जीवन की सच्चाइयों का आइना है बुढ़ापा

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वृद्धावस्था जीवन का वह सच है जिसे आज नहीं तो कल सब को स्वीकारना होगा। एक दिन बुढापा आपको भी आएगा जिसके आगोश में हर किसी को आना है। जो लोग आज इस सच्चाई को स्वीकार नहीं रहे है उन्हें बुढ़ापा अपनी रंगत जरूर दिखायेगा। बुजुर्गजन वटवृक्ष के समान हैं। इनकी छाया में रहने वाले लोग धूप, बरसात, आंधी और असामान्य विपत्तियों से बचे रहते हैं। हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक परम्पराओं का इतिहास गौरवशाली रहा है। हमारे संस्कार में माता-पिता, गुरु, बुजुर्ग को देवताओं की श्रेणी दी गई है। तभी तो हमारी सामाजिक परंपरा में मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भव का ज्ञान परिवार की पाठशाला में ही सिखाया जाता है। जिदगी के हर बड़े फैसले या हर खुशखबरी के वक्त बड़े-बुजुर्गों के आशीर्वाद लेने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। बुजुर्गों का सम्मान करना हमारी समृद्ध परंपरा है। वृद्धजनों से हमें सदैव मार्गदर्शन मिलता है। जिस समाज में बुजुर्गो का सम्मान न हो, उन्हें परायों से नहीं, अपनों से ही प्रताड़ना मिले, उस समाज को धिक्कार है। अब स्थिति यह हो गई है कि लाचार और बुजुर्ग ही क्यों, अच्छे-खासे, चलते-फिरते माता-पिता को भी बच्चे अपने साथ रखना नहीं चाहते। हमारे देश में बुजुर्गों को अपने ही घर में प्रताड़ित होने के समाचार निश्चय ही दिल दहलाने वाले है। आश्चर्य की बात तो यह है इन्हें प्रताड़ित करने वाले कोई दूसरे नहीं अपने ही है। इनमें लाखों बुजुर्गों ने अदालतों में अपने ही लोगों के खिलाफ न्याय की गुहार की है। ये बुजुर्ग अपनी बची खुची जिंदगी बिना – विघ्न बाधा परिवारजनों के साथ काटना चाहते है।
मानव जीवन का फलसफा इतना उलझा हुआ है कि हम चाहकर भी इन उलझनों से स्वयं को अलग नहीं का सकते। ताजिंदगी जिन्होंने अपनों को पैरों पर खड़ा करने के लिए खून पसीना बहाया, समय आने पर अब वे ही उन्हें भूला बैठेंगे ऐसा उन्होंने सोचा भी नहीं होगा। उम्र के जिस पड़ाव में अपनों की जरूरत होती है, उसमें वे बेहद एकांकी जीवन जीने को मजबूर हैं। कोई अपने सुनहरे दिनों को याद करता है तो कोई अपनों को दिल में बसाये अपनी बाकी जिन्दगी काटने की ओर कदम बढ़ता है। अब बस यही यादें हैं जो वरिष्ठ नागरिकों के जीने का सहारा बनी हैं। इस लिए कहा जाता है जिंदगी एक अँधा कुवां है जो काल और समयचक्र के हिसाब से सब का इंतजार करती है। सामाजिक मूल्यों के अवमूल्यन के कारण बुजुर्गों का मान-सम्मान घटा है और वे एक अंधेरी कोठरी का शिकार होकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। यदि बुजुर्ग माता-पिता बीमार हो गये हैं तो अस्पताल ले जाने वाला कोई नहीं है। अनेक बुजुर्गों को एक पुत्र से दूसरे पुत्र के पास ठोकरे खाते देखा जाता है। अनेक को घरों से निकालने के समाचार मीडिया में सुर्खियों में प्रकाशित हो रहे हैं आज भी ऐसे अनेक बुजुर्ग मिल जायेंगे जो अपनी संतान और परिवार की उपेक्षा व प्रताड़ना के शिकार हैं। बुजुर्गों की देखभाल और उनके सम्मान की बहाली के लिए समाज में चेतना जगाने की जरूरत है। सद्व्यवहार से हम इनका दिल जीत सकते हैं।
भारत में कभी बुजुर्गों की पूजा की जाती थी। बुजुर्ग घर की आन बान और शान थे। बिना बुजुर्ग को पूछे कोई भी शुभ काम नहीं किया जाता था। आज वही बुजुर्ग अपने असहाय होने की पीड़ा से गुजर रहा है। दुर्भाग्य से उसे यह मर्मान्तक पीड़ा देने वाले कोई और नहीं अपितु उनके परिजन ही है। बुजुर्गो का सम्मान करने और सेवा करने की हमारे समाज की समृद्ध परंपरा रही है। समाचार पत्रों में इन दिनों बुजुर्गों के सम्बन्ध में प्रकाशित होने वाले समाचार निश्चय ही दिल दहला देने वाले हैं। राम राज्य का सपना देखने वाला हमारा देश आज किस दिशा में जा रहा है, यह बेहत चिंतनीय है। भारत में बुजुर्गों का मान-सम्मान तेजी से घटा है। यह हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का अवमूल्यन है, जिसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। बुजुर्गों की वास्तविक समस्याएं क्या है और उनका निराकरण कैसे किया जाये इस पर गहनता से मंथन की जरूरत है। आज घर घर में बुजुर्ग है। ये इज्जत से जीना चाहते है। मगर यह कैसे संभव है यह विचारने की जरूरत है।

-बाल मुकुन्द ओझा

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