कचरे पर कड़ा रुख: न्यायपालिका के निर्देश और ज़मीनी सच्चाई

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-सुनील कुमार महला
ठोस कचरे का प्रबंधन आज के समय की एक बहुत बड़ी आवश्यकता बन चुका है। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज लगातार बढ़ती जनसंख्या, बढ़ते शहरीकरण, औधोगिकीकरण और उपभोग की बढ़ती प्रवृत्ति के कारण धरती पर ठोस कचरे की मात्रा लगातार बढ़ रही है, जिससे हमारे पर्यावरण, पारिस्थितिकी तंत्र, मानव व जीवों के स्वास्थ्य और विभिन्न संसाधनों पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। यदि इस कचरे का सही तरीके से संग्रहण, पृथक्करण, पुनर्चक्रण(रि-साइक्लिंग) और इसका समय रहते निपटान नहीं किया गया, तो नीले ग्रह(धरती पर) पर भूमि, जल और वायु प्रदूषण की समस्या और भी गंभीर हो सकती है।

वास्तव में, आज के समय में ठोस कचरे को बोझ नहीं बल्कि संसाधन के रूप में देखने की आवश्यकता है। गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग करना, जैविक कचरे से खाद बनाना, प्लास्टिक और अन्य पदार्थों का पुनर्चक्रण(रि-साइक्लिंग) करना तथा जन-जागरूकता बढ़ाना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि स्वच्छ और स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए ठोस कचरे का प्रभावी प्रबंधन केवल सरकार की ही जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह तो प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। जब समाज और प्रशासन मिलकर प्रयास करेंगे, तभी सतत विकास(सस्टेनेबल डेवलपमेंट) और स्वच्छ पर्यावरण का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकेगा।

बहरहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि इस क्रम में हाल ही में माननीय सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने ठोस कचरा प्रबंधन नियमों के ठीक से पालन न होने पर चिंता जताई है और 1 अप्रैल 2026 से लागू होने वाले नए नियमों को प्रभावी बनाने के लिए कई निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि साफ और स्वस्थ पर्यावरण में जीना, जीवन के अधिकार का ही अहम् हिस्सा है। गौरतलब है कि न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति एस. वी. एन. भट्टी की पीठ ने 19 फरवरी को यह आदेश सुनाया। दरअसल, यह मामला भोपाल नगर निगम की उन अपीलों से जुड़ा था, जो नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेश के खिलाफ दायर की गई थीं।

अदालत ने यह बात कही है कि अभी कानून में सुधार का इंतजार करना ठीक नहीं है, क्योंकि कचरे की खराब व्यवस्था से लोगों के स्वास्थ्य और देश की अर्थव्यवस्था दोनों पर असर पड़ता है। कोर्ट ने माना कि पूरे देश में कचरा प्रबंधन नियमों का पालन समान रूप से नहीं हो रहा है और घरों से गीला-सूखा-खतरनाक कचरा अलग-अलग करने की व्यवस्था अभी तक भी पूरी तरह से लागू नहीं हो पाई है। बड़े शहरों में बढ़ते कचरे के ढेर भी चिंता का कारण हैं।कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा ‘अब नहीं तो कभी नहीं’ और स्पष्ट किया कि अगर स्रोत पर कचरा अलग नहीं होगा और जरूरी सुविधाएं नहीं होंगी, तो अच्छे परिणाम की उम्मीद करना व्यर्थ है। अदालत ने पार्षदों, महापौरों और वार्ड प्रतिनिधियों को कचरा अलग कराने के लिए जिम्मेदार ‘लीड फैसिलिटेटर’ बनाने को कहा, ताकि हर नागरिक नियमों का पालन करे। यहां पाठकों को बताता चलूं कि लीड फैसिलिटेटर वह व्यक्ति होता है जो किसी कार्यक्रम, प्रशिक्षण, कार्यशाला या परियोजना में पूरे समूह की प्रक्रिया का नेतृत्व करता है और यह सुनिश्चित करता है कि गतिविधियाँ सही दिशा में और निर्धारित उद्देश्यों के अनुसार चलें। अच्छी बात यह है कि सभी नगर निकायों को 100% पालन के लिए समय-सीमा तय कर सार्वजनिक करने, प्रगति की फोटो जिलाधिकारी को भेजने और बड़े कचरा उत्पादकों से 31 मार्च तक नियमों का पालन सुनिश्चित कराने का निर्देश दिया गया है। इतना ही नहीं, प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को चार तरह के कचरे (गीला, सूखा, सैनिटरी और विशेष) के अलग-अलग प्रबंधन की व्यवस्था जल्दी तैयार करने को कहा गया है।

अदालत ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को निर्देश दिया कि कचरा प्रबंधन नियमों को स्कूल की पढ़ाई में शामिल किया जाए और इन्हें सभी राज्यों की स्थानीय भाषाओं में भी उपलब्ध कराया जाए।अब नियम तोड़ने पर सख्त कार्रवाई होगी। पहले जुर्माना, बार-बार उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई और जरूरत पड़ने पर आपराधिक केस भी दर्ज किया जा सकता है। लापरवाही करने वाले अधिकारी भी इसके दायरे में आएंगे। कोर्ट ने मोबाइल अदालतों की संभावना पर भी विचार करने की बात कही है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि 1 अप्रैल 2026 से देश के सभी न्यायालयों और संस्थानों में भी कचरा प्रबंधन नियमों का पालन होना चाहिए। नगर निकायों को लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए अभियान चलाने होंगे, जैसे कचरा कम करना, घर में खाद बनाना और सैनिटरी कचरे को सुरक्षित तरीके से पैक करना।ये सभी निर्देश इसलिए दिए गए हैं ताकि 1 अप्रैल 2026 से पहले पूरी तैयारी हो सके और नियम सही तरीके से लागू किए जा सकें।

अंत में यही कहूंगा कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सही चिंता जताई है कि ठोस कचरा प्रबंधन केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि जन-स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। नियमों के कमजोर अनुपालन, स्थानीय निकायों की जवाबदेही की कमी और योजनाओं जैसे अटल मिशन फॉर रिजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन तथा स्मार्ट सिटीज मिशन में खामियों के कारण समस्या बढ़ी है। समाधान के लिए सख्त नियम लागू करना, जनजागरण, अधिकारियों की जवाबदेही और बेहतर शहरी अवसंरचना निवेश अनिवार्य हैं, तभी कचरा-मुक्त भारत का लक्ष्य संभव हो पाएगा।

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