लुप्त होने लगी हैं बहुमूल्य औषधीय वनस्पतियां

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बाल मुकुन्द ओझा
राष्ट्रीय जड़ी-बूटी और मसाला दिवस 10 जून को मनाया जाता है। इस दिवस की शुरूआत सन् 1999 में हुई थी। जड़ी-बूटी दिवस औषधीय पौधों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक महत्व को याद दिलाने का अवसर है। यह दिवस हमें प्रकृति से जुड़ने और औषधीय पौधों के प्रति जिम्मेदार व्यवहार अपनाने का आह्वान करता है। मसाले न सिर्फ स्वाद बढ़ाने बल्कि औषधीय गुणों से भी भरपूर होते हैं। भारत के रसोईघरों में मौजूद धनिया, हल्दी, काली मिर्च, दालचीनी, जीरा और अजवाइन समेत बहुत से मसालों में ऐसे कई औषधीय गुण होते हैं जो हमें बीमारियों के खतरे से दूर रखते हैं। इसके अलावा तुलसी, गिलोय और अश्वगंधा जैसी जड़ी-बूटियां इमयुनिटी को बूस्ट करने में मदद करती हैं। कई जड़ी-बूटियां आयुर्वेद में दवा के रूप में इस्तेमाल होती हैं. इनमें मौजूद एंटिसेप्टिक और एंटीबैक्टीरियल गुण हमारी सेहत के लिए भी फायदेमंद होते हैं।
भारत में जड़ी-बूटियों का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितनी इसकी सभ्यता। ऋग्वेद, अथर्ववेद और चरक संहिता जैसे ग्रंथों में औषधीय पौधों का विस्तृत वर्णन मिलता है। आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी चिकित्सा पद्धतियों का मूल आधार यही वनस्पतियाँ रही हैं। भारत में औषधीय गुण वाले असंख्य पेड़-पौधे हैं। भारतीय पुराणों, उपनिषदों, रामायण एवं महाभारत जैसे प्रमाणिक ग्रंथों में इसके उपयोग के अनेक साक्ष्य मिलते हैं। रामायण में संजीवनी बूटी की चर्चा आज भी घर घर में सुनी जा सकती है। बहुत सारी अंग्रेजी दवाइयों में आज भी औषधीय पौधों का मिश्रण किया जाता है। सर्दी, जुकाम, बुखार, बीपी, शुगर, उलटी दस्त जैसी सामान्य बीमारियों से लेकर कैंसर जैसी असाध्य बीमारियों का इलाज भी हमारे औषधीय पौधों में है। यदि इन पेड़ पौधों का हम उचित रखरखाव कर विभिन्न रोगों के इलाज में सही ढंग से उपयोग करें तो ये हमारे स्वस्थ जीवन के लिए बेहद लाभदायक हो सकते है
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, आज भी विश्व की लगभग 80 प्रतिशत आबादी प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में औषधीय पौधों पर निर्भर है। भारत में तुलसी, नीम, अश्वगंधा, गिलोय, शतावरी जैसी जड़ी-बूटियाँ घर-घर में जानी-पहचानी हैं। चीन की पारंपरिक चिकित्सा, अफ्रीका की हर्बल हीलिंग पद्धतियाँ, और पश्चिम में हर्बल सप्लीमेंट्स के रूप में इनका व्यापक उपयोग हो रहा है। आधुनिक विज्ञान ने इनके सक्रिय रसायनिक घटकों पर शोध कर कई दवाएँ विकसित की हैं, जैसे सर्पगंधा से हाइपरटेंशन की दवा, हल्दी से करक्यूमिन-आधारित सूजनरोधी औषधि।
ऋग्वेद और अथर्ववेद में पेड-पौधों के औषधीय गुणों की चर्चा की गयी है। जिनका उपयोग औषधि बनाने के लिये किया जाता है। भारत में औषधीय पौधों के उपयोग की परम्परा का आधार वैज्ञानिक तथ्य रहे हैं। आज आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में अनेक ऐसी दवाओं का उपयोग होता है जिनका किसी और तरह की वनस्पतियों से सीधा सम्बन्ध है।
हमारे विभिन्न ग्रंथों और प्राचीन पुस्तकों में हजारों ऐसे नुक्खे बताये गए है जो औषधीय पौधों से निकले है। हमारे देश में आज भी लाखों लोग इन नुक्खों का उपयोग करते है। नीम, तुलसी, बेंग साग, ब्राम्ही, हल्दी , चन्दन, चिरायता, अडूसारू , सदाबहार , गुलाब, सहिजन, हडजोरा, करीपत्ता, लहसून, एलोवीरा लेवेंडर, जीरा, पुदीना, गिलोय, सूरजमुखी,पीपल, आक, बरगद, आंवला, गूगल ,अदरख नीम्बू, पत्थरचूर, शतावर, अजवायन, चुकंदर ,चिरचिटी, कुल्थी, घृतकुमारी,करेला, पिपली, मेथी ,पुनर्नवा, मदन मस्त, पिपली, चंपा, रजनीगंधा, श्वेत अपराजिता, सर्पगन्धा, अशोक और वलाक आदि औषधीय पौधों में से बहुत से ऐसे भी है जो घरों में लगाए जा सकते है। बहुत सी अंग्रेजी दवाइयों के साथ आयुर्वेद, यूनानी, सिद्धा जैसी पद्धतियों में औषधीय पौधों का बहुतायत से प्रयोग हो रहा है। भारत सरकार के ऑल इण्डिया को-ऑर्डिनेटेड रिसर्च प्रोजेक्ट ऑन एथ्नो-बायोलॉजी द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण में यह बताया गया है की लगभग 8 हजार पेड़-पौधे ऐसे हैं जिनका उपयोग औषधीय गुणों के लिए किया जाता है। आयुर्वेद में लगभग दो हजार, सिद्धा में लगभग एक हजार और यूनानी में लगभग 750 पौधें ऐसे है जिनका उपयोग विभिन्न दवाओं के निर्माण में किया जाता है। इनमें बहुत सी प्रजातियां अब लुप्तप्राय है। आवश्यकता इस बात की है इन बहु गुणकारी औषधीय पौधों के विकास की योजनाएं बनाकर आम आदमी को इनके प्रयोग और उपयोग की जानकारी दी जाएं। भारत के पहाड़ी और जंगली इलाकों में उपलब्ध तीन सौ से अधिक औषधीय वनस्पतियों की प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर है, अगर सरकार इनके संरक्षण की दिशा में पहल नहीं करेगी तो आने वाले वर्षों में कई वनस्पतियां विलुप्त हो जाएंगी। सरकार यदि इनके संरक्षण की दिशा में पहल नहीं करेगी तो आने वाले वर्षों में कई वनस्पतियां विलुप्त हो जाएंगी।

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