बाल मुकुन्द ओझा
देश में यूपी एक मात्र ऐसा राज्य है जहां चौबीसो घंटे राजनीतिक पार्टिया चुनावी मोड़ में रहती है। हालाँकि यूपी विधान सभा के चुनाव अगले साल होने है मगर चुनावी दुंदुभि अभी से बजने लगी है। सियासी पार्टियों ने अपनी अपनी कमर कसनी शुरू कर दी है। गठजोड़ बनने बिगड़ने शुरू हो गए है। बुलडोज़र के बाद अब ब्रह्मोस की चर्चा सुनाई देने लगी है। बात बात पर नेताओं ने चुनाव में देख लेने की धमकिया देनी शुरू कर दी है। पिछले एक साल से चुनाव की चर्चा सुनी जा रही है। अभी चुनाव में एक साल शेष है मग़र चुनाव की धमाचौकड़ी थमने का नाम नहीं ले रही है। यूपी में नौ साल से भाजपा सत्तारूढ़ है और योगी आदित्यनाथ के पास सत्ता की कमान है। भाजपा तीसरे टर्म के लिए जी तोड़ कोशिश में लगी है। यहाँ भाजपा और समाजवादी पार्टी में सीधी और कांटे की लड़ाई है। कांग्रेस और बसपा समाप्त प्राय है। अन्य छोटी पार्टिया अपने अस्तित्व को बचाने के फेर में है। सपा मुखिया पीडीए बनाकर मतों को एक मुश्त अपनी झोली में डालने के प्रयास में जुटी है वहीँ भाजपा हिन्दू मतों को कटेंगे तो बटेंगे का नारा देकर प्राप्त करने के प्रयास में है। कुछ अन्य जातीय पार्टियां भी जातीय मतों के बुते पर मैदान में डटी है।
उत्तर प्रदेश में चुनावी माहौल तेजी से गहराने लगा है। मिशन-2027 को लेकर भाजपा ने अपनी चुनावी रणनीति तैयार करना शुरू कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के लखनऊ दौरे ने भी बड़े राजनीतिक संदेश को उजागर किया। भाजपा मिशन-2027 को लेकर ओबीसी वोट बैंक, हिंदुत्व और राष्ट्रवाद पर केंद्रित रणनीति अपना रही है। पार्टी ने कुर्मी वोटों को साधने के लिए पंकज चौधरी को प्रदेश का अध्यक्ष बनाया गया है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हिस्सा परंपरागत रूप से समाजवादी पार्टी के साथ रहा है। सांसद ओवैसी की पार्टी भी दम ख़म के साथ चुनाव में कूद रही है। उसे मुस्लिम मतों पर पूरा भरोसा है। मुस्लिम मत बंटे तो सपा की नुक्सान होगा और भाजपा की राह आसान हो जाएगी। यू पी चुनाव में भाजपा और सपा में कांटे का मुकाबला है। चुनावी संघर्ष में मुख्य राजनीतिक दलों ने चुनाव जीतने के लिए साम, दाम, दंड और भेद का रास्ता अख्तियार किया है। दागी, बागी, जातीय, और दल बदलुओं का सभी दलों में भारी बोलबाला है। ये लोग बाहुबली और धनबली है जिसके कारण यू पी की राजनीति पर उनका जबरदस्त कब्जा है। चुनाव में ऐसे लोगों को उमीदवार बनाया जाता है जिनके खिलाफ रंगदारी, हत्या, गुंडागर्दी आदि के मुकदमें चल रहे है।
यूपी के चुनाव ही देश की दशा और दिशा निर्धारित करेंगे। सत्तारूढ़ भाजपा ने मोदी और योगी के सहारे जहाँ सत्ता में वापसी की उम्मीद जगाई है वहां अखिलेश की समाजवादी पार्टी ने कुछ छोटे दलों से गठजोड कर मुकाबला कांटे का खड़ा करने का प्रयास कर रही है। उत्तर प्रदेश का चुनाव जातीय रंग में हर बार रंग जाता है। भाजपा को स्वर्ण के साथ पिछड़े, दलित और राजपूत तथा समाजवादी पार्टी को यादव, मुस्लिम मतों के साथ जाटों पर भरोसा है वहीँ बसपा दलित – मुस्लिम मतों पर आश्रित है। इससे पूर्व विभिन्न चैनल-एजेंसियों ने उत्तर प्रदेश की सियासत को लेकर सर्वे किया है। उन सभी ओपिनियन पोल्स में यूपी में भाजपा के जीत की भविष्यवाणी की गई है। सपा को पहले के मुकाबले काफी मज़बूत स्थिति में बताया गया। ये विधान सभा चुनाव जहाँ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ मुख्यमंत्री योगी का भविष्य तय करेंगे वहाँ समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती और ओवैसी की राजनीति की धार भी देखेंगे। फिलहाल शह और मात का खेल शुरू हो गया है। एक-दूसरे पर घात-प्रतिघात की राजनीति शुरू हो गई है।
उत्तरप्रदेश में वर्तमान में 18 संभाग, 75 जिले, 332 तहसीलें, 742 नगर, तीन लाख से अधिक गांव, 80 लोकसभा और 31 राज्यसभा क्षेत्र हैं। यहाँ विधानसभा की 403 सीटें हैं जो देश में सबसे अधिक हैं।

यूपी जहां चौबीसों घंटे राजनीतिक पार्टियां चुनावी मोड में रहती है
ram


