आटिज्‍म का खतरा : मानसिक विकास हो रहा प्रभावित

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बाल मुकुन्द ओझा
देश और दुनिया की अनेक शोध रिपोर्टों में बताया गया है कि कम उम्र में बच्चों को फोन थमाने से उनका मानसिक विकास प्रभावित होता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों की मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की आदत उनमें वर्चुअल ऑटिज्म के खतरे को भी बढ़ा रही है। वर्चुअल ऑटिज्म के लक्षण आमतौर पर चार से पांच साल के बच्चों में दिखाई देते हैं। आटिज्‍म के बारे में अधिकांश देशवासी परिचित नहीं है। ऑटिज़्म एक ऐसी सामाजिक और मानसिक बीमारी है जो किसी के बोलने, बातचीत करने तथा हरकतों में दिखाई देती है। इससे पीड़ित लोग कम्युनिकेशन में कमज़ोर होते हैं, उनमें आत्मविश्वास की कमी होती है और कई बार ट्रिगर्स की वजह से चिढ़ और गुस्सा भी देखा गया है। मोबाइल का ज्यादा उपयोग करने से बच्चों में स्पीच डेवलपमेंट नहीं हो पाता और उनका ज्यादातर समय गैजेट्स में ही बीत जाता है इससे उनका व्यवहार खराब होने लगता है। कई बार उनके नखरे भी बहुत बढ़ जाते हैं और वे आक्रामक भी हो सकते हैं। स्मार्टफोन से उनके सोने का पैटर्न भी बिगड़ जाता है। प्रगति और विकास की अंधी दौड़ में हम अपने बच्चों को उन बीमारियों की और धकेल रहे है जिससे उनका शारीरिक और विशेषकर मानसिक विकास बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। बच्चों की इस घातक बीमारी को चिकित्सक आटिज्‍म के नाम से सम्बोधित करते है। भारत में 68 में से 1 बच्चा इस रोग का शिकार है। देखा जाता है यह बीमारी मोबाइल फोन से सम्बंधित है। मोबाइल फोन,टीवी, टैबलेट, कंप्यूटर जैसे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स बच्‍चों को वर्चुअल ऑटिज्म का शिकार बना रहे हैं। दुनिया भर में हुई तमाम रिसर्च और रिपोर्टे बताती हैं कि कम उम्र में बच्चों को फोन थमाने से उनका मानसिक विकास प्रभावित होता है। इतना ही नहीं एक रिपोर्ट के मुताबिक मोबाइल, गैजेट्स और ज्यादा टीवी देखने की लत बच्‍चों का भविष्‍य खराब कर रही है। इससे उनमें वर्चुअल आटिज्‍म का खतरा बढ़ रहा है। आज के दौर में फोन ही जीवन का आधार हो गया है। हर किसी को स्मार्टफोन और इंटरनेट की लत लगी है। आज देश के घर घर में स्मार्ट फोन ने अपना कब्ज़ा जमा लिया है। आज घर घर में बच्चे धड़ल्ले से मोबाइल पर स्क्रीनिंग कर रहे है। उन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं है की यह उनके स्वास्थ्य के लिए कितनी खतरनाक है। देखा जा रहा है अभिभावक अपने बच्चों के सामने बेबस है।
बच्चे जब रोते हैं या किसी चीज के लिए जिद करते हैं तो अक्सर मां-बाप पीछा छुड़ाने के लिए बच्चों को मोबाइल या कोई और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट थमा देते हैं। इससे बच्चा शांत तो हो जाता है लेकिन इससे उसे कई घंटे स्क्रीन के सामने बिताने की लत लग जाती है। यह परिपाटी केवल एक घर की नहीं अपितु घर घर की है। घर में बच्चे के लिए दूध भलेही न मिले मगर मोबाइल चलाने के लिए डेटा अवश्य मिल जायेगा। सब्जी लाने के लिए जेब खा ली है मगर इंटरनेट के लिए जुगाड़ हो जाता है। यह प्रचलन आजकल काफी आम हो गया है।
मोबाइल फोन,टीवी, टैबलेट, कंप्यूटर जैसे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स बच्‍चों को वर्चुअल ऑटिज्म का शिकार बना रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक इन सबसे बच्चों में आटिज्‍म की बीमारी बढ़ रही है और उनकी सोशल कम्‍युनिकेशन और बिहैवियर स्‍किल्‍स प्रभावित हो रही हैं। इसमें बच्चों से माता-पिता का संवाद कम होना, बच्चों का बहुत ज्यादा अकेले में रहना, स्क्रीन टाइम यानी टीवी, मोबाइल का अत्यधिक प्रयोग करना आदि कारण शामिल हैं।
एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक देश भर में बच्चों में वर्चुअल ऑटिज्म के मामलों की संख्या में पिछले एक दशक में तीन से चार गुना वृद्धि देखी गई है। मां-बाप के बीच एक यह प्रवृत्ति बढ़ी है कि वो अपने बच्चों का मन बहलाने के लिए उन्हें कहानी या लोरियां सुनाने की जगह मोबाइल फोन और अन्य गैजेट पकड़ा देते है। इस सामाजिक और मानसिक समस्या से छुटकारा पाने के लिए यह जरुरी है की माता पिता पहले अपनी आदतों में सुधार करे फिर अपने बच्चों को सुधारे।
बाल मुकुन्द ओझा

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