भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का स्वर्णिम अध्याय : दांडी मार्च

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-सुनील कुमार महला

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की दृष्टि से 12 मार्च 1930 का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है। जैसा कि इसी दिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने गुजरात के साबरमती आश्रम से दांडी नामक स्थान तक लगभग 390 किलोमीटर (241 मील) की ऐतिहासिक पदयात्रा शुरू की थी। गौरतलब है कि इस आंदोलन को दांडी मार्च, नमक मार्च या दांडी सत्याग्रह कहा जाता है। वास्तव में, यह ब्रिटिश/अंग्रेजी सरकार के अन्यायपूर्ण नमक कानून के खिलाफ किया गया एक अहिंसक सविनय अवज्ञा आंदोलन था।

आंदोलन की शुरुआत:-
इस यात्रा में शुरुआत में केवल 78 सत्याग्रही शामिल थे (कुछ स्रोतों में 79 का भी उल्लेख मिलता है), लेकिन रास्ते में हजारों लोग इस आंदोलन से जुड़ते गए। गांधीजी की आयु उस समय 61 वर्ष थी, फिर भी वे 24 दिनों तक प्रतिदिन लगभग 16 से 19 किलोमीटर पैदल चलते रहे। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि गांधीजी के मार्च शुरू करने से पहले ही उनके प्रमुख सहयोगी और रणनीतिकार सरदार वल्लभभाई पटेल को 7 मार्च 1930 को ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार कर लिया था। दरअसल, अंग्रेजी सरकार को यह आशंका थी कि पटेल की संगठनात्मक क्षमता इस आंदोलन को और भी व्यापक बना सकती है।

नमक को आंदोलन का प्रतीक क्यों बनाया गया ?
नमक को इस आंदोलन का प्रतीक बनाया गया क्यों कि उस समय ब्रिटिश सरकार ने नमक के उत्पादन और उसकी बिक्री पर जहां एक ओर कर(टैक्स) लगा रखा था वहीं पर दूसरी ओर उस पर एकाधिकार(मोनोपॉली) भी था।नमक आम जन की रोजमर्रा जिंदगी का अहम् हिस्सा था और आम जनता को नमक के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ती थी, जो कभी-कभी उसके वास्तविक मूल्य से 14 गुना तक अधिक हो जाती थी। जानकारी तो यह भी मिलती है कि सरकार उस नमक को भी नष्ट कर देती थी, जिसे वह ऊंचे दाम पर बेच नहीं पाती थी, ताकि लोग उसे मुफ्त में न उठा सकें। गांधीजी ने नमक को आंदोलन का प्रतीक इसलिए चुना, क्योंकि नमक हर गरीब-अमीर की दैनिक आवश्यकता है। इस साधारण विषय के माध्यम से उन्होंने पूरे देश की जनता को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ दिया। हालांकि, शुरुआत में कांग्रेस के कुछ नेताओं को यह मुद्दा बहुत ही छोटा लगा और उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन बाद में यही आंदोलन पूरे देश में फैल गया।

दांडी पहुँचकर कानून भंग:-
इतिहास के अध्ययन से पता चलता है कि लगभग 24 दिनों की यात्रा के बाद 6 अप्रैल 1930 को गांधीजी गुजरात के तटीय गांव दांडी पहुँचे। वहां उन्होंने समुद्र तट पर पड़ी नमक-मिश्रित मिट्टी उठाकर ब्रिटिश नमक कानून का सांकेतिक रूप से उल्लंघन किया। वास्तव में उन्होंने नमक बनाया नहीं था, बल्कि मिट्टी और नमक के मिश्रण को उठाकर कानून तोड़ा था। पाठकों को बताता चलूं कि दांडी में गांधीजी द्वारा बनाए गए चुटकी भर नमक की उस समय नीलामी हुई, जो 1600 रुपये में बिका था। आज के मूल्य के अनुसार यह राशि लाखों रुपये के बराबर मानी जाती है।

दांडी आंदोलन का विस्तार:-
दांडी मार्च के बाद पूरे देश में नमक कानून तोड़ने की जैसे लहर-सी फैल गई थी। लाखों लोग सविनय अवज्ञा आंदोलन से जुड़ गए और ब्रिटिश शासन के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। उल्लेखनीय है कि ब्रिटिश सरकार ने इस आंदोलन को दबाने के लिए 60,000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया। यह भी उल्लेखनीय है कि 5 मई 1930 को गांधीजी को भी गिरफ्तार कर लिया गया था, लेकिन फिर भी यह आंदोलन जारी रहा। बाद में कवयित्री और महान् स्वतंत्रता सेनानी सरोजिनी नायडू ने 21 मई 1930 को लगभग 2500 सत्याग्रहियों का नेतृत्व करते हुए बंबई से लगभग 150 मील उत्तर स्थित धरासना नमक कारखाने पर सत्याग्रह किया।

दांडी का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव:-
दांडी मार्च को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर की बड़ी व महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने धरासना सत्याग्रह के दौरान सत्याग्रहियों पर हुए पुलिस के क्रूर लाठीचार्ज की रिपोर्टिंग दुनिया भर में भेजी, जिससे ब्रिटिश सरकार की वैश्विक स्तर पर कड़ी आलोचना हुई। इस आंदोलन के कारण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पहली बार पश्चिमी मीडिया की प्रमुख सुर्खियों में आया। इसी वर्ष 1930 में टाइम मैगज़ीन ने गांधीजी को ‘मैन आफ द इयर’ घोषित किया और उनकी तुलना एक संत से की। बहरहाल, यहां यह भी गौरतलब है कि धरासना सत्याग्रह 1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान हुआ एक महत्वपूर्ण अहिंसक आंदोलन था और महात्मा गांधी की गिरफ्तारी के बाद इसका नेतृत्व सरोजिनी नायडू और अब्बास तैयबजी ने किया था। सत्याग्रहियों ने गुजरात के धरासना नमक कारखाने की ओर शांतिपूर्ण मार्च किया, लेकिन ब्रिटिश पुलिस ने निहत्थे लोगों पर बेरहमी से लाठीचार्ज किया। इसके बावजूद सत्याग्रही अहिंसा पर डटे रहे। इस घटना ने ब्रिटिश शासन की कठोरता को दुनिया के सामने उजागर किया और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति बढ़ाई।

गांधी-इरविन समझौता:-
आंदोलन के दबाव के कारण ब्रिटिश सरकार को अंततः भारतीय नेताओं से बातचीत करनी पड़ी। जनवरी 1931 में गांधीजी को जेल से रिहा किया गया और उन्होंने भारत के वायसराय लार्ड इरविन से बातचीत की। इसके परिणामस्वरूप गांधी-इरविन समझौता हुआ, जिसके तहत सविनय अवज्ञा आंदोलन को अस्थायी रूप से समाप्त किया गया तथा इसके बाद गांधीजी ने अगस्त 1931 में लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया। हालांकि, यह सम्मेलन बहुत सफल नहीं रहा, फिर भी ब्रिटिश सरकार ने गांधीजी को एक ऐसी शक्ति के रूप में स्वीकार कर लिया, जिसे न तो दबाया जा सकता था और न ही नजरअंदाज किया जा सकता था। अंत में, निष्कर्ष के तौर पर यही कहूंगा कि दांडी मार्च भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक युगांतरकारी घटना साबित हुई। कहना ग़लत नहीं होगा कि नमक जैसे साधारण मुद्दे ने जाति, धर्म और वर्ग की सभी दीवारों को तोड़कर पूरे देश को एकजुट कर दिया था। वास्तव में, इस आंदोलन ने गांधीजी के अहिंसक प्रतिरोध और सत्याग्रह के सिद्धांत को वैश्विक पहचान दिलाई और ब्रिटिश साम्राज्य की नैतिक नींव को गहरा झटका दिया। दूसरे शब्दों में कहें तो, गांधी जी के दांडी मार्च ने भारतीयों में आज़ादी के प्रति अटूट विश्वास और संघर्ष की नई ऊर्जा भर दी थी तथा यह संकेत दे दिया था कि देश की स्वतंत्रता अब दूर नहीं रही।

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