एक चिड़िया, अनेक चिड़िया, घर में क्यों नहीं आती चिड़िया

ram

भला किसने गौरैया को अपने आंगन, घर, खिड़की पर चहचहाते नहीं देखा होगा? अभी इसका जवाब हाँ है, लेकिन जिस तरह के हालात बन रहे हैं उसमें आने वाली पीढ़ी के लिए इसका जवाब न भी हो सकता है। साथ ही हममें से लगभग पुराने दौर के सभी लोगों ने 1974 में निर्मित एक प्रसिद्ध एनिमेटेड लघु फिल्म जो ‘एक अनेक और एकता’ का हिस्सा है, जिसे विजया मुले और भीमसेन खुराना ने निर्देशित किया था देखी होगी। यह दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाली एकता का संदेश देने वाली एक लोकप्रिय क्लासिक फिल्म रही। बाद में कई वर्षों तक लोगों ने यह गीत भी सुना “एक चिड़िया, अनेक चिड़िया, दाना चुगने आईं चिड़िया” जिसे पंडित विनय चंद्र मौद्गल्य द्वारा लिखा गया। समझें कि गौरैया हमारे लिए कितनी खास थी और आज भी। लेकिन, आज उसके जीवन पर ही संकट आन पड़ा है।
याद कीजिए आज से 15-20 साल पहले हर घर की खिड़की के कांच पर चोंच मारती या दीवारों की दरारों के बीच शोर मचाती और कुछ नहीं तो रोशनदान में तिनके-तिनके जोड़कर घोंसले बनाती गौरैया जिसे आमभाषा में हम चिड़िया कहते हैं घासफूंस इकट्ठा कर घोसले बनाती दिख जाती थी। कुछ ही हफ्तों में उन घोसलों से मधुर सी चीं-चीं की आवाज कर अबोध बच्चे झांकते थे जैसे ही चिड़िया आती और अपने चोंच में इकट्ठा दाना बांट-बांट कर उन्हें खिलाती, कितना आनन्द की सुखद अनुभूति होती थी! आज यह सब लगभग न के बराबर हैं। गांव, शहर और घरों से गौरैया नदारत सी है। थोड़ी बहुत कहीं दिख जाती है तो दूर जंगलों में या सफर के दौरान बियावानो में। आखिर गौरैया ने हमसे क्यों मुंह मोड़ा? कभी जानने, समझने की हमने ईमानदार कोशिश की? शायद नहीं।
शुरू में तो इस पर ध्यान ही नहीं दिया कि इन्हें भी हिफाजत, स्वस्थ्य अनुकूल पारिस्थितिक तंत्र की जरूरत है। इन्हें भी रोजमर्रा की बदलती जैव विविधता प्रभावित करती है। इनके भी स्वास्थय की देखभाल और परेशानियों को समझने की जरूरत है। थोड़ा पहले जाना होगा जब भारत में नया-नया मोबाइल दस्तक दे रहा था। जैसे ही गाँव-गाँव, मोहल्ले-मोहल्ले टॉवर लगने लगे तो एक सच एकाएक सामने आने लगा कि टॉवरों के आसपास गौरैया सुबह-सुबह क्यों मरी मिलती हैं? शुरू में तो लोगों को कुछ समझ नहीं आया। लेकिन बाद में पता चला कि मोबाइल से निकलने वाला रेडिएशन इनके स्वास्थ्य और मस्तिष्क की तरंगों को बुरी तरह प्रभावित करता है जिससे मौत हो जाती है। आखिर नन्हीं सी जान जिसका कुल वजन 15 ग्राम से 32-35 ग्राम ही होता है कैसे इन तरंगों को झेल पाएंगी? बस धीरे-धीरे गौरैया घटने लगीं और और हम बेफिक्र रहे।
विलुप्ति की ओर पहुंचने वाली गौरैया के संरक्षण के उद्देश्य से हर साल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाने की शुरुआत 2010 में नेचर फॉरएवर सोसायटी संस्था यानी एनएफएस ने की। कृत्रिम घोंसलों छतों पर दाना-पानी रखने की शुरुआत को प्रोत्साहन दिया ताकि गौरैया वापस छतों पर आने लगें। लेकिन यह सच्चाई है कि 60 से 80 प्रतिशत आबादी घट ही गई। ऐसे में इस दिन को मनाकर गौरैया की चहचहाट को वापस लाने की पुरजोर कोशिश की सार्थक पहल की जा रही है। नेचर यानी एनएफएस (भारत) और इको-सिस एक्शन फाउण्डेशन (फ्रांस) के सहयोग से 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाने लगा। इसकी शुरुआत नासिक के रहने वाले मोहम्मद दिलावर ने की। तभी से हर साल नए थीम के साथ इसे मनाने की परिपाटी शुरू हुई। मो. दिलावर के इस काम की हर कहीं प्रशंसा हुई। टाइम मैगजीन ने 2008 में ही इन्हें हीरोज ऑफ इन्वायरमेण्ट के तौर पर लिखा। 