विदेश में डंकी रूट से साइबर धोखाधड़ी तक में फंसते भारतीय

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-संजय सक्सेना
भारत में अवैध घुसपैठ हमेशा से एक संवेदनशील राजनीतिक और सुरक्षा मुद्दा रहा है, जिस पर हर चुनाव और संसद के हर सत्र में सियासी दल अपनी रोटियां सेकते नजर आते हैं। सीमाओं की सुरक्षा, राष्ट्रीय अखंडता और आंतरिक सुरक्षा के नाम पर बहसें और तीखे बयान राजनीति का स्थायी हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन जब ज़मीनी हकीकत और सरकारी आंकड़ों की कसौटी पर इस बहस को परखा जाता है, तो एक बेहद चौंकाने वाली और विरोधाभासी तस्वीर उभरकर सामने आती है। विदेश मंत्रालय की तरफ से संसद में रखे गए हालिया आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि एक तरफ जहां भारत अपनी सरहदों के भीतर अवैध प्रवासियों पर नकेल कसने में प्रशासनिक और कानूनी जटिलताओं के चलते संघर्ष कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ दुनिया के अलग-अलग देशों में रोजगार और बेहतर भविष्य की तलाश में गए हजारों भारतीय अवैध आप्रवासन के जाल में फंसकर हर साल डिपोर्ट किए जा रहे हैं। यह स्थिति न केवल भारत की घरेलू सुरक्षा प्रणालियों की सीमाओं को उजागर करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि कैसे वैश्विक स्तर पर भारतीय नागरिक कड़े आव्रजन कानूनों के शिकार बन रहे हैं।

विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, केवल वर्ष 2025 में ही करीब 19,811 भारतीयों को दुनिया के विभिन्न देशों में अवैध आप्रवासन के आरोप में हिरासत में लिया गया और फिर उन्हें वापस उनके वतन भेज दिया गया। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि बेरोजगारी, गरीबी और बेहतर आजीविका की लालसा में युवा किस हद तक जोखिम उठाने को तैयार रहते हैं। इसके विपरीत, यदि भारत के भीतर अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो स्थिति बिल्कुल उलट और बेहद सुस्त प्रतीत होती है। हालांकि भारत में अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों को हिरासत में लेने के आधिकारिक और समेकित आंकड़े सार्वजनिक रूप से पूरी पारदर्शिता के साथ उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन विभिन्न खुफिया, सुरक्षा और प्रशासनिक सूत्रों से प्राप्त जानकारी बताती है कि देश में हर साल बमुश्किल दो से ढाई हजार विदेशी नागरिकों को ही हिरासत में लिया जाता है और फिर लंबी कानूनी तथा कूटनीतिक प्रक्रियाओं को पूरा करने के बाद उन्हें डिपोर्ट किया जाता है। यह विसंगति देश की आंतरिक सुरक्षा और प्रवर्तन एजेंसियों की क्षमता पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाती है कि आखिर सीमाओं के रास्ते आने वाले लाखों अवैध प्रवासियों की तुलना में यह आंकड़ा इतना कम क्यों है।

वर्ष 2025 के आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण करने पर यह साफ हो जाता है कि भारतीय नागरिकों के डिपोर्टेशन का दायरा केवल पारंपरिक रूप से खाड़ी देशों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह अब दुनिया के कोने-कोने तक फैल चुका है। खाड़ी देशों में भारत से नजदीकी और रोजगार के प्रचुर अवसरों के कारण बड़े पैमाने पर लोग जाते हैं, लेकिन कई बार वीजा की अवधि समाप्त होने, समय पर नवीनीकरण न होने या फिर एजेंटों के बहकावे में आकर लोग अवैध रूप से कार्य करने लगते हैं। 2025 में अकेले संयुक्त अरब अमीरात से 7,896 भारतीयों को डिपोर्ट किया गया, जो किसी भी एक देश से सबसे बड़ा आंकड़ा है। इसी तरह अमेरिका से 3,500 भारतीयों को वापस भेजा गया, जो इस बात का संकेत है कि ‘डंकी रूट’ या अवैध रास्तों से अमेरिका में प्रवेश करने का क्रेज युवाओं में कितना घातक साबित हो रहा है। मलेशिया से 1,675, म्यांमार से 1,676 और कंबोडिया से 1,300 भारतीयों को भारत वापस भेजा गया। कंबोडिया और म्यांमार जैसे देशों से डिपोर्टेशन के मामलों में हाल के वर्षों में भारी उछाल आया है, जिसके पीछे साइबर फ्रॉड और नौकरी के फर्जी विज्ञापनों के जरिए युवाओं को बंधक बनाए जाने और अवैध गतिविधियों में धकेले जाने के मामले मुख्य कारण रहे हैं।

