अलवर। सोशल मीडिया पर वायरल हुए मासूम बच्चों के वीडियो ने जब हजारों लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा तो उनकी पीड़ा राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली तक भी पहुंची। बच्चों के दर्द और उनकी बेबसी ने उन्हें इतना व्यथित किया कि शुक्रवार को वे अलवर के कंपनी बाग स्थित हाट बाजार पहुंच गए। यहां उन्होंने वायरल वीडियो में नजर आए बच्चों से मुलाकात की, उनके बीच बैठकर उनकी बातें सुनीं और परिवार की आर्थिक परिस्थितियों को समझने का प्रयास किया। इस दौरान जूली का अंदाज केवल एक राजनेता का नहीं, बल्कि उन बच्चों की तकलीफ समझने वाले एक संवेदनशील जनप्रतिनिधि का नजर आया। उन्होंने बच्चों से आत्मीयता के साथ बातचीत की और उनका हौसला बढ़ाया। बच्चों के चेहरे पर मुस्कान लाने के उद्देश्य से उन्होंने उनसे सामान खरीदा। इतना ही नहीं, बाजार के दूसरे दुकानदारों से भी खरीदारी कर उनके रोजगार को प्रोत्साहित किया। जूली ने भावुक होते हुए कहा कि बच्चे का वीडियो देखने के बाद उनके मन में उससे मिलने और उसकी पीड़ा समझने की इच्छा हुई। जब एक मासूम बच्चा यह कहता है कि हम गरीब हैं और हमारी सुनने वाला कोई नहीं है, तो यह बात किसी भी संवेदनशील इंसान को भीतर तक झकझोर देती है। आखिर उन बच्चों की क्या गलती है, जिन्हें बचपन में ही परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों का बोझ उठाना पड़ रहा है? उन्होंने कहा कि जिन नन्हे हाथों में किताबें और कलम होनी चाहिए, जिन बच्चों के कंधों पर स्कूल का बस्ता होना चाहिए और जिनकी दुनिया खेलकूद एवं पढ़ाई से भरी होनी चाहिए, आज उन्हीं हाथों में सामान बेचने की मजबूरी है। यह केवल कुछ बच्चों की पीड़ा नहीं, बल्कि समाज और व्यवस्था के सामने खड़ा एक गंभीर सवाल है। नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि सरकार और प्रशासन को ऐसे गरीब परिवारों की परिस्थितियों को गंभीरता से समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि दूसरे स्थानों से आकर लोग यहां अपना व्यवसाय कर रहे हैं, वहीं स्थानीय गरीब परिवारों और उनके बच्चों की आजीविका एवं भविष्य को लेकर भी संवेदनशीलता के साथ विचार किया जाना जरूरी है। हर बच्चे को शिक्षा, सम्मान और बेहतर भविष्य का अवसर मिलना चाहिए। जूली ने कहा कि बच्चों का बचपन मजदूरी और आर्थिक मजबूरियों में नहीं गुजरना चाहिए। समाज और सरकार की जिम्मेदारी है कि कोई भी बच्चा अभाव के कारण शिक्षा से वंचित न रहे। हाट बाजार में जूली की बच्चों और दुकानदारों से मुलाकात ने वहां मौजूद लोगों का ध्यान खींचा। वायरल वीडियो से शुरू हुई चर्चा अब एक बड़े सामाजिक सवाल में बदल गई है। बच्चों की आंखों में बेहतर भविष्य के सपने हैं, लेकिन आर्थिक मजबूरियां उनके बचपन के रास्ते में खड़ी हैं। जूली की इस पहल ने एक बार फिर यह सवाल समाज के सामने रख दिया है कि क्या हमारा प्रयास केवल इन बच्चों की कहानी सुनने तक सीमित रहेगा या इनके हाथों में सामान की जगह किताबें थमाने के लिए भी ठोस कदम उठाए जाएंगे?

बच्चों की पीड़ा ने झकझोरा तो हाट बाजार पहुंचे टीकाराम जूली, बच्चों के बीच बैठकर सुना दर्द, खुद खरीदारी कर बढ़ाया हौसला
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