जातिगत सक्रियता

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भारतीय संविधान में जातिविहीन एवं वर्गविहीन समाज की स्थापना की परिकल्पना की गई है एवं सामाजिक न्याय, समानता और सामंजस्य स्थापित करना संविधान के मुख्य उद्देश्य के रूप में प्रतिपादित किया गया है। अनुच्छेद 15(4) में सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन का उल्लेख है और पिछड़ेपन के निश्चय करने में जाति एक महत्वपूर्ण बिन्दू है। सामाजिक स्तर के निर्धारण में गरीबी एक महत्वपूर्ण कारक है और गरीबी और सामाजिक पिछड़ापन को अलग नहीं किया जा सकता। सामाजिक पिछड़ापन प्रधान है। जो लोग समाज में वर्ग प्रभेद अथवा अहितकारी सिद्धान्तों की वजह से सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़ गये और सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व कम हो गया उसे पिछड़ा वर्ग में सम्मिलित किया गया। संविधान के अनुसार जनसंख्या के अनुपात में सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व होना आवश्यक नहीं है, पर्याप्त प्रतिनिधित्व होना आवश्यक है। योग्यता हेतु आवश्यक अंक, आयु, फीस, मूल्यांकन में उपयुक्त कमी की जा सकती है। जो व्यक्ति क्रिमीलयेर में आते हैं वे आरक्षण के लाभ से वंचित रखे गये है। अपवर्जन का सिद्धान्त लागू किया गया है।
पिछड़ा वर्ग सूची को एक निश्चित प्रक्रिया अपनाकर, मापदण्ड बनाये जाकर, दो अथवा तीन भागों में बांटा जा सकता है यानि एक से अधिक सूचियं बनाई जा सकती है। सर्वेक्षण, जांच, अध्ययन, सुनवाई आवश्यक आंकड़े एकत्रित कर ऐतराजात सुनने के पश्चात न्यायिक अदालत की तरह ज्यूडिशियल निर्णय आवश्यक है क्योंकि ऐसे फैसले अन्य जातिय समूह पिछड़ों को प्रभावित करते हैं, न्यायालय की परिधि में आते है।
पिछड़ा वर्ग सूचियों में उपयुक्त जांच के पश्चात नाम जोड़े जा सकते हैं, हटाये जा सकते हैं। लगातार समीक्षा हेतु परमानेन्ट आयोग निर्मित किये गये है परन्तु दस साल में तो पूरी लिस्ट का अनिवार्य रिवीजन आवश्यक बताया गया है। दुर्भाग्य से फैसले राजनैतिक पार्टियों के घोषणा पत्रों, सार्वजनिक घोषणाओं, इच्छाओं और निर्देशों के आधार पर होने लगे है। मजबूत एवं संगठित जातियां शिक्षित एवं बढ़ चढ़कर बोलने वाली जातियां जिनके पास राजनैतिक शक्ति है, जो विकसित व भूमिधारी है उनके नाम सम्मिलित किये गये। जनगणना संख्या, सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक स्थिति को जानने के लिए नहीं की जा रही है। साधन सम्पन्न, उन्नत, संगठित व सामाजिक, राजनैतिक वर्चस्व वाली जातियां आरक्षण का लाभ ले रही है। क्रिमीलेयर की सीमा लगातार बढ़ाई जा रही है। गरीब व अत्यधिक पिछड़ी जातियों को उपयुक्त लाभ नहीं मिल रहा है, उनका शोषण हो रहा है। सभी प्रक्रिया व मानदण्ड भुला दिये गये है। जब नाम जोड़ने की प्रक्रिया चल रही है तो नाम हटाने की संभावना नहीं रही। आरक्षण का लाभ अब केवल उन्नत व सशक्त को मिल रहा है। दलित, पिछड़े, अधिक पिछड़े व गरीब आरक्षण से वंचित रह रहे हैं।
