विश्व के पक्ष में बढ़ता खर्च और गहराता संकट ईरान इजराइल संघर्ष से दुनिया पर बढ़ता दबाव और भारत के लिए खतरे

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पश्चिम एशिया में चल रहा ईरान और इजराइल के बीच संघर्ष अब एक सीमित युद्ध नहीं रहा बल्कि यह धीरे धीरे एक व्यापक क्षेत्रीय टकराव का रूप लेता जा रहा है। लगभग एक महीने से जारी इस संघर्ष में अब यमन के हूती विद्रोहियों के शामिल होने से हालात और गंभीर हो गए हैं। हूती समूह द्वारा लगभग दो हजार किलोमीटर दूर इजराइल के दक्षिणी हिस्सों पर बैलिस्टिक मिसाइल दागना इस बात का संकेत है कि यह संघर्ष अब कई देशों और संगठनों को अपनी चपेट में ले सकता है। इससे न केवल युद्ध का दायरा बढ़ेगा बल्कि इसका सीधा असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और शांति व्यवस्था पर पड़ेगा।
इस संघर्ष में एक ओर अमेरिका और इजराइल हैं तो दूसरी ओर ईरान और उसके समर्थित संगठन सक्रिय होते जा रहे हैं। लेबनान में हिजबुल्लाह की गतिविधियां पहले से ही बढ़ी हुई थीं और अब हूती विद्रोहियों का शामिल होना इस पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना रहा है। यह स्थिति केवल सैन्य टकराव तक सीमित नहीं है बल्कि इसके कारण वैश्विक व्यापार मार्गों और ऊर्जा आपूर्ति पर भी गंभीर असर पड़ रहा है।
सबसे बड़ा प्रभाव समुद्री मार्गों पर दिखाई दे रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है वहां तनाव के कारण जहाजों की आवाजाही बाधित हो रही है। हजारों नाविक समुद्र में फंसे हुए हैं और जहाज कई दिनों से एक ही स्थान पर खड़े हैं। इससे तेल और गैस की आपूर्ति पर असर पड़ना स्वाभाविक है। जब ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होती है तो इसका असर हर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है और महंगाई तेजी से बढ़ती है।
दुनिया के कई देशों में पहले ही ईंधन की कीमतों में वृद्धि देखने को मिल रही है। सरकारें अपने नागरिकों को राहत देने के लिए अतिरिक्त खर्च कर रही हैं। यह खर्च सीधे तौर पर राष्ट्रीय बजट पर दबाव बढ़ा रहा है। रक्षा तैयारियों को मजबूत करने के लिए भी देशों को भारी निवेश करना पड़ रहा है। इस तरह यह युद्ध केवल युद्धरत देशों तक सीमित नहीं है बल्कि पूरी दुनिया के लिए आर्थिक बोझ बनता जा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं भी इस संकट को लेकर चिंता व्यक्त कर चुकी हैं। परमाणु संयंत्रों पर हो रहे हमले एक और बड़ा खतरा पैदा कर रहे हैं। यदि किसी भी परमाणु संयंत्र को गंभीर नुकसान पहुंचता है तो यह एक बड़े पर्यावरणीय संकट का कारण बन सकता है जिसका असर केवल एक देश तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि कई देशों को प्रभावित करेगा। रेडिएशन का खतरा पूरे क्षेत्र में फैल सकता है और इससे मानव जीवन और प्रकृति दोनों को भारी नुकसान होगा।
इस युद्ध का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें सूचना युद्ध और दावों का भी बड़ा स्थान है। अलग अलग पक्ष अपने अपने दावे कर रहे हैं जिनकी पुष्टि हमेशा संभव नहीं होती। इससे वैश्विक स्तर पर असमंजस की स्थिति बनती है और निवेशकों तथा व्यापार जगत में अनिश्चितता बढ़ती है। जब अनिश्चितता बढ़ती है तो निवेश घटता है और आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ जाती हैं।
भारत जैसे देश के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है। यदि इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है और आपूर्ति बाधित होती है तो भारत में ईंधन की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। इससे परिवहन महंगा होगा और इसका सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ेगा। महंगाई बढ़ने से जीवनयापन कठिन हो जाएगा और आर्थिक विकास की गति पर भी असर पड़ेगा।
भारत के लाखों नागरिक पश्चिम एशिया के देशों में काम करते हैं। वहां की अस्थिर स्थिति उनके जीवन और रोजगार के लिए खतरा पैदा कर सकती है। यदि स्थिति और बिगड़ती है तो बड़ी संख्या में भारतीयों को वापस लाना पड़ सकता है जिससे सरकार पर अतिरिक्त आर्थिक और प्रशासनिक दबाव पड़ेगा। साथ ही वहां से आने वाली धनराशि में कमी आ सकती है जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
व्यापार के क्षेत्र में भी भारत को नुकसान उठाना पड़ सकता है। समुद्री मार्गों में बाधा आने से आयात और निर्यात प्रभावित होंगे। जहाजों की लागत बढ़ेगी और बीमा प्रीमियम भी बढ़ जाएगा। इससे वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होगी और उद्योगों पर दबाव पड़ेगा। खासकर पेट्रोकेमिकल और उर्वरक उद्योग इस संकट से अधिक प्रभावित हो सकते हैं।
इस पूरे संघर्ष का एक मानवीय पहलू भी है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। युद्ध के कारण आम नागरिकों को सबसे अधिक कष्ट झेलना पड़ता है। लोगों को अपने घर छोड़ने पड़ते हैं और बुनियादी सुविधाओं की कमी हो जाती है। बच्चों और महिलाओं पर इसका विशेष रूप से बुरा असर पड़ता है। यह स्थिति वैश्विक समुदाय के लिए एक चुनौती है कि वह कैसे शांति स्थापित करे और प्रभावित लोगों को राहत पहुंचाए।
दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस संघर्ष को और फैलने से कैसे रोका जाए। यदि और देश या संगठन इसमें शामिल होते हैं तो यह एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है जिसका असर वैश्विक स्तर पर महसूस किया जाएगा। इसलिए कूटनीतिक प्रयासों को तेज करना और बातचीत के माध्यम से समाधान निकालना बेहद जरूरी है।
अंततः यह स्पष्ट है कि ईरान और इजराइल के बीच चल रहा यह संघर्ष केवल दो देशों का मुद्दा नहीं रह गया है। यह पूरी दुनिया के लिए आर्थिक सामाजिक और सुरक्षा संबंधी चुनौती बन चुका है। भारत जैसे देशों के लिए यह और भी गंभीर है क्योंकि इसका सीधा असर उनकी अर्थव्यवस्था और नागरिकों पर पड़ता है। ऐसे समय में संतुलित नीति और सतर्कता ही इस संकट से निपटने का सबसे प्रभावी मार्ग हो सकता है।

-कांतिलाल मांडोत

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