह असफल आर्थिक व्यवस्था का एक लक्षण है। अमीरी और गरीबी के बीच बढ़ता विभाजन लोकतंत्र को कमजोर करता है। सामाजिक न्याय का मतलब समाज के सभी वर्गों को एक समान विकास और विकास के मौकों को उपलब्ध कराना है। आज विश्वभर में मानवाधिकारों का हनन सबसे बड़ा मुद्दा है। सामाजिक न्याय यह सुनिश्चित करता है कि समाज का कोई भी शख्स वर्ग, वर्ण या जाति की वजह से विकास की दौड़ में पीछे न रह जाए। और यह तभी संभव है जब समाज से गैर बराबरी और भेदभाव को हटाया जाए।
महात्मा गाँधी, अम्बेडकर और डॉ लोहिया जैसे महापुरुषों ने देश में समतामूलक समाज का सपना संजोया था। संविधान में भी बराबरी के बीज का बीजारोपण किया था। इसका एक मात्र उद्देश्य यह था की कोई भी धर्म और जाति से छोटा बड़ा नहीं होगा। सब बराबर होंगे ,अमीर गरीब के बीच विषमता नहीं होगी। मगर आजादी के 77 वर्षों बाद भी हमारा गैर बराबरी समाप्त करने का सपना पूरा नहीं हुआ। अमीर अधिक अमीर होता चला गया और गरीब के तन के कपडे भी खत्म हो गए। समाज में भेदभाव बढ़ गया ,जिसके फलस्वरूप रोटी ,कपडा और मकान की हमारी बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं हुई और हम इसी में उलझ कर रह गए। हमने प्रगति अवश्य की मगर अपनी मानसिकता में कोई बदलाव नहीं किया। छोटे बड़े की खाई बढ़ती गई। समाज का संतुलन बिगड़ गया। हालत यहाँ तक हो गई की शिक्षा भी अपने बच्चों को मनमाफिक नहीं दिला पाए। नौकर और मालिक की स्थिति समाज में पैदा हो गई। बेरोजगारी बढ़ गई और न्यूनतम जरूरतों के लिए भी आम आदमी जूझने की स्थिति में पहुँच गया। सामाजिक न्याय हमारे लिए अभिशाप बन गया। जब तक समाज में असंतुलन की खाई नहीं पटेगी तब तक सब को न्याय नहीं मिलेगा।
नीति आयोग द्वारा हाल ही जारी एक अध्ययन के अनुसार पिछले नौ वर्षों में भारत में 25 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से उबर गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहा कि दलित, ओबीसी और आदिवासी उनकी सरकार की गरीब समर्थक योजनाओं के सबसे बड़े लाभार्थी हैं। उन्होंने कहा कि पिछले 10 वर्षों में सबसे बड़ी उपलब्धि 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालना है। कुल मिलकर देखा जाये तो देश की गरीबी आंकड़ों के मायाजाल में फंसी दिखाई दे रही है। मगर यह अवश्य कहा जा सकता है कि पिछले एक दशक में गरीबी उन्मूलन के प्रयास जरूर सिरे चढ़े है। सरकारी स्तर पर यदि ईमानदारी से प्रयास किये जाये और जनधन का दुरूपयोग नहीं हो तो भारत शीघ्र गरीबी के अभिशाप से मुक्त हो कर सामाजिक न्याय के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है। समाज के गरीब, शोषित और पिछड़े तबके को बराबरी हक दिलाना ही सामाजिक न्याय है। सामाजिक विषमता को समाप्त कर हम सामाजिक न्याय के लक्ष्य को हासिल कर पाएंगे और इसके लिए सब के सामूहिक प्रयासों की जरुरत है।

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