नारी शक्ति की आस्था, प्रेम और समर्पण का जीवंत प्रतीक है करवा चौथ

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बाल मुकुन्द ओझा
भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं में करवा चौथ एक ऐसा महत्वपूर्ण पर्व है जो नारी शक्ति की आस्था, प्रेम और समर्पण का जीवंत प्रतीक माना जाता है। करवा चौथ केवल एक त्योहार नहीं है बल्कि यह पति-पत्नी के बीच के प्यार, विश्वास और समर्पण का प्रतीक भी है। यह दिन हर सुहागिन के लिए खास होता है, जब वे अपने पति की लंबी उम्र और सुखी जीवन के लिए व्रत रखती हैं। करवा चौथ दो शब्दों से मिलाकर बना है। करवा यानी मिट्टी का बर्तन और चौथ यानि चतुर्थी। इस पूजा में मिट्टी के बर्तन करवे का विशेष महत्त्व होता है। सुहागिनों का सबसे खास पर्व करवा चौथ का त्योहार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। करवा चौथ पर्व इस साल 29 अक्टूबर, गुरुवार को है। पंचांग के अनुसार चतुर्थी तिथि 29 अक्टूबर की शुरुआत में रात 1 बजकर 6 मिनट पर लगेगी और उसी दिन रात 10 बजकर 9 मिनट तक रहेगी। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:38 से 6:56 बजे तक है। इस दौरान महिलाएं देवी-देवताओं की पूजा और व्रत की पूरी विधि संपन्न करती हैं। करवा चौथ से पहले महिलाएं अपने घरों की सफाई और सजावट करती हैं। इस दिन वे विशेष रूप से श्रृंगार करती हैं, जैसे साड़ी या लहंगा पहनना, मेहंदी लगाना और बिंदी, चूड़ियां, सिंदूर आदि पहनकर सोलह श्रृंगार करती हैं। यह व्रत सूर्योदय से पहले सरगी (भोजन) खाने के साथ शुरू होता है, जिसे सास अपनी बहू को देती है। इसके बाद महिलाएं दिनभर बिना पानी पिए और बिना भोजन किए व्रत रखती हैं।
इस दिन महिलाएं रात को चांद देखकर उसे अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं। इस व्रत की शुरुआत सावित्री के त्याग और फल से हुई थी। पौराणिक कथा के अनुसार सावित्री अन्न जल त्याग कर यमराज से अपने पति को वापस लाई थी। यह व्रत सुबह सूर्योदय से पहले करीब 4 बजे के बाद शुरू होकर रात में चंद्रमा दर्शन के बाद संपूर्ण होता है। यह व्रत अच्छे गृहस्थ जीवन के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। स्त्री किसी भी आयु, जाति, वर्ण, संप्रदाय की हो, सबको इस व्रत को करने का अधिकार है। इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं। सोलह श्रृंगार में माथे पर लंबी सिंदूर अवश्य हो क्योंकि यह पति की लंबी उम्र का प्रतीक है। मंगलसूत्र, मांग टीका, बिंदिया ,काजल, नथनी, कर्णफूल, मेहंदी, कंगन, लाल रंग की चुनरी, बिछिया, पायल, कमरबंद, अंगूठी, बाजूबंद और गजरा ये 16 श्रृंगार में आते हैं। इस दिन सुहागिन स्त्रियां निर्जल व्रत कर चौथ माता से अपने पति की लम्बी उम्र की कामना करती है।
इस व्रत को उत्तर भारत में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। व्रत में चौथ माता के पूजन का महत्व सर्वाधिक है। इस दिन महिलाएं सजी थाली से पूजा करना शुभ मानती हैं। करवा चौथ के व्रत में चौथ माता की पूजा करना जरूरी होता है। थाली में सिंदूर, रोली, जल और सूखे मेवे रखते हैं। करवा चौथ के व्रत और पूजा में इस थाली का खासा महत्व होता है। इसलिए कुछ महिलाएं खुद भी ये थाली सजाती हैं। करवा चौथ पर भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा होती है। इस पूजा में शाम को सभी व्रती महिलाएं एक साथ बैठकर व्रत कथा कहती हैं। सबसे पहले चौथ माता की स्थापित मूर्ती पर फूल-माला और कलावा चढाया जाता है और उनके प्रतिमा के आगे करवा में जल भर कर रखा जाता है।
करवा चौथ के दिन चंद्रमा उदय होने का समय सभी महिलाओं के लिए बहुत महत्व का है क्योंकि वे अपने पति की लम्बी उम्र के लिये पूरे दिन (बिना पानी के) व्रत रखती हैं। वे केवल उगते हुये पूरे चाँद को देखने के बाद ही पानी पीती हैं। यह माना जाता है कि चाँद देखे बिना व्रत अधूरा है। इस दिन महिला न कुछ खा सकती हैं और न पानी पी सकती हैं। इस दिन महिलाएं शिव, पावर्ती और कार्तिक की पूजा-अर्चना करती हैं फिर शाम को छलनी से चंद्रमा और पति को देखते हुए पूजा करती हैं। पूजा के समय ही करवा चौथ की कथा सुनी जाती है. चन्द्रमा को छलनी से देखा जाना चाहिए। फिर अंत में पति के हाथों से जल पीकर व्रत समाप्त हो जाता है अंत में चांद का दीदार करने के बाद महिलाएं पति के हाथों पानी पीकर अपना व्रत तोड़ती हैं।

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