यादों से रोशन दिवाली

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-सुनील कुमार महला,
फ्रीलांस राइटर,
कालमिस्ट व युवा साहित्यकार

दिवाली आने वाली थी। बाजार रंग-बिरंगी रोशनियों से जगमगा रहे थे। घरों में सफाई चल रही थी, मिठाइयों की खुशबू गलियों में फैल रही थी और बच्चे नए कपड़ों तथा पटाखों को लेकर उत्साहित थे। हर कोई अपनों के साथ त्योहार मनाने की तैयारियों में जुटा था। लेकिन आरुष के लिए दिवाली का अर्थ कुछ अलग था। वह एक अर्धसैनिक बल का जवान था। घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर, घने जंगलों, ऊंचे पहाड़ों और दुर्गम सीमावर्ती चौकियों के बीच उसकी जिंदगी गुजर रही थी। कभी बर्फीली हवाएं तो कभी जंगलों की खामोशी उसकी साथी थीं। त्योहारों पर घर की याद जरूर सताती थी, लेकिन वर्दी पहनते ही वह अपनी भावनाओं को जिम्मेदारियों के पीछे छिपा लेता था।एक दिन उसके अधिकारी ने उसे बुलाया और एक विशेष जिम्मेदारी सौंपी। कुछ ही दिनों बाद एक शहीद जवान का शहीद दिवस था। फोर्स (बल) की ओर से उनके पैतृक गांव के राजकीय विद्यालय में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया जाना था। आरुष को वहां जाकर शहीद की प्रतिमा पर पुष्पमाला अर्पित करनी थी, उनकी पत्नी को सम्मानस्वरूप शॉल ओढ़ानी थी, एक सिलाई मशीन भेंट करनी थी और गांव के बच्चों में मिठाइयां वितरित करनी थीं। अधिकारी ने कहा, ‘आरुष, याद रखना, हम केवल एक शहीद को श्रद्धांजलि देने नहीं जा रहे, बल्कि उस परिवार के पास जा रहे हैं जिसने देश के लिए अपना सबसे अनमोल रिश्ता खोया है। उन्हें यह महसूस होना चाहिए कि वे अकेले नहीं हैं।’ आरुष ने आदेश स्वीकार किया, लेकिन उसे अंदाजा नहीं था कि यह जिम्मेदारी उसके हृदय पर इतनी गहरी छाप छोड़ जाएगी। निर्धारित दिन वह वर्दी पहनकर आवश्यक सामान के साथ गांव पहुंचा। गांव में दिवाली की चहल-पहल थी। बच्चे घरों के बाहर खेल रहे थे और महिलाएं आंगन में रंगोली बना रही थीं। विद्यालय के प्रांगण में शहीद की प्रतिमा तिरंगे के रंगों से सजी हुई थी। आरुष ने प्रतिमा के सामने पहुंचकर सावधान की मुद्रा में सैल्यूट किया। कुछ क्षण तक वह तस्वीर को निहारता रहा। उसे लगा जैसे वर्दी पहने वह जवान अभी बोल पड़ेगा और अपने किसी साथी को आवाज लगाएगा। थोड़ी देर बाद शहीद की पत्नी विद्यालय पहुंचीं। चेहरे पर उम्र और संघर्ष की लकीरें थीं। आंखों में एक ऐसा खालीपन था, जिसे देखकर किसी का भी हृदय भर आए। आरुष ने आगे बढ़कर उन्हें नमस्कार किया और अपना परिचय दिया। जैसे ही उन्होंने सुना कि वह भी उनके पति के ही बल का जवान है, उनकी आंखें भर आईं। उन्होंने आरुष के कंधे पर लगे बैज को छुआ और कुछ क्षण उसे देखती रहीं। फिर धीमे स्वर में बोलीं, ‘बेटा, तुम्हारी यह वर्दी देखकर ऐसा लगता है जैसे आज मेरा अपना घर लौट आया हो।’ आरुष के पास कोई जवाब नहीं था। उसने बस उनके सामने सिर झुका लिया। कुछ ही समय में कार्यक्रम शुरू हुआ। आरुष ने शहीद की प्रतिमा पर पुष्पमाला अर्पित की और सैल्यूट किया। विद्यालय के बच्चों ने देशभक्ति गीत गाया। इसके बाद उसने शहीद की पत्नी को शॉल ओढ़ाई और सिलाई मशीन भेंट करते हुए कहा, ‘माताजी, यह हमारे बल की ओर से एक छोटी-सी भेंट है। हम चाहते हैं कि आप इसे अपनी आजीविका का साधन बनाएं।’ शॉल को अपने कंधों पर संभालते हुए उन्होंने कहा, ‘बेटा, जब ये आखिरी बार घर से गए थे, तब मैंने इन्हें अपनी पसंद का स्वेटर बुनकर दिया था। इन्होंने कहा था कि अगली दिवाली पर तुम्हारे लिए साड़ी लेकर आऊंगा। देखो बेटा, साड़ी तो नहीं आई, लेकिन आज तुम्हारे हाथों से यह शॉल मिल गई।’ इतना कहते ही उनका गला भर आया। वहां मौजूद लोगों की आंखें भी नम हो गईं।मिठाई वितरण के दौरान एक छोटा बच्चा आरुष के पास आया और पूछने लगा, ‘अंकल, ये जिनकी मूर्ति लगी है, क्या ये भी आपकी तरह फौजी थे?’ आरुष ने मुस्कराकर कहा, ‘हां बेटा, ये हम सबके लिए देश की रक्षा करते हुए शहीद हुए थे।’ बच्चा फिर बोला, ‘तो क्या ये दिवाली पर घर नहीं आएंगे?’ इस मासूम सवाल ने आरुष को भीतर तक झकझोर दिया। उसने बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘बेटा, अब ये हर दिवाली हमारे दिलों में आएंगे।’ पास खड़ी शहीद की पत्नी ने अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया। शायद वह नहीं चाहती थीं कि कोई उनके आंसू देखे। कार्यक्रम के बाद उन्होंने आरुष को अपने घर आने का आग्रह किया। घर की दीवार पर शहीद की वर्दी पहने तस्वीर लगी थी। उसके सामने एक छोटा-सा दीपक जल रहा था। तस्वीर के नीचे एक पुराना पत्र रखा था। महिला ने कांपते हाथों से पत्र उठाया और आरुष को देते हुए कहा, ‘यह आखिरी पत्र है, जो इन्होंने मुझे भेजा था। इसमें लिखा था कि इस दिवाली बच्चों के लिए मिठाई और मेरे लिए एक साड़ी लेकर आएंगे। तब से हर दिवाली मैं इनके लौटने का इंतजार नहीं करती, बस इनकी तस्वीर के सामने एक दीपक जला देती हूं।’ पत्र के आखिरी शब्द थे-‘अपना और बच्चों का ख्याल रखना, इस बार दिवाली साथ मनाएंगे।’ आरुष की आंखों से आंसू टपक पड़े। उसे लगा जैसे उस पत्र में लिखे शब्द आज भी किसी के लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हों।विदा लेते समय महिला ने आरुष के माथे पर तिलक लगाया और उसके हाथ में मिठाई का एक डिब्बा थमाते हुए बोलीं, ‘बेटा, इसे अपनी मां के साथ खाना। और हां, अपनी मां को फोन जरूर करना। वह भी तुम्हारी राह देखती होगी।’ आरुष कुछ बोल नहीं पाया। उसने उनके चरण स्पर्श किए और भारी मन से लौट आया। रात को चौकी पहुंचकर उसने मां को फोन किया। मां ने हमेशा की तरह पूछा, ‘बेटा, इस दिवाली घर आ पाएगा न? तेरे बिना घर सूना लगता है।’ आरुष की आंखें भर आईं। उसने कहा, ‘मां, इस बार नहीं आ पाऊंगा। आज एक ऐसी मां से मिलकर आया हूं, जिसका बेटा अब कभी घर नहीं लौटेगा। मां, मैं ठीक हूं, बस उस मां की आंखें भूल नहीं पा रहा।’ मां कुछ देर चुप रही, फिर बोली, ‘बेटा, अपना ख्याल रखना। देश की रक्षा करना। हम यहां दीपक जला लेंगे, तुम वहां अपना फर्ज निभाना।’ फोन रखने के बाद आरुष चौकी के बाहर आया। उसने एक छोटा-सा दीपक जलाया और शहीद को याद करते हुए आसमान की ओर देखा। उस रात उसे समझ आया कि कुछ घरों में दिवाली दीयों से नहीं, यादों से रोशन होती है। कुछ आंगन ऐसे भी हैं, जहां हर साल रंगोली तो सजती है, लेकिन घर का एक सदस्य कभी लौटकर नहीं आता।

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