भारतीय समाज की नई परिकल्पना की ओर बढ़ता समाजशास्त्रीय विमर्श- प्रो. राम आहूजा स्मृति व्याख्यान में सिद्धांत, प्रैक्सिस और सामाजिक संभावनाओं पर मंथन

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जयपुर। राजस्थान विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग ने बुधवार को अपनी ख्यातनाम समाजशास्त्रीय विरासत के प्रमुख स्तंभों में से एक प्रो. राम आहूजा की स्मृति को समर्पित प्रोफेसर राम आहूजा स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया। वर्ष 2003 से प्रतिवर्ष आयोजित किया जा रहा यह व्याख्यान न केवल एक महान समाजशास्त्री की अकादमिक स्मृति को जीवंत रखता है, बल्कि बदलते भारतीय समाज को समझने और भविष्य की सामाजिक दिशाओं पर विचार करने का महत्वपूर्ण बौद्धिक मंच भी बन चुका है। बुधवार को आयोजित व्याख्यान का विषय “भारतीय समाज की परिकल्पना: सिद्धांत, व्यवहार (प्रैक्सिस) और संभावनाएँ” रहा। विषय ने भारतीय समाज की जटिल संरचना, उसके निरंतर रूपांतरण और समाजशास्त्रीय ज्ञान की सामाजिक उपयोगिता को केंद्र में रखते हुए अकादमिक विमर्श को नई दिशा प्रदान की। कार्यक्रम में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोशल सिस्टम्स के अध्यक्ष प्रोफेसर मनोज कुमार जेना मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि अकादमिक अध्ययन को पुस्तकों और कक्षाओं की सीमाओं से आगे बढ़कर वास्तविक सामाजिक परिवर्तन, नीति-निर्माण और व्यावहारिक क्रियान्वयन से जुड़ना चाहिए। भारतीय सामाजिक संरचना की जटिलताओं को समझने के लिए समाजशास्त्रीय सिद्धांतों को जमीनी यथार्थ के साथ संवाद करते हुए गतिशील बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने अंतर्विषयकता, पद्धतिगत बहुलवाद, ऐतिहासिक विशिष्टता, बहुल पहचान, सामाजिक न्याय, लैंगिक न्याय और संरचनात्मक असमानताओं को भारतीय समाज के अध्ययन के महत्वपूर्ण आयाम बताया।उन्होंने रिफ्लेक्सिविटी, भारतीय ज्ञान प्रणालियों के डीकोलोनाइजेशन, डिजिटलीकरण, टेक्नोलॉजाइजेशन तथा हाइपर-कनेक्टेड सोसाइटी जैसे उभरते विमर्शों पर चर्चा करते हुए “थ्योरी + प्रैक्सिस = पॉसिबिलिटी” को सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण सूत्र बताया। कार्यक्रम के अध्यक्ष राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रोफेसर भगवती प्रसाद सारस्वत ने समाजशास्त्र विभाग के प्रोफेसर राम आहूजा के योगदान को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया। उन्होंने विद्यार्थियों से केवल डिग्रीधारी बनने के बजाय ज्ञान के खोजी, आलोचनात्मक चिंतक और सामाजिक रूप से उत्तरदायी नागरिक बनने का आह्वान किया तथा पुस्तक से समाज, कक्षा से क्षेत्र और सिद्धांत से प्रैक्सिस तक की यात्रा करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने परिवार में घटते संवाद और सामाजिक संबंधों में आ रहे बदलावों को भी महत्वपूर्ण सामाजिक चुनौतियों के रूप में रेखांकित किया। इस अवसर पर तकनीकी विश्वविद्यालय, जयपुर की कुलगुरु प्रोफेसर रश्मि जैन ने प्रोफेसर राम आहूजा के अकादमिक जीवन से जुड़ी स्मृतियों को साझा किया। उनके संस्मरणों ने आयोजन को आत्मीयता और स्मृति के भाव से समृद्ध किया। प्रोफेसर राम आहूजा के परिवारजनों ने भी उनके जीवन और व्यक्तित्व से जुड़ी स्मृतियाँ साझा की। उन्होंने बताया कि ऐसे समय में जब अकादमिक जगत में संदर्भ पुस्तकों का अधिक प्रभाव था, प्रो. आहूजा ने सरल एवं सुगम भाषा में समाजशास्त्र को विद्यार्थियों तक पहुंचाने का प्रयास किया तथा निरंतर प्रकाशन और ज्ञान के विस्तार पर बल दिया। समाजशास्त्र विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. मोनिका राव ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि विभाग के संस्थापकों में से एक प्रोफेसर राम आहूजा की स्मृतियों को संजोकर रखना विभाग के लिए गौरव और सम्मान का विषय है। उन्होंने प्रोफेसर राम आहूजा के शैक्षणिक, अकादमिक और मानवीय पक्षों को रेखांकित करते हुए उनके विशिष्ट गुणों को आत्मसात करने का आह्वान किया। कार्यक्रम के दौरान प्रोफेसर राम आहूजा के परिवार के सदस्यों द्वारा अकादमिक सत्र 2025–26 में समाजशास्त्र स्नातकोत्तर में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाली सुश्री पायल विजयवर्गीय को राम आहूजा स्मृति स्वर्णपदक प्रदान किया गया। यह सम्मान अकादमिक उत्कृष्टता की उस परंपरा का प्रतीक है, जिसे प्रोफेसर राम आहूजा ने अपने ज्ञान, शोध और अध्यापन से प्रतिष्ठित किया। कार्यक्रम की संयोजिका डॉ. नीलम जोशी ने प्रोफेसर राम आहूजा को निष्ठा और ज्ञान की प्रतिमूर्ति बताते हुए कहा कि उनकी अकादमिक एवं शोधपरक प्रतिभा की स्पष्ट झलक उनके कृतित्व और शोध-पत्रों में दिखाई देती है। समाजशास्त्र के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें सदैव स्मरण किया जाता रहेगा। कार्यक्रम के अंत में डॉ. अनुजा जैन ने सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस प्रकार स्मृति, ज्ञान और सामाजिक चिंतन का यह आयोजन प्रोफेसर राम आहूजा की बौद्धिक विरासत को वर्तमान पीढ़ी से जोड़ते हुए समाजशास्त्र के भविष्य की संभावनाओं पर सार्थक संवाद का माध्यम बना।

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