बाल मुकुंद ओझा
भगवान महावीर जयंती का पर्व इस वर्ष 31 मार्च को देश में मनाया जा रहा है। आज देश और दुनिया में सर्वत्र युद्ध, हिंसा, मारकाट, धार्मिक असहिष्णुता तथा नफरत का माहौल व्याप्त हो रहा है। लोग एक दूसरे के खिलाफ लड़ – मरने को तैयार है। रूस और उक्रेन का युद्ध अभी रुका ही नहीं है कि अमेरिका इजराइल – ईरान युद्ध ने समूची मानवता को लहूलुहान कर दिया है। युद्ध के इस साये में भगवान् महावीर की जयंती पर उनकी प्रेरणादायी शिक्षा और सन्देश का याद आना स्वाभाविक है। भगवान् महावीर के विचारों की प्रासंगिकता आज भी हमें नेकी के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। भगवान महावीर की जयंती पर हमें उनके बुनियादी सिद्धांतों अहिंसा, अनेकांत, अपरिग्रह, की याद दिलाती है, जिनपर चलकर मानव जाति की इन समस्याओं को हल संभव है। महावीर ने जाति, समुदाय, धर्म, रंग या क्षेत्र के आधार पर असमानता को दूर करने के लिए अनेकांत (अनेकता में एकता) का सिद्धांत प्रतिपादित किया था। इस दिन हमें भगवान महावीर के विचारों का गहन मंथन कर आत्मसात करने की जरुरत है। वे महान समाज सुधारक थे। उनके बताये मार्ग पर चलकर हम अपने समाज को शांति और भलाई का रास्ता दिखा सकते है।
महावीर स्वामी का जन्म दिवस चैत्र की शुक्ल त्रयोदशी को मनाया जाता है। जैन समुदाय के लिए महावीर जयंती का विशेष महत्व होता है। महावीर स्वामी जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान श्रीआदिनाथ की परंपरा में चौबीसवें तीर्थंकर हैं। महावीर स्वामी ने अहिंसा परमो धर्म सूत्र दिया। महावीर जयंती जैन समुदाय द्वारा भगवान महावीर के जन्म की खुशी में उत्सव के रूप में मनाते हैं। पंचशील सिद्धान्त के प्रर्वतक और जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर अहिंसा के प्रमुख ध्वजवाहकों में से एक है। भगवान महावीर ने पूरे समाज को सत्य और अहिंसा का मार्ग दिखाया। जैन समुदाय इस पर्व को उत्सव के तौर पर मनाते हैं।
मगवान महावीर ने हमेशा से ही दुनिया को अहिंसा और अपरिग्रह का संदिश दिया है। मोक्ष पाने के बाद, भगवान महावीर ने पांच सिद्धांत लोगों को बताए जो समृद्ध जीवन और आंतरिक शांति की ओर ले जाने वाले बताये जाते हैं। ये पांच सिद्धांत इस प्रकार हैं, पहला अहिंसा, दूसरा सत्य, तीसरा अस्तेय, चौथा ब्रह्मचर्य और पांचवा व अंतिम सिद्धांत है अपरिग्रह। इसी तरह किंवदंती है कि महावीर जी के जन्म से पूर्व उनकी माता जी ने 16 स्वप्न देखे थे जिनके स्वप्न का अर्थ राजा सिद्धार्थ द्वारा बतलाया गया है। महावीर स्वामी अहिंसा के पुजारी थे उनका मानना था कि इस दुनिया में जितने भी जीव है उन पर कभी भी हिंसा नहीं करनी चाहिए। भगवान महावीर का कहना है कि मनुष्य को कभी भी असत्य का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए। मनुष्य को सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए। महावीर स्वामी ने ब्रह्राचर्य के बारे में बताया है कि उत्तम तपस्या,ज्ञान ,संयम और विनय ब्रह्राचर्य की जड़ है।
जैन मान्यताओं के अनुसार उनका जन्म बिहार के कुंडलपुर के राज परिवार में हुआ था। भगवान महावीर का बचपन का नाम वर्धमान था। कहा जाता है कि इन्होंने 30 साल की उम्र में घर छोड़ दिया और दीक्षा लेने के बाद 12 साल तपस्या की। दीक्षा लेने के बाद महावीर 12 साल तक तपस्या की। भगवान महावीर के दर्शन के लिए भक्तों को उनके सिद्धांतों का पालन करना जरूरी होता है। महावीर स्वामी सबसे बड़ा सिद्धांत अहिंसा है। यही नहीं उनके हर भक्तों को अहिंसा के साथ, सत्य, अचौर्य, बह्मचर्य और अपरिग्रह के पांच व्रतों का पालन करना आवश्यक होता है। जैन ग्रंथों के अनुसार, 23 वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ जी के निर्वाण प्राप्त करने के 188 वर्ष बाद भगवान महावीर का जन्म हुआ था। अहिंसा परमो धमर्रू अर्थात अहिंसा सभी धर्मों से सर्वोपरि है। यह संदेश उन्होंने पूरी दुनिया को दिया व संसार का मार्गदर्शन कियाद्य पहले स्वयं अहिंसा का मार्ग अपनाया और फिर दूसरों को इसे अपनाने के लिये प्रेरित कियाद्य जियो और जीने दो का मूल मंत्र इन्हीं की देन हैद्य महावीर के सिद्धांत में समर्पण का भाव सबसे अहम था। उनका मानना था कि मांग कर, प्रार्थना करके या हाथ जोड़कर धर्म को हालिस नहीं किया जा सकता। महावीर मानते थे कि धर्म को खुद धारण करना चाहिए, इसे किसी से मांगकर हासिल नहीं किया जा सकता। धर्म जीतने से मिलता है, जिसके लिए संघर्ष करना पड़ता है। महावीर अहिंसा के पुजारी थे उनका मानना था कि इस दुनिया में जितने भी जीव है उन पर कभी भी हिंसा नहीं करनी चाहिए।
बाल मुकुन्द ओझा



