-सुनील कुमार महला
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का आर्टेमिस II मिशन चंद्रमा की ओर अग्रसर है। उल्लेखनीय है कि नासा ने 1 अप्रैल 2026 को (भारतीय समयानुसार 2 अप्रैल सुबह 3:54 बजे) इस मिशन का सफल प्रक्षेपण किया। यहां पाठकों को बताता चलूं कि वर्ष 1972 में अपोलो कार्यक्रम(प्रोग्राम) के बाद यह पहला अवसर है जब मानव को इतनी लंबी अंतरिक्ष यात्रा पर भेजा गया है। आर्टेमिस-2 के चारों अंतरिक्ष यात्री 3 अप्रैल को पृथ्वी की कक्षा छोड़कर चंद्रमा की ओर बढ़ चुके हैं। उपलब्ध जानकारी अनुसार यह पूरा अभियान 10 दिनों का निर्धारित है। इस अभियान के अंतर्गत शक्तिशाली स्पेस लांच सिस्टम (प्रक्षेपण यान) को फ्लोरिडा स्थित कैनेडी अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित किया गया, जो ओरियन स्पेसक्राफ्ट( यानी कि ओरियन यान) को लेकर गया है। इस महत्वपूर्ण अभियान में चार अंतरिक्ष यात्री शामिल हैं-एक महिला और तीन पुरुष। इनके नाम हैं-रीड वाइसमैन, विक्टर ग्लोवर, क्रिस्टीना कोच तथा कनाडाई अंतरिक्ष एजेंसी से जेरेमी हैनसेन। गौरतलब है कि क्रिस्टीना कोच के नाम पहले ही सबसे लंबी एकल अंतरिक्ष उड़ान का कीर्तिमान दर्ज है। जानकारी के अनुसार ये चारों ही अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा की परिक्रमा करेंगे।
प्रक्षेपण के बाद अंतरिक्ष यात्रियों ने लगभग 25 घंटे पृथ्वी के चारों ओर एक ऊँची और असमान कक्षा में चक्कर लगाया। इसके बाद ओरियन यान का मुख्य इंजन उन्हें लगभग 2,44,000 मील (3,93,000 किलोमीटर) दूर चंद्रमा की ओर ले जाएगा। यह यान चंद्रमा से लगभग 5,000 मील (8,000 किलोमीटर) आगे बढ़ते हुए पृथ्वी से अपनी अब तक की सबसे अधिक दूरी तय करेगा, जिससे अपोलो 13 का दूरी कीर्तिमान भी टूट जाएगा। इस प्रकार आर्टेमिस-2 के यात्री अब तक के सबसे दूर जाने वाले मानव बन जाएंगे। यहां पाठकों को यह भी जानकारी देता चलूं कि अपोलो-13 ने मानव अंतरिक्ष इतिहास में एक महत्वपूर्ण दूरी का कीर्तिमान स्थापित किया था। वास्तव में, यह मिशन मूल रूप से चंद्रमा पर उतरने के लिए भेजा गया था, लेकिन उड़ान के दौरान हुए विस्फोट के कारण इसे बीच में ही वापस लौटना पड़ा। वापसी के दौरान अंतरिक्ष यान चंद्रमा के पीछे से घूमते हुए पृथ्वी की ओर आया, जिसे ‘फ्री-रिटर्न ट्राजेक्टरी’ कहा जाता है। इस मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों ने पृथ्वी से लगभग 4,00,171 किलोमीटर (248,655 मील) की अधिकतम दूरी तय की, जो उस समय तक किसी भी मानव द्वारा अंतरिक्ष में तय की गई सबसे अधिक दूरी थी। इस प्रकार, अपोलो 13 भले ही अपने मुख्य उद्देश्य में सफल नहीं रहा, लेकिन उसने दूरी के मामले में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की।
हाल फिलहाल, आर्टेमिस-2 अभियान की योजना के अनुसार, अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा से कई हजार मील दूर जाकर वापस मुड़ेंगे और फिर पृथ्वी की ओर लौटेंगे। चंद्रमा के पीछे से निकलने के बाद, उड़ान के दसवें दिन-अर्थात प्रक्षेपण के नौ दिन, एक घंटे और 46 मिनट बाद-वे पृथ्वी पर लौट आएंगे। यह वापसी अपोलो अभियानों की तरह प्रशांत महासागर में जल-अवतरण के रूप में होगी।