पिछड़ों, दलितों को नौकरी, शिक्षा में आरक्षण मिलना चाहिए जिससे वे देश की मूल धारा में शामिल हो सके। सामाजिक न्याय के नाम पर राजनीति और समाज को जातिगत बांटना समाज व देश के हित में नहीं है। सामाजिक एकता में कमी आयेगी तो देश की एकता प्रभावित होगी क्योंकि सामाजिक एकता देश की एकतारूपी किले की नींव की भांति है। किसी जाति को आरक्षण दिलाकर उसका राजनीतिक लाभ सामाजिक न्याय नहीं है। धार्मिक व जातीय बिखराव से सामाजिक समरसता और सामाजिक एकता के स्थान पर जातीय संघर्ष की स्थिति पैदा होगी। साम्प्रदायिक घृणा व जातिवादी पूर्वाग्रह दूर करने की बजाय भारत को खुद के खिलाफ ही संघर्ष करना होगा।
लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले पं. जवाहरलाल नेहरू ने समाज के दलित, शोषित, हाशिये पर पड़े वर्गो विशेषकर आदिवासी और दलितों के लिए तमाम ऐसी नीतियां बनाई थी जो सकारात्मक तरीके से भेदभाव को खत्म करें परन्तु बाद के राजनेताओं ने जातीय व धार्मिक सद्भाव के साथ खिलवाड़ करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई। वी.पी. सिंह ने आरक्षण का दायरा धार्मिक व साम्प्रदायिक राजनीति को टक्कर देने के लिए किया। अर्जुन सिंह ने आईआईटी, आईआईएम व मेडिकल कालेजों में आरक्षण बढ़ाने का कदम उठाया। वास्तव में जो कदम सामाजिक न्याय के लिए किये जाने चाहिए थे यानि प्राथमिक स्तर से ही अच्छी और समान शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं व नागरिक सुविधाओं की दूर-दराज के इलाकों तक फैला प्रभावकारी तंत्र व भूमि सुधार जिससे देश की समस्त जनता के हालत सुधर सके, नहीं उठाये गये। सिर्फ आरक्षण को बनाये रखने और उसका प्रतिशत बढ़ाने के ही कदमों से व उपरोक्त मुद्दों पर ध्यान नहीं देने से जातियों के हितों के नाम पर धोखाधड़ी होगी। जनता के हित के कीमत पर वोट बैंक को मजबूत करने के लिए समय-समय पर प्रतिशत बढ़ाने के आन्दोलन लोकतंत्र को हानि पंहुचायेंगे। जातीय व धार्मिक सद्भाव से खिलवाड़ होगा। जाति वोट बैंक में अखिल भारतीय जातिगत संगठन कारगर हो रहे हैं।
लोकतंत्र में राजनैतिक दल उम्मीद्वार चयन में योग्यता, ईमानदारी, जनसेवा की बजाय जातिय व सम्प्रदाय गणना व गणित देख रहे है और यही कारण है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में गिरावट आ रही है, प्रशासनिक ढांचा बिगड़ रहा है, भ्रष्टाचार, असमानता बढ़ रही है। प्रदेश की राजनीति में जातिय वोट बैंक अहम हो गया है। जातिय वोट बैंक के नये-नये मसीहा पैदा हो रहे है। राजनीति दल जातिय व सम्प्रदाय के आधार पर पार्टी लीडर व मंत्री बना रहे है।
गरीबी की समस्या व्यापकतौर पर उपस्थित है। अनेक समुदाय उपेक्षा व अन्याय का शिकार हो रहे है लेकिन जो जातियां समृद्ध, भूस्वामियों, धर्म मठो, व्यापारियों या शासक वर्ग से जुड़ी रही वे भारतीय समाज का उपरी हिस्सा है उन्हें पर्याप्त आर्थिक, सामाजिक अवसर मिल रहे है। उन्हें शिक्षा, समृद्धि और प्रगति से वंचित नहीं किया गया बल्कि संख्या से ज्यादा, संख्या के अनुपात में अधिक अवसर मिले। देश जाति विहीन, वर्ग विहीन समाज स्थापना के लक्ष्य से दूर हो गया। केवल जाति ही प्रत्येक क्षेत्र में असरदार कारक बन गई। जातिवाद कम नहीं हुआ अपितु हर क्षेत्र में बढ़ गया, जो देश के लिए अहितकर साबित होगा।

-डा. सत्यनारायण सिंह

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