जयपुर। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आज अरावली संरक्षण के पक्ष में चल रहे #SaveAravalli अभियान का समर्थन करते हुए अपनी सोशल मीडिया प्रोफाइल पिक्चर (DP) बदली। उन्होंने कहा कि यह महज एक फोटो बदलना नहीं, बल्कि उस नई परिभाषा के खिलाफ एक सांकेतिक विरोध है, जिसके तहत 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ‘अरावली’ मानने से इंकार किया जा रहा है।
गहलोत ने कहा कि अरावली के संरक्षण को लेकर आए इन बदलावों ने पूरे उत्तर भारत के भविष्य पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। उन्होंने जनता से भी अपील की है कि वे अपनी डीपी बदलकर इस मुहिम का हिस्सा बनें।
पूर्व मुख्यमंत्री ने अरावली की नई परिभाषा को अस्तित्व के लिए खतरनाक बताते हुए तीन प्रमुख चिंताएं जाहिर कीं:
1. मरुस्थल एवं लू के खिलाफ कुदरती दीवार : गहलोत ने कहा कि अरावली कोई मामूली पहाड़ नहीं, बल्कि प्रकृति की बनाई हुई ‘ग्रीन वॉल’ है। यह थार रेगिस्तान की रेत और गर्म हवाओं (लू) को दिल्ली, हरियाणा और यूपी के उपजाऊ मैदानों की ओर बढ़ने से रोकती है। यदि ‘गैपिंग एरिया’ या छोटी पहाड़ियों को खनन के लिए खोल दिया गया, तो रेगिस्तान हमारे दरवाज़े तक आ जाएगा और तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि होगी।
2. प्रदूषण से रक्षा : उन्होंने कहा कि ये पहाड़ियाँ और यहां के जंगल एनसीआर (NCR) और आसपास के शहरों के लिए ‘फेफड़ों’ (Lungs) का काम करते हैं। ये धूल भरी आंधियों को रोकते हैं और प्रदूषण कम करने में अहम भूमिका निभाते हैं। श्री गहलोत ने चिंता जताई कि जब अरावली के रहते हुए स्थिति इतनी गंभीर है, तो अरावली के बिना स्थिति कितनी वीभत्स होगी, इसकी कल्पना भी डरावनी है।
3. गहराता जल संकट और ईकोलॉजी : अरावली को जल संरक्षण का मुख्य आधार बताते हुए उन्होंने कहा कि इसकी चट्टानें बारिश के पानी को ज़मीन के भीतर भेजकर भूजल रिचार्ज करती हैं। अगर पहाड़ खत्म हुए, तो भविष्य में पीने के पानी की गंभीर किल्लत होगी, वन्यजीव लुप्त हो जाएंगे और पूरी इकोलॉजी खतरे में पड़ जाएगी।
गहलोत ने जोर देकर कहा कि वैज्ञानिक दृष्टि से अरावली एक निरंतर शृंखला (Continuous Chain) है। इसकी छोटी पहाड़ियाँ भी उतनी ही अहम हैं जितनी बड़ी चोटियाँ। अगर दीवार में एक भी ईंट कम हुई, तो सुरक्षा टूट जाएगी।
केंद्र और सुप्रीम कोर्ट से अपील : अंत में, गहलोत ने केंद्र सरकार और माननीय सर्वोच्च न्यायालय से विनम्र अपील की है कि भावी पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए इस परिभाषा पर पुनर्विचार (Reconsider) किया जाए। उन्होंने कहा कि अरावली को ‘फीते’ या ‘ऊंचाई’ से नहीं, बल्कि इसके ‘पर्यावरणीय योगदान’ (Ecological Impact) के आधार पर आंका जाना चाहिए।

अरावली की नई परिभाषा उत्तर भारत के भविष्य के लिए खतरा, केंद्र सरकार पुनर्विचार करे : गहलोत
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