20 मार्च 2011 को पर्यावरण और गौरैया संरक्षण के कार्य में मदद करने वालों को सम्मानित करने के लिए एनएफएस द्वारा गुजरात के अहमदाबाद में गौरैया पुरुस्कार की शुरुआत भी हुई। उद्देश्य ऐसे लोगों को प्रोत्साहित करना था जो गौरैया और पर्यावरण में अपना सहयोग दे रहे हैं।
यकीनन गौरैया धरती पर एक वो छोटी सी जान है जो सब जगह पाई जाती है। इनकी संख्या में कमीं आना बताता है कि हमने पर्यावरण को किस तरह से बिगाड़ा जिससे असर इस छोटे से प्राणी तक पर आन पड़ा। वास्तव में रेडिएशन और प्रदूषण को लेकर चिंता के बजाए हम तकनीक अपग्रेड पर केन्द्रित हो गए। कभी झुंड में भोजन की तलाश में उडने वाली ये छोटा सा पंछी अब बहुत कम दिखता है। पेट भरने के लिए छोटे-छोटे दाने और कीड़े-मकोड़े पर निर्भर चिड़िया अपने जीवनकाल में अधिकमत 3 बार अण्डे देकर बड़ी हिफाजत देखरेख करती है।
इनको बचाने और संरक्षण के लिए छतों पर इनकी पसंद के दाने जैसे काकून, बाजरा, मक्का, गेहूं, चावल और पानी रखना चाहिए। कृत्रिम घोंसले टांगकर आकर्षित करना चाहिए। बड़ी संख्या में पेड़-पौधे लगें तो भी आएंगी। हरे-भरे पेड़-पौधों में रेडिएशन कहते हैं कम होता है। फिल्म रोबोट 2.0 हमारी आँखें खोलती है। इनकी संख्या घटने के अन्यान्य कारणों में तेजी से बढ़ता शहरीकरण, पुराने घरों का टूटना, हरे-भरे क्षेत्रों में कंक्रीट के जंगल, सड़कों और कांच के टावरों से गौरैया के घोंसले बनाने और भोजन प्राप्त करने के अवसर कम होते जा रहे हैं। इसके अलावा भोजन स्रोतों में कमीं सीसा रहित पेट्रोल से निकले जहरीले यौगिक उन कीटों की संख्या घटा रहे हैं जो गौरैया का भोजन हुआ करता था। आधुनिक खेती में रासायनिक कीटनाशकों के कारण कीड़ों की आबादी घट गई। अनेकों शोध ने साबित किया कि मोबाइल टावर और विकिरण, वाई-फाई और टावरों से निकलने वाले रेडिएशन गौरैया के प्रजनन, स्वास्थ्य प्रभावित करती है। विद्युत चुंबकीय तरंगें भी नेविगेशन और भोजन खोजने की क्षमता प्रभावित करती है। इससे भी इनकी आबादी घटी है।
एक बात और समझ आई कि जलवायु परिवर्तन, बढ़ते प्रदूषण और असंतुलित तापमान भी इनके जीवन को कठिन कर रही है। वायु प्रदूषण से सांस में बाधा तो कानफोड़ू ध्वनि प्रदूषण से साथी खोजने में जटिलता होती है। भारत में गौरैया महज पक्षी नहीं वो हमारे साझा इतिहास और संस्कृति का प्रतीक भी हैं। हिंदी में “गोरैया” , तमिल में “कुरुवी” और उर्दू में “चिर्या” जैसे विभिन्न नामों से जाने जानी वाली गौरैया पीढ़ियों से दैनिक जीवन का हिस्सा रही। गांवों में अपने मधुर गीतों से वातावरण को ऊर्जा और खुशी भरने वाले कई पलों को इनकी चहचहाट ने यादगार बनाया है। इन चुनौतियों के बीच, गौरैयों के संरक्षण और उन्हें बढ़ाना, बचाना हमारे जीवन का हिस्सा होना चाहिए। कम से कम एक कृत्रिम घोसला, दाना-पानी का तो इंतजाम कर ही सकते हैं। इसमें सभी को तन्मयता से जुटना पड़ेगा वरना एक थी चिड़िया, अनेक थी चिड़िया, विकास के हत्थे चढ़ गई चिड़िया कहना पड़ेगा।

-ऋतुपर्ण दवे

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *