मासिक धर्म गरिमा का अधिकार है

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देश की सर्वोच्च अदालत ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में लड़कियों की शिक्षा, स्वास्थ्य और गरिमा के लिए एक बड़ा कदम उठाते हुए कहा है, मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। फैसले में मासिक धर्म को जीवन के अधिकार से जोड़ा गया। सभी स्कूलों में बायोडिग्रेडेबल सेनेटरी नैपकिन मुफ्त उपलब्ध करानी होंगी। राज्यों को 3 महीने में अनुपालन रिपोर्ट सौंपी जाएगी। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि देश भर के सभी स्कूलों चाहे वे सरकारी हों या निजी, शहरों में स्थित हों या ग्रामीण इलाकों में को लड़कियों के लिए उच्चतम सुरक्षा और स्वच्छता मानकों वाली बायोडिग्रेडेबल सेनेटरी नैपकिन मुफ्त में उपलब्ध करानी होंगी। यह फैसला लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने और सामाजिक कलंक को खत्म करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। कोर्ट ने जोर दिया कि मासिक धर्म स्वास्थ्य प्रजनन स्वास्थ्य और सुरक्षित जीवन का हिस्सा है, और इसकी कमी से अन्य अधिकार प्रभावित होते हैं।भारत में माहवारी को लेकर जागरुकता का अभाव है, जो स्वास्थ्य से संबंधित कई समस्याओं कारण बन सकता है. खासतौर से ग्रामीण इलाकों में रहने वाली महिलाओं में इसे लेकर कई तरह की भ्रांतियां देखने को मिलती हैं. संभवत: यही वजह है कि ग्रामीण इलाकों में अब तक सेनिटरी पैड के इस्तेमाल को लेकर बहुत कम जागरुकता है. हालांकि इसके पीछे एक कारण सेनिटरी पैड की लागत भी है। ग्रामीण इलाकों में रहने वाली हर महिला इसका खर्च नहीं उठा सकती। वे महिलाएं, जो अब भी पीरियड्स के दौरान परंपरागत चीजों का इस्तेमाल करती हैं, उनके लिए ये कदम बहुत फायदेमंद साबित होगा।
सैनिटरी नैपकिन का अर्थ है एक ऐसा सोखने वाला पैड जिसे मासिक धर्म के दौरान महिलाएं रक्त को सोखने के लिए अपनी पैंटी के अंदर पहनती हैं। महिलाएं और लड़कियां माहवारी के दौरान सेनिटरी नैपकिन का उपयोग करती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश की 255 मिलियन महिलाओं में से सिर्फ 12 फीसदी औरतें ही सैनिटरी पैड्स इस्तेमाल कर पाती हैं, जिसका कारण है इसकी देश की 70 फीसदी महिलाएं इसे खरीद में असमर्थ थी।
फेडरेशन ऑफ ऑब्सटेट्रक एंड गाएनाकोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया (एफओजीएसआई) के अनुसार देश की सिर्फ 18 फीसदी महिलाएं और लड़कियां ही माहवारी के दौरान सेनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं जबकि 82 फीसदी महिलाएं आज भी पुराना कपड़ा, घास और यहां तक कि राख जैसे अस्वच्छ एवं असुरक्षित विकल्प अपनाती हैं। आज भी देश में 71 फीसदी महिलाओं को अपने पहले पीरियड से पहले मासिक धर्म के बारे में कोई जानकारी नहीं होती।
आकड़ों की माने तो महिलाओं की जनसंख्या में दूसरे स्थान पर रहने वाले भारत में 82 प्रतिशत महिलाएं आज भी मासिक धर्म के दौरान पुराने कपड़े, सूखे पत्ते, लत्ते, सूखी घास, बुरादा और राख का इस्तेमाल करती हैं । माहवारी को लेकर आज भी भारत में जागरुकता का अभाव है। ऐसा खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में देखा जाता है क्योंकि वहां महिलाओं को इस बारे में अधिक जानकारी नहीं होती और दूसरा बड़ा कारण वह इसे लेने में असमर्थ भी हैं जिस वजह से वह परंपरागत चीजें ( जैसे कपड़ा घास राख) का इस्तेमाल करती है हालांकि अब सरकार द्वारा टैक्स फ्री किए जाने के बाद महिलाओं को काफी राहत मिलेगी और यह कदम फायदेमंद भी साबित होगा ।
महिलाओं की कई अन्य गंभीर बीमारियों और संक्रमण का कारण भी मासिक धर्म में अस्वच्छता और जागरुकता में कमी होना पाया गया है यही नहीं महिलाओं की कई अन्य गंभीर बीमारियों और संक्रमण का कारण भी मासिक धर्म में अस्वच्छता और जागरुकता में कमी होना पाया गया है इसी का परिणाम है कि आज देश में 23 फीसदी महिलाएं सर्वाइकल कैंसर की शिकार हैं और 27 फीसदी महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के लक्षण पाए गए हैं । जाहिर है कि कई महिलाएं और किशोर लड़कियां समाज के निम्नतम भाग से हैं, जहां गरीबी और पुरानी प्रथाओं के चलते माहवारी में स्वच्छता और स्वास्थ्य पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता. जिसके कारण वहां के परिणाम बेहद दयनीय और भयानक होते हैं ।
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में 48.5 प्रतिशत महिलाएं सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं जबकि शहरों में 77.5 प्रतिशत महिलाएं. कुल मिलाकर देखा जाए तो 57.6 प्रतिशत महिलाएं ही इसका इस्तेमाल करती हैं महावारी के दौरान महिलाएं जिन सैनिटरी पैड्स का इस्तेमाल करती हैं, वो अक्सर उसे सुरक्षित मान कर चलती है। सरकार ने इसके लिए मानक तय कर रखे हैं। इंडियन ब्यूरो स्टैंडर्स ने सैनेटरी पैड के लिए पहली बार 1980 में मानक तय किए, जिसमें समय-समय पर बदलाव भी किए गए हैं। सैनिटरी पैड का काम सिर्फ ब्लीडिंग को सोखना नहीं है सैनिटरी पैड का काम सिर्फ ब्लीडिंग को सोखना नहीं है. इसे हाइजिन के पैरामीटर पर भी खरा उतरना चाहिए। इसे हाइजिन के पैरामीटर पर भी खरा उतरना चाहिए। बाजार में बिकने वाले सैनिटरी पैड्स पूरी तरह सुरक्षित नहीं होते हैं. इनमें जिस प्लास्टिक शीट का इस्तेमाल किया जाता है वो कार्सिनोजेनिक हो सकता है ऐसे में इन पैड्स का इस्तेमाल खतरनाक हो सकता है। पैड्स पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि ये बायोडिग्रेबल नहीं होते हैं. साथ ही इन्हें इस्तेमाल करने के दौरान सबसे अधिक खयाल चेंज करने का रखना होता है. समय पर पैड चेंज नहीं करना संक्रमण को न्योता दे सकता है।

-बाल मुकुन्द ओझा

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