खबर की सच्चाई जानने के लिए अखबार सर्वोत्तम माध्यम

ram

भारतीय समाचार पत्र दिवस प्रतिवर्ष 29 जनवरी को मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य नागरिकों को समाचार पत्र पढ़ने की आदत को प्रोत्साहित करना और उन्हें सामाजिक-राजनीतिक मामलों से अवगत कराना है। यह दिन भारतीय पत्रकारिता की समृद्ध विरासत को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है। समाचार पत्र जिसे सर्व साधारण की भाषा में अखबार कहा जाता है का महत्त्व कल भी था और आज भी है। समय के साथ मीडिया का खूब विकास और विस्तार हुआ। प्रिंट से हम लोग इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और वेब मीडिया तक पहुँच गए। प्रिंट मीडिया का महत्व इस बात से और बढ़ जाता है कि आप छपी हुई बातों को एक अरसे के अंतराल के बाद भी संदर्भ के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। देश का न्यायालय भी प्रिंट मीडिया को प्रामाणिक मानता है। ऐसे में प्रिंट मीडिया की जिम्मेदारी और कर्तव्य भी बढ़ जाते है। प्रिंट मीडिया में जहां हर खबर कई चरणों की जांच पड़ताल के बाद ही प्रकाशित की जाती है वहीं सोशल मीडिया पर वायरल हुई खबर का कोई ठौर ठिकाना नहीं रहता। हमारा समाज आज भी किसी भी खबर की सच्चाई जानने विस्तृत जानकारी प्राप्त करने और जागरूकता बढ़ाने में अखबार का सहारा लेते हैं।
भारत में पहले समाचार पत्र को हिक्कीज़ बंगाल गजट कहा जाता है। हिक्की का बंगाल गजट एशिया में प्रकाशित होने वाला पहला समाचार पत्र भी था। इसकी छपाई 29 जनवरी, 1780 को भारत की तत्कालीन राजधानी कलकत्ता में हुई थी। हिन्दी का प्रथम पत्र ‘उदंत मार्तंड’ का पहला अंक 30 मई 1826 को प्रकाशित हुआ था। भारत दुनिया का सबसे बड़ा अखबार बाजार है। आज हमारे यहाँ राजधानी दिल्ली से लेकर छोटे से गांव तक लाखों समाचार पत्र प्रकाशित होते है। समाचार पत्र समाज का आइना होता है। समाचार पत्र हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। इसके बिना जीवन में सम्पूर्णता नहीं हो सकती है। इसके बिना किसी समुदाय, आराधना या मानव गरिमा की स्थापना की कल्पना भी नहीं की जा सकती। समाचार पत्र दूरसंचार के महत्वपूर्ण माध्यमों में से एक है। रेडियो, टेलीविज़न और समाचार पत्र हमारे जीवन की विशेष ज़रूरतें है। समाचार पत्र का दैनंदिन जीवन में विशिष्ट स्थान है। हमारे प्रातःकाल की शुरुआत समाचार पत्र से होती है। सुबह की चाय के साथ समाचार पत्र मनुष्य के हाथ में न हो तो उनका दिन अच्छे से नहीं गुजरता है। पत्रकारिता आधुनिक युग की लेखन-विधाओं मे सर्वाधिक जीवन्त विधा है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में समाचार पत्र की स्वतंत्रता बुनियादी जरूरत है। मीडिया की आजादी का मतलब है कि किसी भी व्यक्ति को अपनी राय कायम करने और सार्वजनिक तौर पर इसे जाहिर करने का अधिकार है। प्रेस के सामने पहले भी चुनौतियां थीं और आज भी हैं। पत्रकारिता में निर्भीकता एवं निष्पक्षता होनी चाहिए। यह एक गम्भीर व कठिन विषय माना जाता है। पत्रकारिता की मर्यादा बनाये रखना सबकी नैतिक जिम्मेदारी है। भय और पक्षपात रहित पत्रकारिता के मार्ग में बड़ी चुनौतियां है। यह जोखिम भरा मार्ग है जिस पर चलना तलवार की धार पर चलना है। आज पत्रकारिता पर कई प्रकार का दवाब है। निष्पक्ष पत्रकारिता खण्डे की धार हो गयी है। मीडिया घरानों में विभक्त हो गयी है और घराने सत्ता के समक्ष नतमष्तक हो रहे है।
सत्य और तथ्य को बेलाग उद्घाटित करना सच्ची पत्रकारिता है। कलम में बहुत ताकत होती है, आजादी के दौरान पत्रकारों ने अपनी कलम के बल पर अंग्रेजों को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। प्रेस सरकार और जनता के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में अपनी महती भूमिका का निर्वहन करता है। प्रेस की चुनौतियां लगातार बढ़ती ही जा रही है। प्रेस को आंतरिक और बाहरी दोनों मोर्चों पर संघर्ष करना पड रहा है। इनमें आंतरिक संघर्ष अधिक गंभीर है। प्रेस आज विभिन्न गुटों में बंट गया है जिसे सुविधा के लिए हम पक्ष और विपक्ष का नाम देवे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की अपेक्षा आज भी लोग प्रिंट मीडिया को अधिक विश्वसनीय मान रहा है।
अखबार को आज चौतरफा खतरे का सामना करना पड़ रहा है। कहीं शासन के कोपभाजन का सामना करना पड़ता है तो कहीं राजनीतिज्ञों, बाहुबलियों और अपराधियों से मुकाबला करना पड़ता है। समाज कंटकों के मनमाफिक नहीं चलने का खामियाजा प्रेस को भुगतना पड़ता है। दुनिया भर में प्रेस को निशाना बनाया जा रहा है। रिपोर्टिंग के दौरान मीडियाकर्मी को कहीं मौत के घाट उतारा जाता है तो कहीं जेल की सलाखों की धमकियाँ दी जाती है। मीडिया पर भी आरोप है कि वह अपनी जिम्मेदारियों का सही तरीकें से निर्वहन नहीं कर पा रहा है। कहा जा रहा है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने हमारे सामाजिक सरोकारों को विकृत कर बाजारू बना दिया है। बाजार ने हमारी भाषा और रचनात्मक विजन को नष्ट भ्रष्ट करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। ऐसे में प्रेस की चुनौतियों को नए ढंग से परिभाषित करने की जरुरत है।
आज मीडिया के बेहतर फैलाव के बाद यह महसूस किया जा रहा है कि प्रेस की आजादी कायम रखी जाये मगर साथ ही जिम्मेदारी की भावना का भी निर्वहन किया जावे। समाज के कमजोर और पिछड़े तबके तक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुँचाया जावे। साम्प्रदायिकता और छदम साम्प्रदायिकता की सच्चाई से लोगों को अवगत कराया जाये। समाज के कमजोर और पिछड़े वर्गों तक सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुँचाया जावे। प्रेस की आजादी का मतलभ हमारे सामाजिक नव निर्माण से है। प्रेस को अपनी स्वतंत्रता कायम रखते हुए समाज के जन जागरण में अपनी भूमिका तलाशनी होगी। प्रेस की चुनौतियां व्यापक है जिसे चंद शब्दों में बांधा नहीं जा सकता। आवश्यकता इस बात की है की समाज में गैर बराबरी पर हमला बोल कर समता और न्याय का मार्ग प्रशस्त हो सके इसमें प्रेस के साथ हम सब की भलाई निहित है।

-बाल मुकुन्द ओझा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *