तेज़ रफ़्तार जीवन में है संयम की आवश्यकता

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मनुष्य जीवन को सुचारु, सार्थक और सुखद बनाने में कई गुणों की आवश्यकता होती है जैसे सत्यनिष्ठा(ईमानदारी),करूणा और संवेदनशीलता, आत्मनियंत्रण(क्रोध, लालच, ईर्ष्या जैसी भावनाओं पर नियंत्रण), धैर्य, परिश्रम, अनुशासन, कृतज्ञता (जो मिला है उसकी सराहना करना और अहंकार से दूर रहना), सहयोग भावना,आदर और विनम्रता तथा सकारात्मक सोच (कठिनाइयों में भी उम्मीद बनाए रखना और समस्याओं का समाधान ढूंढना) आदि,लेकिन संयम उनमें सबसे उत्तम और प्रभावशाली गुण माना गया है। संस्कृत में बड़े ही खूबसूरत शब्दों में संयम के बारे में यह कहा गया है कि-‘संयमः सर्वसाधूनां भूषणं परमं स्मृतम्।संयमेनैव जीवन्ति विद्वांसोऽखिलकारिषु॥’ तात्पर्य यह है कि संयम सभी सज्जनों का परम आभूषण है। विद्वान लोग अपने सभी कार्यों में संयम के बल पर ही सफल होते हैं। वास्तव में यहां यह जानने और समझने की जरूरत है कि संयम का मतलब क्या है। दरअसल,संयम का अर्थ है-‘अपने विचारों, इच्छाओं, भावनाओं और व्यवहार को नियंत्रित रखते हुए संतुलित ढंग से जीवन जीना।’सरल शब्दों में कहें तो वास्तव में यह वह क्षमता है, जिसमें व्यक्ति कठिन परिस्थितियों, क्रोध, लालच, वासना या किसी भी आवेग के समय भी शांति, विवेक और मर्यादा बनाए रखता है।संक्षेप में कहें तो संयम जीवन में आत्मनियंत्रण, संतुलन और विवेकपूर्ण आचरण का नाम है। संयम का अर्थ केवल इच्छाओं को दबाना नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार अपने मन, वचन और कर्म को नियंत्रित रखना है। जो व्यक्ति अपनी भावनाओं, क्रोध, लालच, बोलचाल और व्यवहार पर रोक लगा सकता है, वही वास्तव में परिपक्वता की राह पर चलता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि संयमी व्यक्ति जीवन में हर स्थिति में धैर्य बनाए रखता है। कठिन समय में वह घबराता नहीं, बल्कि विवेक से निर्णय लेता है। यही कारण है कि ऐसे लोग जीवन में अधिक सफल होते हैं, क्योंकि जल्दबाज़ी और आवेश में लिए निर्णय अक्सर नुकसान पहुंचाते हैं। संयमित मन सोचने, समझने और सही दिशा चुनने में सक्षम होता है। सफलता उन्हीं के कदम चूमती है, जिनके विचार नियंत्रित होते हैं और जिनका ध्यान लक्ष्य पर केंद्रित रहता है। संक्षेप में यह बात कही जा सकती है कि जो व्यक्ति सदैव संयम में स्थित रहता है, उसकी सिद्धि और सफलता निश्चित है। संस्कृत में एक श्लोक के माध्यम से यह उल्लेख किया गया है कि-यः संयमं न जहाति दुःखसमयेऽपि दूरतः।तं नित्यमभिजानन्ति देवाः साधुवरं नरम्॥’ यानी कि जो व्यक्ति दुख या संकट में भी संयम नहीं छोड़ता, देवता भी उसे श्रेष्ठ मनुष्य मानते हैं। वास्तव में, संयम मनुष्य को भीतर से मजबूती देता है। यह ऐसा गुण है जो हर परिस्थिति में व्यक्ति को सही दिशा देता है और उसे सम्मान व सफलता दिलाता है।यह संयम ही होता है जो सही निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाता है,मानसिक शांति और स्थिरता लाता है।याद रखिए कि जिस व्यक्ति में संयम होता है, वह छोटी-छोटी बातों पर विचलित नहीं होता। मन स्थिर रहता है, तनाव कम होता है।संयम हमारे संवाद को संतुलित रखता है और संबंध मजबूत बनाता है। मतलब यह है कि यह हमारे रिश्तों में मधुरता लाता है।जीवन में बड़ी उपलब्धियाँ पाने के लिए धैर्य और निरंतरता चाहिए। संयम व्यक्ति को विचलित होने से बचाता है और लक्ष्य की ओर बनाए रखता है।संयम खाना-पीना, खर्च करना, बोलना, भावनाओं को व्यक्त करना आदि सब पर स्व-नियंत्रण देता है जिससे जीवन अनुशासित बनता है।सच तो यह है कि संयमी व्यक्ति परिपक्व, विश्वसनीय और संतुलित माना जाता है। यह व्यक्तित्व का श्रेष्ठ गुण है।संयम से व्यक्ति के भीतर एक आत्मिक शांति पैदा होती है। वह दूसरों की बातों पर अनावश्यक प्रतिक्रिया नहीं देता, छोटी बातों पर परेशान नहीं होता। इसलिए वह कभी ज्यादा दुखी नहीं होता, क्योंकि दुख का बड़ा कारण हमारी अनियंत्रित प्रतिक्रियाएं ही होती हैं। संयम हमें सिखाता है कि हर बात पर प्रतिक्रिया देना आवश्यक नहीं; कभी-कभी मौन और धैर्य ही बुद्धिमानी होती है। संयमित जीवन जीने वाला व्यक्ति दूसरों की भावनाओं को समझता है, सम्मान देता है और विवादों से दूर रहता है। उसके व्यवहार में मर्यादा और नम्रता होती है, जिससे समाज में उसका सम्मान बढ़ता है। आज के तेज़ रफ्तार जीवन में जहां तनाव, प्रतिस्पर्धा और अनिश्चितता हर कदम पर साथ चलती है, वहां संयम का महत्व और भी बढ़ जाता है। संयम हमें संतुलन, स्थिरता और सकारात्मकता सिखाता है। अंत में, यही कहूंगा कि जो व्यक्ति संयम रखना जानता है, वह न केवल सफल होता है, बल्कि मानसिक रूप से भी सुखी रहता है। संयम ही जीवन का वास्तविक आभूषण है, जो हमें सही दिशा और समृद्ध जीवन की ओर ले जाता है।

-सुनील कुमार महला

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