तेल संकट की आहट : महंगाई की मार से लोग भयभीत

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– बाल मुकुन्द ओझा
अमेरिका इजरायल और ईरान युद्ध ने महंगाई की मार से देशवासियों को डरा दिया है। आम लोगों को महंगाई का जबरिया झटका लगा है। घरेलू एलपीजी गैस सिलिंडर की कीमत में 60 रुपये की बढ़ोतरी कर दी गई है। 19 किलो वाले कॉमर्शियल सिलेंडर की कीमत में भी 115 रुपये की बढ़ोतरी की गई है। इस बढ़ोतरी का न केवल गैस अपितु अन्य वस्तुओं पर भी असर पड़ेगा। हम यह भी कह सकते है कि तेल संकट की आहट चहुंओर सुनाई देने लगी है, हालाँकि सरकार ने इससे इंकार किया है मगर लोगों को इस पर भरोसा नहीं है। युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। इसी का असर एलपीजी की कीमतों पर पड़ा है। गैस कंपनियों ने लागत बढ़ने का हवाला देते हुए कीमतों में संशोधन किया है। विशेषज्ञों के अनुसार, हाल में वैश्विक ऊर्जा कीमतों में तेजी मध्य पूर्व में सैन्य तनाव के बढ़ने के बाद आई है। इस संघर्ष ने ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है और वैश्विक तेल व गैस मार्गों में आपूर्ति स्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें ट्रेडिंग के दौरान 94.51 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को छू गईं है, इसके और बढ़ने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। ईरान और अमेरिका के बीच छिड़ी इस ‘जंग’ ने अब समुद्र में कोहराम मचा दिया है। कच्चे तेल की कीमतों में आया यह उछाल पिछले 30 महीनों यानी ढाई साल का सबसे उच्चतम स्तर है। इससे पहले 18 सितंबर 2023 को तेल की कीमतें इस स्तर के आसपास देखी गई थीं। 94.51 डॉलर का उच्‍चतम स्‍तर छूने के बाद कीमतें कुछ हद तक नीचे आईं। पेट्रोलियम मंत्रालय के पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय बास्केट के कच्चे तेल की औसत कीमत 5 मार्च 2026 को 93.41 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। कच्चे तेल की कीमतों में प्रति डॉलर की बढ़ोतरी भारत के आयात बिल को हजारों करोड़ रुपये बढ़ा देती है। कीमतों में आया यह 35 प्रतिशत का उछाल भारत के व्यापार घाटे और विदेशी मुद्रा भंडार पर सीधा प्रहार कर रहा है। उधर अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने के लिए एक माह की छूट दी है। हालांकि भारत सरकार ने बताया है कि अभी भारत के पास कच्‍चे तेल का स्‍टॉक है, इसलिए फिलहाल चिंता की कोई बात नहीं है। ऊपर वाली स्थिति में भी सरकार के पास दो रास्ते होंगे. या तो वह एक्साइज ड्यूटी घटाकर जनता को राहत दे, या फिर कीमतों को बाजार के हवाले छोड़ दे। हालांकि, युद्ध की अनिश्चितता को देखते हुए सरकार अभी ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में है। यह स्थिति कब तक रहेगी कोई बताने वाला नहीं है। बताया जाता है होर्मुज स्ट्रेट, जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा क्रूड ऑयल गुजरता है, वहां करीब 700 से ज्यादा तेल टैंकर फंसे हुए हैं। हालात ऐसे हैं कि तेल की सप्लाई लगभग रुक गई है।
एक वैश्विक रिपोर्ट के मुताबिक युद्ध जारी रहा तो कच्चे तेल के आयात के बगैर अमेरिका 200 दिन ही टिक सकता है, वहीं, साउथ कोरिया के पास 214 दिन तक रिजर्व है। इसी भांति जर्मनी के पास 130, फ्रांस के पास 122, यूके के पास 120, न्यूजीलैंड के पास 95, तुर्किए के पास 94, भारत के पास 74 और ऑस्ट्रेलिया के पास 47 दिन तक का कच्चा तेल है। इसका साफ़ मतलब है, ईरान में अगर लगभग दो-ढाई महीने तक जंग चलती है और कच्चा तेल नहीं मिलता है तो भी भारत पर बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। दूसरी तरफ पाकिस्तान जैसे देश में तेल के लिए हाहाकारी मची है। वहां तेल की राशनिंग की ख़बरें भी मिल रही है। यह दावा भी किया जा रहा है, ईरान और इजराइल के बीच बढ़ते युद्ध और मिडिल ईस्ट में तनाव का असर केवल तेल और गैस बाजार तक सीमित नहीं रह सकता। अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो फर्टिलाइजर सप्लाई चेन पर गंभीर असर पड़ सकता है। होर्मुज स्ट्रेट से दुनिया के बड़े हिस्से का फर्टिलाइजर गुजरता है, ऐसे में किसी भी रुकावट से यूरिया, अमोनिया और अन्य फर्टिलाइजर की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। इसका असर वैश्विक खाद्य उत्पादन और कीमतों पर पड़ने की आशंका है। आने वाले समय में गेहूं, चावल और अन्य खाद्य पदार्थ महंगे हो सकते हैं।

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