बुज़ुर्गों की आँखों में झलकती बेबसी हमारे समाज का आईना

ram

-नफीस आफरीदी
भारतीय संस्कृति में वृद्धों के लिए सदैव आदर का स्थान रहा है। परिवार में वे मार्गदर्शक, अनुभव के स्रोत और नैतिक मूल्यों के संवाहक रहे। समाज में यदि बुज़ुर्गों को सम्मान, सुरक्षा और स्नेह मिलता है तो वह समाज न केवल सभ्य बल्कि नैतिक रूप से भी समृद्ध माना जाता है। वहीं वृद्धों की जब उपेक्षा होती है तो विकास के दावों के बावजूद मानवीय मूल्यों का ह्रास स्पष्ट दिखाई देता है। आज का समय इसी विडंबना का साक्षी है जब आर्थिक और तकनीकी प्रगति के बीच वृद्धों की उपेक्षा एक सामाजिक अभिशाप के रूप में उभर रही है। संयुक्त परिवार व्यवस्था ने उन्हें सुरक्षा, सम्मान और सहभागिता प्रदान की। आज आधुनिकता, शहरीकरण और व्यक्तिवादी सोच के बढ़ते प्रभाव ने इस संरचना को बदल दिया है। आज परिवार छोटे हो गए, रिश्तों में औपचारिकता बढ़ गई और जीवन की प्राथमिकताओं में बुज़ुर्ग पीछे छूटते जा रहे हैं।
आज केवल अनदेखी नहीं बल्कि उसके पीछे एक गहरी पीड़ा छिपी है। उनके साथ समय न बिताना, उनकी बातों को महत्व न देना, उन्हें “पुराने विचारों वाला” कहकर खारिज कर देना एक बड़ी पीड़ा है।पेंशन या आय के अभाव में उन्हें दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है और कई बार यह निर्भरता अपमान में बदल जाती है।उचित इलाज और देखभाल का अभाव उनकी पीड़ा को और बढ़ा देता है। उन्हें निर्णयों से दूर रखना, सामाजिक गतिविधियों से अलग कर देना आदि सब उन्हें भीतर से तोड़ देता है। आज वृद्धों की उपेक्षा केवल पारिवारिक व्यवहार तक सीमित नहीं बल्कि कई खतरनाक रूपों में सामने आ रही है। तकनीकी अनभिज्ञता के कारण बुज़ुर्ग आसानी से ठगी का शिकार हो जाते हैं और अपनी जीवनभर की पूँजी खो बैठते हैं। अकेले रहने वाले बुज़ुर्गों के साथ लूटपाट और हिंसा की घटनाएँ बढ़ रही हैं। यह इस बात का संकेत है कि परिवार अपने दायित्वों से पीछे हट रहे हैं। कई वृद्ध वहाँ मजबूरी में जीवन बिता रहे हैं। वृद्धों की उपेक्षा के पीछे कई सामाजिक और मानसिक कारण हैं। आज रिश्तों की जगह सुविधा और उपयोगिता ने ले ली है। जहाँ लाभ नहीं दिखता, वहाँ संबंध भी कमजोर पड़ जाते हैं। वृद्धों की उपेक्षा का प्रभाव केवल उन पर ही नहीं, बल्कि पूरे समाज पर पड़ता है। बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं। यदि वे उपेक्षा देखते हैं तो आगे चलकर वही आगे दोहराते हैं। करुणा, सहानुभूति और सम्मान जैसे मूल्यों का क्षय समाज को खोखला बना देता है। वृद्धों में मानसिक तनाव और अवसाद बढ़ता है, जो एक गंभीर सामाजिक चुनौती बनती जा रही है। इस सामाजिक अभिशाप से मुक्ति के लिए हमें सामूहिक प्रयास करने होंगे। हर व्यक्ति को यह समझना होगा कि आज के बुज़ुर्ग, कल हम स्वयं होंगे।
