मीर तकी मीर : दर्द को शायरी बनाने वाला शायर

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-सुनील कुमार महला
3 फरवरी को साहित्यकार, उर्दू साहित्य के महानतम शायर मीर तकी मीर (1723–1810) का जन्मदिन मनाया जाता है।मीर तकी मीर सिर्फ़ ग़ज़ल के शायर नहीं थे, वे अपने समय की टूटी हुई रूह की आवाज़ थे।मीर उर्दू ग़ज़ल को शिखर तक पहुँचाने वाले बड़े कवि थे। पाठकों को बताता चलूं कि उन्हें ‘ख़ुदा-ए-सुख़न’ यानी कि शायरी का ख़ुदा/भगवान् कहा जाता है। उनकी शायरी में दर्द, मोहब्बत, तन्हाई और मानवीय संवेदना गहराई से झलकती है।उर्दू ही नहीं फ़ारसी भाषा पर भी उनकी मज़बूत पकड़ थी। मीर को उर्दू के उस प्रचलन के लिए याद किया जाता है जिसमें फ़ारसी और हिन्दुस्तानी के शब्दों का अच्छा मिश्रण और सामञ्जस्य हो। विकीपीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार उनका जन्म आगरा में तथा मृत्यु लखनऊ में हुई।मीर तक़ी मीर को उर्दू में शेर कहने का प्रोत्साहन अमरोहा के सैयद सआदत अली ने दिया। पाठकों को बताता चलूं कि उनका मूल नाम मोहम्मद तकी था।उनकी प्रमुख कृतियों की यदि हम यहां पर बात करें तो इनमें क्रमशः ज़िक्र-ए-मीर (आत्मकथा), कुल्लीयते-मीर (उर्दु रचनाओं के छह दीवानों का संग्रह), कुल्लीयते-फ़ारसी (फ़ारसी रचनाओं का संग्रह), फ़ैज़-ए-मीर (पाँच कहानियों का संग्रह), नुकत-उस-शूरा (फ़ारसी ज़बान में लिखी तत्कालीन उर्दु रचनाकारों की जीवनियाँ) आदि को शामिल किया जाता है। वैसे,वे ‘दर्द के शायर’ कहलाते हैं। दरअसल, मीर की ज़िंदगी मुफ़लिसी (गरीबी), अपनों को खोने के गम और दिल्ली की बर्बादी को देखने में गुजरी। यही वजह है कि उनकी शायरी में ‘हूक’ और ‘टीस’ महसूस होती है। उन्होंने खुद एकबार यह कहा था-‘मुझको शायर न कहो मीर कि साहब मैंने, कितने ग़म जमा किए तो दीवान किया।’ कहना ग़लत नहीं होगा कि दिल्ली के उजड़ने, परिवार की मौतों, गरीबी और बेघर होने ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया था। उनकी शायरी दरअसल आत्मकथा की पंक्तियाँ हैं। उनकी यह पंक्ति देखिए-‘पत्थर की भीत क्या करूँ, आँसू जो ढल गए।’ पाठकों को बताता चलूं कि नादिर शाह और अहमद शाह अब्दाली के हमलों के बाद दिल्ली उजड़ चुकी थी।मीर ने दिल्ली छोड़कर लखनऊ जाना तो स्वीकार किया, लेकिन वे वहाँ दिल से कभी बस नहीं पाए।मीर की सबसे बड़ी खूबी उनकी भाषा थी। वास्तव में, वे बहुत ही आसान शब्दों में दिल की गहरी बात कह देते थे। इसे तकनीकी भाषा में ‘सह़ल-ए-मुमत़ना’ कहा जाता है-यानी ऐसी चीज़ जो देखने में आसान लगे, पर उसे दोबारा लिखना नामुमकिन हो।महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब भी उनके कायल थे।सच तो यह है कि ग़ालिब ने मीर को अपना उस्ताद माना। ग़ालिब जैसे आत्मविश्वासी शायर ने कहा-‘ रेख़्ते के तुम ही उस्ताद नहीं हो ग़ालिब,कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था।’ वास्तव में यह मीर की श्रेष्ठता की सबसे बड़ी गवाही है। मोहब्बत की कैफियत को बयां करते हुए उन्होंने कहा था-‘इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या, आगे-आगे देखिए होता है क्या।’ ‘हस्ती अपनी हबाब की सी है, ये नुमाइश सराब की सी है।’,’नाज़ुकी उसके लब की क्या कहिए, पंखुड़ी एक गुलाब की सी है।’,’मीर उन नीम-बाज़ आँखों में, सारी मस्ती शराब की सी है।’ उनकी कुछ अमर पंक्तियों में से एक हैं। आत्मस्वीकृति के बारे में एक बार उन्होंने कहा था -‘शायर मुझमें और भी हैं, पर मीर का मुक़ाबला कौन करे।’ अंत में यही कहूंगा कि मीर सिर्फ़ उर्दू ग़ज़ल के शायर ही नहीं, बल्कि अपने समय के टूटे हुए समाज, उजड़ती दिल्ली और बिखरते इंसान की संवेदनाओं के सच्चे दस्तावेज़ हैं। उनकी शायरी में बनावटी सौंदर्य नजर नहीं आता है। वास्तव में उनकी शायरी जीवन के गहरे ज़ख़्मों से निकली हुई सच्चाई है। अपने जीवन में निजी दुख, मानसिक पीड़ा, गरीबी और उपेक्षा के बावजूद मीर ने उर्दू और फ़ारसी भाषा को आम आदमी के दिल तक पहुँचाया और ग़ज़ल को आत्मा की आवाज़ बना दिया। उनका दर्द रचना है। अन्य शायरों की तरह वे कभी शोर नहीं करते, बल्कि रचनाओं में फुसफुसाते हैं और उनकी वही फुसफुसाहट सदियों बाद भी पाठकों के दिल में उतर जाती है। इसलिए मीर को पढ़ना सिर्फ़ साहित्य का अनुभव नहीं, बल्कि इंसान होने का अनुभव है।

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