दुनिया से सीख कर हम भी बदल सकते हैं देश में किसान और मजदूर के हालात

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राजेश जैन
हर वर्ष एक मई आती है, भाषण होते हैं, मंच सजते हैं, श्रमिकों और किसानों के सम्मान में संदेश दिए जाते हैं और अगले ही दिन सब कुछ सामान्य हो जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि भारत में किसान और मजदूर आज भी विकास की मुख्यधारा के नहीं, बल्कि उसके हाशिए के पात्र हैं। यह उस देश की विडंबना है जो स्वयं को वैश्विक शक्ति और विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर बताता है, लेकिन जिसकी अर्थव्यवस्था का आधार बने लोग अब भी असुरक्षा, असमानता और उपेक्षा के बीच जीवन बिताने को मजबूर हैं।

भारत की विकास कथा में सबसे बड़ी विफलता यह यह है कि समृद्धि बढ़ने के बावजूद खेत में अन्न उगाने वाला किसान और कारखाने, सड़कें, इमारतें खड़ी करने वाला मजदूर आज भी उस आर्थिक संरचना में सबसे नीचे खड़ा है, जिसे उसकी मेहनत ने बनाया है। सवाल यह है कि आखिर क्यों? उत्तर स्पष्ट है- भारत ने विकास को ऊपर से नीचे बहने वाली प्रक्रिया मान लिया, जबकि दुनिया के सफल देशों ने नीचे से ऊपर उठने वाला मॉडल अपनाया।

इज़राइल ने रेगिस्तान में खेती खड़ी की, हम उपजाऊ जमीन पर संकट पाल रहे
इज़राइल के पास न विशाल भूमि है, न प्रचुर जल संसाधन, न अनुकूल जलवायु। फिर भी वह कृषि उत्पादकता के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों में है। कारण-उसने खेती को दया का विषय नहीं, विज्ञान का विषय बनाया। ड्रिप इरिगेशन, सेंसर आधारित खेती, डेटा एनालिटिक्स, रिसर्च आधारित फसल प्रबंधन और जल दक्षता ने वहां कृषि को आधुनिक उद्योग का रूप दिया। भारत में इसके विपरीत खेती अब भी मानसून की दया पर निर्भर है। हम जल संकट पर सम्मेलन करते हैं, लेकिन खेतों तक आधुनिक सिंचाई तकनीक नहीं पहुंचा पाते। किसान को तकनीक की बातें तो सुनाई जाती हैं, पर उसे तकनीक तक पहुंच नहीं दी जाती। यह केवल संसाधनों की कमी नहीं, प्राथमिकताओं की कमी है।

नीदरलैंड ने किसान को कारोबारी बनाया, हमने उसे कच्चा माल बेचने तक सीमित रखा
नीदरलैंड आकार में भारत के कई जिलों से भी छोटा है, फिर भी कृषि निर्यात में विश्व के शीर्ष देशों में शामिल है। क्योंकि वहां किसान केवल उत्पादन नहीं करता-वह प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और निर्यात का हिस्सा है। वहां खेती खेत पर खत्म नहीं होती, वहीं से उद्योग शुरू होता है। भारत में किसान आज भी मुख्यतः कच्चा माल बेचता है। टमाटर वह उगाता है, सॉस कोई और बनाता है। दूध वह निकालता है, ब्रांड कोई और बनाता है। गेहूं वह पैदा करता है, मूल्य संवर्धन का लाभ कोई और ले जाता है। यही हमारी कृषि नीति की सबसे बड़ी कमजोरी है-हम किसान को उत्पादक मानते हैं, उद्यमी नहीं।

जर्मनी ने मजदूर को सुरक्षा दी, हमने उसे आंकड़ों में छिपा दिया
जर्मनी की औद्योगिक शक्ति का आधार केवल मशीनें नहीं हैं, बल्कि सुरक्षित और प्रशिक्षित श्रमिक हैं। वहां हर मजदूर के पास स्वास्थ्य सुरक्षा, पेंशन, बेरोजगारी सहायता और कार्यस्थल अधिकार हैं। श्रमिक यूनियनें केवल विरोध की संस्था नहीं, नीति निर्माण का हिस्सा हैं। भारत में मजदूर की स्थिति इसके उलट है। यहां बड़ी संख्या में श्रमिक असंगठित क्षेत्र में हैं-बिना अनुबंध, बिना बीमा, बिना सामाजिक सुरक्षा। निर्माण स्थल पर हादसा हो जाए तो कई बार खबर तक नहीं बनती। श्रमिक को अभी भी “सस्ता श्रम” समझा जाता है, “मानव पूंजी” नहीं। जब तक हम मजदूर को लागत घटाने का साधन मानता रहेगा, उत्पादन बढ़ सकता है, लेकिन समाज मजबूत नहीं होगा।

चीन ने गांवों में उद्योग पहुंचाए, हमने शहरों पर बोझ बढ़ाया
चीन का विकास केवल महानगरों की कहानी नहीं है। उसने गांवों और छोटे कस्बों में उद्योग स्थापित किए, स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा दिया और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को औद्योगिक आधार से जोड़ा। परिणाम-पलायन नियंत्रित हुआ, आय बढ़ी और क्षेत्रीय संतुलन बना। भारत ने उल्टा रास्ता अपनाया। गांवों में अवसर सीमित रखे, शहरों में उम्मीदें केंद्रित कर दीं। परिणामस्वरूप करोड़ों लोग रोज़गार के लिए पलायन करते हैं, शहरों की झुग्गियां बढ़ती हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था खाली होती जाती है। यदि रोजगार का नक्शा विकेंद्रीकृत नहीं होगा, तो विकास भी संतुलित नहीं होगा।

भारत की समस्या गरीबी नहीं, नीति की संरचना है
अक्सर तर्क दिया जाता है कि भारत की आबादी अधिक है, इसलिए चुनौतियां बड़ी हैं। यह तर्क आंशिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन पूर्ण सत्य नहीं। भारत के पास विशाल भूमि, युवा जनसंख्या, कृषि क्षमता, बड़ा बाजार और तकनीकी शक्ति है। कमी केवल इस बात की है कि हमने अपने उत्पादक वर्गों को रणनीतिक प्राथमिकता नहीं दी। हमने किसान के लिए राहत योजनाएं बनाईं, लेकिन लाभकारी कृषि मॉडल नहीं बनाया। हमने मजदूर के लिए पोर्टल बनाए, लेकिन सुरक्षा आधारित श्रम ढांचा नहीं खड़ा किया। हमने घोषणाएं अधिक कीं, संस्थागत सुधार कम किए।

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