सबसे दिलचस्प और चौंकाने वाली बात यह है कि भारतीय नागरिक अब उन छोटे-छोटे और अप्रत्याशित देशों से भी डिपोर्ट हो रहे हैं, जिनके बारे में आम तौर पर ज्यादा चर्चा नहीं होती। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025 में जॉर्जिया में 12, कोलंबिया में 30, जमैका में 3, लिथुआनिया में 4, माल्टा में 3, स्लोवाक गणराज्य में 27 और यहां तक कि पड़ोसी देश बांग्लादेश में भी 231 भारतीयों को हिरासत में लिया गया या डिपोर्ट किया गया। लैटिन अमेरिकी देश जैसे कोलंबिया और कैरेबियाई देश जैसे जमैका अमेरिकी महाद्वीप में प्रवेश करने के लिए अवैध एजेंटों द्वारा ट्रांजिट रूट के रूप में उपयोग किए जाते हैं, जहां भारतीय नागरिक मानव तस्करों के चंगुल में फंसकर अपनी गाढ़ी कमाई गंवा बैठते हैं और अंततः विदेशी जेलों या हिरासत केंद्रों में पहुंचते हैं। यूरोपीय देश जैसे लिथुआनिया, माल्टा और स्लोवाकिया भी अब ऐसे भारतीयों के निशाने पर हैं, जो शेंगेन वीजा के नियमों का उल्लंघन कर पश्चिमी यूरोप में दाखिल होना चाहते हैं, लेकिन कानूनों के शिकंजे में फंसकर वापस भेज दिए जाते हैं।

अवैध प्रवासन और डिपोर्टेशन का यह संकट कोई नया नहीं है, बल्कि इसका एक लंबा और दर्दनाक इतिहास रहा है। यदि हम पिछले दशकों के मामलों पर नजर डालें, तो पाएंगे कि समय-समय पर बड़े पैमाने पर भारतीयों को विदेशी धरती से खदेड़ा गया है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो खाड़ी युद्ध (1990-91) के दौरान कुवैत और इराक से लाखों भारतीयों को युद्ध के हालातों के चलते अचानक वापस लौटना पड़ा था, हालांकि वह मुख्य रूप से युद्ध जनित पलायन था, लेकिन उसके बाद के दशकों में वीजा नियमों के उल्लंघन और अवैध रूप से रहने के कारण डिपोर्टेशन की घटनाएं लगातार बढ़ती गईं। दशक पहले सऊदी अरब में निताकात कानून के सख्त होने पर लाखों भारतीयों को अपनी नौकरियां गंवानी पड़ी थीं और हजारों को वैध दस्तावेज न होने पर भारत वापस डिपोर्ट किया गया था। इसी तरह यूनाइटेड किंगडम और यूरोपीय देशों द्वारा चलाए गए ऑपरेशन रिटर्न के तहत अनधिकृत रूप से रह रहे हजारों भारतीयों को चार्टर्ड उड़ानों के जरिए भारत भेजा जा चुका है।

हालिया वर्षों में अमेरिका द्वारा सैन्य विमानों या विशेष उड़ानों के जरिए भारतीयों को हथकड़ी लगाकर सामूहिक रूप से डिपोर्ट किए जाने की तस्वीरें भारतीय मीडिया में सुर्खियों में रही हैं। वर्ष 2020 और उसके बाद के कोविड काल के दौरान भी खाड़ी देशों और यूरोप से हजारों भारतीय कामगारों को बिना वैध वीजा या काम के अधिकारों के डिपोर्ट किया गया था। इन पुराने मामलों से यह स्पष्ट होता है कि सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा समय-समय पर कड़े आव्रजन कानून लागू किए जाने के बावजूद भारतीय युवाओं का विदेश मोह कम नहीं हुआ है। एजेंटों का सिंडिकेट युवाओं को विदेशों में सुनहरे भविष्य का सपना दिखाकर अवैध रास्तों से भेजने का खेल लगातार खेल रहा है, जिसके परिणामस्वरूप हर साल हजारों परिवार सामाजिक और आर्थिक बर्बादी की कगार पर पहुंच जाते हैं। डिपोर्ट होकर लौटने वाले अधिकांश युवा कर्ज के दलदल में फंसे होते हैं, क्योंकि उन्होंने अपनी जमीन गिरवी रखकर या भारी ब्याज पर कर्ज लेकर एजेंटों को लाखों रुपये दिए होते हैं। कुल मिलाकर भारत के भीतर अवैध घुसपैठियों के डिपोर्टेशन के आंकड़े और विदेशों से डिपोर्ट होने वाले भारतीयों की संख्या के बीच का यह भारी अंतर देश की नीतियों और प्रशासनिक तंत्र की गंभीर कमियों को उजागर करता है।

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