इस अभियान के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा के सुदूर भाग के ऐसे क्षेत्रों को देखने का अवसर मिलेगा, जिन्हें पहले कभी नहीं देखा गया। लगभग छह घंटे की निकटतम परिक्रमा के दौरान चंद्रमा एक बास्केटबॉल के आकार का दिखाई देगा। यहां यह उल्लेखनीय है कि जेरेड इसाकमैन के नेतृत्व में इस अभियान में प्रेरक तस्वीरें लेने के लिए स्मार्टफोन भी शामिल किए गए हैं। नासा द्वारा साझा की गई तस्वीर में चंद्रमा की सतह पर स्थित ओरिएंटेल बेसिन स्पष्ट दिखाई देता है, जो अब तक अनदेखा क्षेत्र माना जाता रहा है-यह एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि है। मीडिया में उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह अभियान लगभग 4,00,000 किलोमीटर की दूरी तय करेगा। यान चंद्रमा की सतह पर नहीं उतरेगा और न ही उसकी कक्षा में प्रवेश करेगा, बल्कि बाहरी पथ से उसकी परिक्रमा करेगा। इस पूरे अभियान का उद्देश्य चंद्रमा के सुदूर और रहस्यमय भाग का अध्ययन करना तथा भविष्य में मानव बसावट की संभावनाओं को परखना है। अच्छी बात यह है कि लगभग 53 वर्षों बाद इस प्रकार का मानवयुक्त चंद्र अभियान संभव हो पाया है तथा वर्ष 1972 के बाद ये चारों अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा की यात्रा करने वाले पहले मानव हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि इससे मानव समाज में अंतरिक्ष विज्ञान के प्रति नया आकर्षण उत्पन्न होगा। ऐतिहासिक दृष्टि से, शीत युद्ध के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच चंद्रमा पर पहुंचने की होड़ लगी थी, जिसमें अमेरिका सफल रहा। बाद में यह प्रतिस्पर्धा धीमी पड़ गई और दशकों तक कोई बड़ा मानवयुक्त अभियान नहीं हुआ। वर्तमान में हमारे देश का पड़ोसी चीन इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, जिससे प्रतिस्पर्धा फिर तेज हो गई है। यदि आर्टेमिस-2 अभियान सफल होता है, तो अगला कदम मानव को चंद्रमा की सतह पर उतारना होगा। ‘नासा’ की दीर्घकालिक योजना चंद्रमा पर स्थायी मानव उपस्थिति स्थापित करने की है, जिससे अन्य ग्रहों तक पहुंच आसान हो सके। वर्तमान अंतरिक्ष केंद्र इस प्रकार के प्रक्षेपण के लिए उपयुक्त नहीं हैं, इसलिए चंद्रमा पर आधार स्थापित करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यहां यह गौरतलब है कि नासा का लक्ष्य वर्ष 2028 तक चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट अंतरिक्ष यात्रियों को उतारना है। वहीं चीन 2030 तक अपने मानव अभियान की तैयारी में जुटा है, जबकि ‘इसरो'(भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी) ने वर्ष 2040 तक मानव को चंद्रमा पर भेजने का लक्ष्य रखा है। भारत ने चंद्रयान-3 की सफलता के साथ चंद्रमा पर उतरने की क्षमता प्राप्त कर ली है और अब वहां से सुरक्षित वापसी की दिशा में कार्य कर रहा है। भारतीय वैज्ञानिक इस दिशा में पूर्ण तत्परता से कार्यरत हैं और उनके प्रयासों में निरंतरता बनी रहनी चाहिए।
अंत में यही कहूंगा कि ‘नासा’ का आर्टेमिस प्रोग्राम मानवता के अंतरिक्ष इतिहास में एक नई शुरुआत का प्रतीक है। इसका मुख्य उद्देश्य केवल चंद्रमा तक पहुंचना नहीं, बल्कि वहां स्थायी मानव उपस्थिति स्थापित करना और भविष्य में मंगल जैसे ग्रहों तक जाने की तैयारी करना है।निष्कर्षत: यह बात कही जा सकती है कि आर्टेमिस मिशन न केवल वैज्ञानिक खोजों को नई दिशा देगा, बल्कि यह तकनीकी प्रगति, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और अंतरिक्ष में मानव विस्तार की संभावनाओं को भी मजबूत करेगा। यह मिशन दर्शाता है कि आने वाला समय अंतरिक्ष में मानव सभ्यता के विस्तार का है, जहां चंद्रमा एक महत्वपूर्ण पड़ाव बनेगा।



