जी2 के गैरकानूनी आदेश लागू किए, देश पर बोझ हैं ज्ञानेश कुमार; कांग्रेस ने इस्तीफा मांगा

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नई दिल्ली। कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को तत्काल हटाए जाने की मांग रखी है। पार्टी के महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि चुनावी प्रक्रिया की निगरानी और जी2 के गैरकानूनी आदेशों को लागू करने की वजह से ज्ञानेश कुमार देश के लिए बोझ बन गए हैं। जयराम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के लिए ‘जी2’ शब्द का इस्तेमाल किया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां की टिप्पणी वाला वीडियो शेयर करते हुए कहा कि ज्ञानेश ने पद पर बने रहने का अपना नैतिक अधिकार खो दिया है। अगर उनमें शर्म बाकी है तो उन्हें तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए। कांग्रेस का यह हमला जस्टिस उज्जल भुइयां की उस टिप्पणी के एक दिन बाद आया, जिसमें उन्होंने लाखों भारतीय नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित करने वाली किसी भी प्रक्रिया को स्वभाव से मनमाना बताया था। NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के कार्यक्रम में बोलते हुए भुइयां ने कहा कि संविधान नागरिकों को दो वर्गों में नहीं बांटता, एक ऐसा वर्ग जिसके पास वोट देने का अधिकार हो और दूसरा जिसके पास यह अधिकार न हो। उन्होंने कहा कि अगर किसी प्रक्रिया से लाखों नागरिक मतदान के अधिकार से वंचित होते हैं और अपने ही देश में दूसरे दर्जे के नागरिक बन जाते हैं, तो ऐसी प्रक्रिया संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ होगी। ऐसी स्थिति को किसी भी तरह के तर्क से सही नहीं ठहराया जा सकता।

CEC पर गैरकानूनी काम करने का आरोप
कांग्रेस के सीनियर नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने भी ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने पूरी तरह गैरकानूनी तरीके से काम किया और चुनाव आयुक्तों की शक्तियों से जुड़े संसद के कानून का उल्लंघन किया। चव्हाण ने कहा कि SIR प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की लिखित आपत्तियों के बाद ज्ञानेश कुमार के काम पर गंभीर सवाल उठे हैं।

‘संविधान की भावना का उल्लंघन’
जयराम रमेश ने इससे पहले भी जस्टिस भुइयां की टिप्पणी का हवाला देते हुए आरोप लगाया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने संविधान की भावना और उसके प्रावधानों, दोनों का उल्लंघन किया है। उन्होंने कहा कि वोट देने का अधिकार संविधान के मूल ढांचे से जुड़ा है। वहीं, जस्टिस भुइयां ने कहा कि मतदान का अधिकार केवल संसद के कानून से मिलने वाला अधिकार नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र और संविधान के मूल ढांचे का अहम हिस्सा है। कोई भी अथॉरिटी ऐसा नहीं कर सकता और न ही कोई अदालत इसे सही ठहरा सकती है।

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