-बाल मुकुन्द ओझा
वीर सावरकर की जयंती के अवसर पर देश में हिंदुत्व की चर्चा होना स्वाभाविक है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मानना है, हिंदुत्व वह तत्व है जो हमारे पूरे समाज को आपस में जोड़ता है और आपसी बंधनों को मजबूत करता है। जो कोई भी भारतीय जीवन मूल्यों का पालन करता है, वह हिंदू है। यह एक जीवन पद्धति और एक संस्कृति है।
आज हम बात कर रहे है हिंदुत्व के प्रबल पैरोकार वीर सावरकर की। यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश में हिंदुत्व की बातें जोर शोर से हिलोरे मारने लगी। दरअसल सावरकर और हिंदुत्व एक ही सिक्के के दो पहलू है। भारतीय इतिहास में 28 मई का दिन एक वीर के जन्मदिवस के रुप में दर्ज है। उस वीर का नाम विनायक दामोदर सावरकर है जिसे वीर सावरकर के नाम से जानते हैं। वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को नासिक के भगूर गांव में हुआ था। वीर सावरकर 20वीं शताब्दी के सबसे बड़े हिन्दूवादी रहे। विनायक दामोदर सावरकर को बचपन से ही हिंदू शब्द से बेहद लगाव था। वीर सावरकर ने जीवन भर हिंदू हिन्दी और हिंदुस्तान के लिए ही काम किया। वीर सावरकर को 6 बार अखिल भारत हिंदू महासभा का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। 1937 में उन्हें हिंदू महासभा का अध्यक्ष चुना गया, जिसके बाद 1938 में हिंदू महासभा को राजनीतिक दल घोषित कर दिया गया। वीर सावरकर राजनीतिक चिंतक और स्वतंत्रता सेनानी थे। सावरकर पहले स्वतंत्रता सेनानी व राजनेता थे जिसने विदेशी कपड़ों की होली जलाई थी। भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के अग्रिम पंक्ति के सेनानी और प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे। हिन्दू राष्ट्र की राजनीतिक विचारधारा को विकसित करने का बहुत बडा श्रेय सावरकर को जाता है। 1924 से 1937 का समय इनके जीवन का समाज सुधार को समर्पित काल रहा। वीर-विनायक दामोदर सावरकर, ऐसे महान क्रांतिकारी जिनकी पुस्तकें मुद्रित और प्रकाशित होने से पहले ही जब्त घोषित कर दीं, सावरकर वे पहले कवि थे, जिसने कलम-कागज के बिना जेल की दीवारों पर पत्थर के टुकड़ों से कवितायें लिखीं वो विश्व के एकमात्र ऐसे शक्स थे, जिन्हें दो जन्मो की काले पानी की सजा एक साथ दी गयी थी। तब उन्होंने जज को बधाई देते हुए कहा की चलो अच्छा है की आपने हिंदुत्व के पुनर्जन्म को माना फिर जज ने जब कहा की मिस्टर सावरकर अब आप मरते दम तक अंदमान की बदनाम सेलुलर जेल में बंद रहेंगे तब पूरे आत्मविश्वास से सावरकर के कहा की मै तब तक नही मरूँगा जब तक मेरी मातृभूमि गुलाम है। मै आजादी का सूरज देखे बिना नही मर सकता…..और उनकी ये बात सत्य हुई।
आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व त्यागने वाले महान देशभक्त विनायक दामोदर सावरकर देश में व्याप्त गन्दी सियासत के शिकार हुए है, ऐसा मानने वालों की देश में कमी नहीं है। वीर सावरकर के नाम से ख्यात विनायक दामोदर सावरकर को लेकर आज देश दो भागों में बंटा है। एक पक्ष सावरकर के माफीनामे की चर्चा करता है तो दूसरा पक्ष स्वतंत्रता संग्राम में उनके अप्रतिम योगदान की। दोनों पक्षों की बात मान भी ले तो यह मानने में कहाँ गुरेज है सावरकर ने अपनी पूरी जवानी अंग्रेजों की जेल में जुल्म ज्यादती में गंवा दी। सावरकर को दो जन्मो की काले पानी की सजा एक साथ दी गयी थी। यहाँ सावरकर ने लगभग बीस साल बिताये थे। यही उनकी त्याग और तपस्या का उजला पक्ष कहा जायेगा। दादी ने जिसको सम्मानित किया पोता उसे अपमानित करने पर तुला है। इंदिरा गाँधी ने वीर सावरकर को स्वतंत्रता आंदोलन का आधारस्तंभ और भारत का सदा याद रहने वाला सपूत कहती है। वहीँ राहुल गाँधी सावरकर को अंग्रेजों से माफ़ी मांगने वाला और सर्वेंट के रूप में प्रस्तुत करने वाला बताते है। इंदिराजी ने सावरकर पर डाक टिकट जारी कर उनके स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान पर मुहर लगाई थी। यह भी अकाट्य सत्य है की सावरकर को काले पानी की सजा हुई थी। सावरकर सेल्युलर जेल या अंग्रेजों की सख्त नजरबंदी में रहे। ऐसी सजा बहुत कम सेनानियों को मिली थी। गांधीजी भी ऐसा मानते थे। गाँधी जी ने कभी उनकी देश भक्ति पर सवाल नहीं उठाए। मगर जब से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने सावरकर का गुणगान शुरू किया तब से कांग्रेस ने सावरकर के खिलाफ अपनी मुहीम तेज़ कर दी जिसके परिणाम स्वरुप राहुल सावरकर की मौत के 59 साल बाद भी उन पर हमला करते रहते है।
विनायक दामोदर सावरकर भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के अग्रिम पंक्ति के सेनानी और प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे। उन्हें वीर सावरकर के नाम से सम्बोधित किया जाता है। हिन्दू राष्ट्र की राजनीतिक विचारधारा को विकसित करने का बहुत बडा श्रेय सावरकर को जाता है। उनकी इस विचारधारा के कारण आजादी के बाद की सरकारों ने उन्हें वह महत्त्व नहीं दिया जिसके वे वास्तविक हकदार थे। वे न केवल स्वाधीनता-संग्राम के एक तेजस्वी सेनानी थे अपितु महान क्रान्तिकारी, चिन्तक, लेखक, कवि, वक्ता तथा दूरदर्शी राजनेता थे। वे एक ऐसे इतिहासकार भी हैं जिन्होंने हिन्दू राष्ट्र की विजय के इतिहास को प्रामाणिक ढँग से लिपिबद्ध किया है। उन्होंने 1857 के प्रथम स्वातंर्त्य समर का सनसनीखेज व खोजपूर्ण इतिहास लिखकर ब्रिटिश शासन को हिला कर रख दिया था। सावरकर एक प्रख्यात समाज सुधारक थे।

सावरकर और हिंदुत्व एक ही सिक्के के दो पहलू है
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