वृद्धों की उपेक्षा केवल एक सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि हमारी संवेदनशीलता की परीक्षा है। यह अभिशाप तभी समाप्त होगा जब हम अपने भीतर झाँकेंगे और अपने व्यवहार को बदलेंगे। वृद्धों के प्रति हमारा व्यवहार ही हमारी मानवता का सबसे सच्चा प्रमाण है। यदि हम उन्हें सम्मान देंगे, तो समाज मजबूत होगा; यदि हम उन्हें उपेक्षित करेंगे, तो हमारा भविष्य भी उसी उपेक्षा का शिकार होगा। तकनीक ने आज हमारे जीवन को काफी आसान बनाया है, लेकिन बुज़ुर्गों के लिए यह कई बार जंजाल बन जाता है।साइबर अपराधी विशेष रूप से बुज़ुर्गों को निशाना बनाते हैं क्योंकि वे तकनीकी जानकारी में अपेक्षाकृत कमजोर होते हैं, भरोसा जल्दी कर लेते हैं, बैंकिंग और डिजिटल प्रक्रियाओं को पूरी तरह नहीं समझते। केवाईसी अपडेट या बैंक कॉल के नाम पर ठगी, लॉटरी या इनाम का झांसा, फर्जी पुलिस या सरकारी अधिकारी बनकर डराना, ओटीपी या बैंक विवरण हासिल कर खाते खाली करना जैसी कई घटनाएँ सामने आई हैं जहाँ बुज़ुर्ग अपनी जीवनभर की जमा पूंजी एक झटके में खो बैठे। इससे न केवल आर्थिक नुकसान बल्कि उनके आत्मविश्वास और मानसिक संतुलन पर भी गहरा आघात पहुंचाता है।
समाज में बढ़ती भौतिकवादी प्रवृत्ति ने अपराधों को बढ़ा दिया है। बुज़ुर्गों की हत्याओं के पीछे अक्सर उनकी संपत्ति हड़पने की लालसा, अकेलेपन का फायदा उठाकर लूटपाट और परिचितों या घरेलू सहायकों द्वारा विश्वासघात इसके बड़े हैं। अक्सर समाचारों में यह सामने आता है कि अकेले रह रहे बुज़ुर्गों की हत्या कर दी गई और कई दिनों तक किसी को इसकी जानकारी तक नहीं हुई। यह स्थिति केवल कानून-व्यवस्था की कमजोरी नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने के बिखरने का भी संकेत है। जहाँ पहले पड़ोस और समुदाय एक सुरक्षा कवच का काम करते थे, आज वहाँ भी दूरियाँ और उदासीनता बढ़ गई है।
वृद्धाश्रम कभी उन लोगों के लिए आश्रय स्थल माने जाते थे जिनका कोई नहीं होता। आज स्थिति बदल रही है।अब कई बुज़ुर्ग मजबूरी में वृद्धाश्रमों का सहारा ले रहे हैं, जबकि उनके अपने परिवार होते हैं। इसके पीछे परिवार में उपेक्षा और अपमान, देखभाल का अभाव, पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी, आर्थिक और भावनात्मक असुरक्षा प्रमुख कारण हैं। वृद्धाश्रम उन्हें भोजन, आश्रय और चिकित्सा सुविधा तो देते हैं, लेकिन वहाँ अपनापन नहीं दे सकते ,परिवार का स्नेह नहीं दे पाते जिससे उनका जीवन प्रतीक्षा में बदल जाता है। कई बुज़ुर्गों के लिए वृद्धाश्रम “घर” नहीं, बल्कि परिस्थितियों से समझौते का प्रतीक बन जाता है।
साइबर फ्रॉड, हत्याएँ और वृद्धाश्रम—तीनों समस्याएँ अलग-अलग दिखती हैं, लेकिन इनका मूल कारण एक ही बुज़ुर्गों की बढ़ती असुरक्षा और समाज की घटती संवेदनशीलता है। जहाँ परिवार कमजोर पड़ता है, वहाँ अपराधी मजबूत हो जाते हैं। जहाँ संवाद खत्म हो जाता है, वहाँ अकेलापन जन्म लेता है। जहाँ संवेदना मरती है, वहाँ इंसानियत दम तोड़ देती है। इन समस्याओं से निपटने के लिए बहुस्तरीय प्रयास आवश्यक हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि बुज़ुर्गों को “जिम्मेदारी” नहीं, बल्कि “सम्मान” के रूप में देखा जाए। उनके साथ होने वाली घटनाएँ समाज के अंतर्मन में बढ़ती संवेदनहीनता की प्रतीक हैं। अगर हम अभी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ एक ऐसे समाज में जीने को विवश होंगी जहाँ उम्र बढ़ना सम्मान नहीं बल्कि भय और असुरक्षा का कारण बन जाएगा।बुज़ुर्गों की आँखों में झलकती बेबसी, दरअसल हमारे समाज की आत्मा में पनपती रिक्तता का आईना है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *