डिजिटलीकरण की रफ्तार और ‘डिजिटल जहर’ का खतरा

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-सुनील कुमार महला
आज हमारा देश भारत तेजी से डिजिटाइजेशन की ओर अग्रसर है, और कहना ग़लत नहीं होगा कि इसमें स्मार्टफोन विशेषकर एंड्रॉयड का सबसे बड़ा योगदान है। यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि वैश्विक स्तर पर जहां एंड्रॉयड उपयोगकर्ताओं की संख्या लगभग 3.9 अरब (390 करोड़) है, वहीं भारत में वर्ष 2025–2026 के अनुमान के अनुसार कुल स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं की संख्या लगभग 75 करोड़ (750 मिलियन) तक पहुंच चुकी है। इनमें से लगभग 89%-90% स्मार्टफोन एंड्रॉयड आधारित हैं। अर्थात सरल शब्दों में कहें तो भारत में करीब 65-70 करोड़ लोग एंड्रॉयड फोन का उपयोग कर रहे हैं।यह भी कहा जा सकता है कि आज हर 10 में से लगभग 9 लोग एंड्रॉयड फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं। वास्तव में, हमारे देश में सस्ते डेटा प्लान, किफायती स्मार्टफोन और डिजिटल सेवाओं का विस्तार इस तेज़ी के प्रमुख कारण हैं।

हालांकि, इस डिजिटल क्रांति का एक चिंताजनक पहलू भी सामने आ रहा है-‘डिजिटल जहर’ अर्थात मोबाइल और स्क्रीन की बढ़ती लत, जो विशेष रूप से बच्चों और किशोरों के लिए गंभीर सामाजिक और स्वास्थ्य संकट बनती जा रही है। आंकड़े इस समस्या की भयावहता को स्पष्ट करते हैं। क्या यह चिंताजनक बात नहीं है कि हमारे देश में 0-5 वर्ष के बच्चे प्रतिदिन औसतन 2.2 घंटे स्क्रीन पर बिताते हैं, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमा से लगभग दोगुना है। वहीं, 2 वर्ष से कम उम्र के बच्चे भी औसतन 1.2 घंटे स्क्रीन देखते हैं, जबकि उनके लिए स्क्रीन टाइम शून्य होना चाहिए।

इतना ही नहीं, यदि हम यहां पर स्कूल जाने वाले बच्चों की बात करें, तो एक अध्ययन के अनुसार 62.5% बच्चों में मध्यम से उच्च स्तर की स्क्रीन लत पाई गई है, और उनका औसत स्क्रीन टाइम लगभग 4 घंटे प्रतिदिन है। एक अन्य रिपोर्ट बताती है कि भारत के 74% छात्र रोजाना 2 घंटे से अधिक स्क्रीन का उपयोग करते हैं, जिनमें से 21% बच्चे 4 घंटे से भी अधिक समय मोबाइल, गेमिंग या सोशल मीडिया पर बिताते हैं। लगभग 70% माता-पिता का मानना है कि उनके बच्चे वीडियो और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के आदी हो चुके हैं। और भी चिंता की बात यह है कि 64% बच्चे सोशल मीडिया और गेमिंग के आदी हैं, जबकि केवल 20% बच्चों में किसी प्रकार की डिजिटल लत नहीं पाई गई है।एक उपलब्ध जानकारी के अनुसार आज के समय में भारत में लगभग 90% किशोरों के पास स्मार्टफोन की पहुंच है और 76% बच्चे मनोरंजन के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने भी डिजिटल लत को बच्चों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा बताया है, क्योंकि यह उनकी पढ़ाई, एकाग्रता और व्यवहार पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही है।

इस डिजिटल लत के दुष्परिणाम भी स्पष्ट रूप से सामने आ रहे हैं। मसलन, ध्यान में कमी, चिड़चिड़ापन, नींद की समस्या, पढ़ाई में गिरावट, सामाजिक दूरी, अकेलापन, मानसिक तनाव और अवसाद जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। यहां पाठकों को बताता चलूं कि हाल ही में राज्यसभा में भी इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया गया, जहां यह बताया गया कि कई बच्चे प्रतिदिन 7-8 घंटे मोबाइल स्क्रीन पर बिता रहे हैं। इससे उनकी शिक्षा, सामाजिक जीवन और नींद पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।विशेषज्ञों ने इस स्थिति को ‘डिजिटल गुलामी’ तक करार दिया है, क्योंकि बच्चे मोबाइल के बिना स्वयं को असहज महसूस करते हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज के समय में सोशल मीडिया पर लाइक्स और कमेंट्स की होड़ बच्चों में हीन भावना, तनाव और अवसाद को बढ़ा रही है, वहीं ऑनलाइन बुलिंग जैसी समस्याएं भी उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं। हाल ही में एक अमेरिकी अदालत ने भी यह माना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का डिजाइन इस प्रकार बनाया जाता है कि उपयोगकर्ता बार-बार उन्हें इस्तेमाल करें, जिससे लत की प्रवृत्ति बढ़ती है। इस बढ़ती समस्या के समाधान के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए हैं। राज्यसभा में राष्ट्रीय स्तर पर नीति बनाने, स्कूलों में ‘डिजिटल हेल्थ’ को पाठ्यक्रम में शामिल करने और सोशल मीडिया तथा गेमिंग कंपनियों पर सख्त नियम लागू करने की मांग की गई है। साथ ही, अभिभावकों को यह सलाह दी गई है कि वे बच्चों पर केवल प्रतिबंध लगाने के बजाय उनसे खुलकर संवाद करें, उनके साथ समय बिताएं और उन्हें खेल-कूद तथा रचनात्मक गतिविधियों की ओर प्रेरित करें।

अंततः, यह स्पष्ट है कि डिजिटल लत अब केवल एक आदत नहीं, बल्कि समाज के सामने खड़ी एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों ने जहां अभिव्यक्ति और सूचना के नए द्वार खोले हैं, वहीं उनका अत्यधिक उपयोग बच्चों और किशोरों के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास को प्रभावित कर रहा है। यदि समय रहते प्रभावी और संतुलित कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर गहरा और दीर्घकालिक होगा। इसलिए सरकार, शैक्षणिक संस्थान, अभिभावक और समाज-सभी को मिलकर जागरूकता, संतुलित उपयोग और सकारात्मक संवाद के माध्यम से इस ‘डिजिटल जहर’ से बच्चों और युवाओं को बचाने की दिशा में ठोस प्रयास करने होंगे।

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