-डॉ. निर्मल सुवासिया
महात्मा ज्योतिबा फुले महाराष्ट्र के एक क्रांतिकारी विचारक, शिक्षक और समाज सुधारक थे जिन्होंने 19वीं सदी में शिक्षा में असमानता, जाति-व्यवस्था, स्त्री-अधिकार और किसान-समस्या के खिलाफ सबसे बड़ी लड़ाई लड़ी। 11 अप्रैल 1827, पुणे के गोविंदराव और चिमणाबाई फुले के घर ‘माली’ जाति में ज्योतिबा का जन्म हुआ। बचपन में मां का साया उठ गया। पिता फूलों का व्यवसाय करते थे, इसलिए ‘फुले’ कहलाए। पिता ने पहले स्कूल से निकालकर खेत पर लगाया गया, लेकिन कुछ अंग्रेज़ अफसरों और पड़ोसियों के कहने पर पिता ने दोबारा स्कॉटिश मिशन स्कूल, पुणे में भेजा। वहीं पर ज्योतिबा ने थॉमस पेन की ‘राइट्स ऑफ मैन’ पढ़ी, जिससे प्रभावित होकर फुले ने समानता के विचार को अपनाया। 1840 में सावित्रीबाई से ज्योतिबा का विवाह हुआ। सावित्रीबाई को उन्होंने खुद घर पर पढ़ाया और बाद में शिक्षिका बनाया। यह तत्कालीन समय में स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम था। दलितों-लड़कियों के लिए स्कूल खोलने पर पिता ने घर से निकाल दिया, ब्राह्मणों ने बहिष्कार किया, रास्ते में गोबर-पत्थर फेंके गए, फिर भी ज्योतिबा डटे रहे और समाज के सुधार हेतु अनेक प्रयास किए।
1. भारत में स्त्री शिक्षा की नींव – 1848 में पुणे के भिड़ेवाड़ा में लड़कियों का पहला स्कूल खोला। सावित्रीबाई फुले भारत की पहली प्रशिक्षित महिला शिक्षिका बनीं। लड़कियों को पढ़ाने पर उन्हें ‘धर्म-विरोधी’ कहा गया। सावित्रीबाई स्कूल जाते समय अतिरिक्त साड़ी ले जाती थीं क्योंकि लोग उन पर गोबर फेंकते थे।
2. अछूतों (दलितों) के लिए शिक्षा – 1848 में ही महार-मांग जाति के बच्चों के लिए अलग स्कूल खोला। उस समय सरकारी स्कूलों में दलितों को प्रवेश नहीं था। ज्योतिबा का प्रसिद्ध वाक्य: “विद्येविना मति गेली, मतीविना नीति गेली, नीतीविना गती गेली” (अर्थात – बिना विद्या बुद्धि नहीं, बिना बुद्धि नीति नहीं, बिना नीति प्रगति नहीं) उनके सामाजिक सुधारों का प्रेरणास्रोत बना।
3. सत्यशोधक समाज (24 सितंबर 1873)
ज्योतिबा फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना कर सामाजिक सुधार के आंदोलन को और मजबूत किया। यह पहला ऐसा संगठन था जिसने ब्राह्मण-पुरोहित, जाति-व्यवस्था और कर्मकांड को सीधे चुनौती दी। इस संगठन के जरिए बिना ब्राह्मण के ‘सत्यशोधक विवाह’ कराना, विधवा पुनर्विवाह, जाति-भेद के खिलाफ प्रचार मुख्य उद्देश्य रहे। फुले ने नारा: ‘एक धर्म, एक जाति, एक ईश्वर’ – यानी मानवता ही धर्म है, के माध्यम से अपने मंतव्य को स्पष्ट कर दिया।
4. बाल-हत्या प्रतिबंधक गृह (1863) – तत्कालीन समय में विधवाओं के साथ जबरदस्ती से पैदा हुए बच्चों को मार दिया जाता था। फुले दंपति ने भारत का पहला ऐसा घर खोला जहां विधवाएं सुरक्षित प्रसव करा सकें। एक विधवा ब्राह्मणी के बच्चे यशवंत को गोद लिया और पाला जो समाज के लिए बड़ा संदेश था।
5. पानी सत्याग्रह की शुरुआत – 1868 में अपने घर का कुआं दलितों के लिए खोल दिया। उस समय सार्वजनिक कुएं पर दलित पानी नहीं भर सकते थे। ये आंबेडकर के महाड़ सत्याग्रह (1927) से 60 साल पहले की घटना थी।
6. किसान और शोषण पर लेखन – अपनी पुस्तक ‘गुलामगिरी’ (1873) को अमेरिका के काले गुलामों को समर्पित किया। इसमें लिखा कि भारत में शूद्र-अतिशूद्र ‘जाति’ के नाम पर गुलाम बनाए गए हैं। ‘शेतकऱ्याचा आसूड’ में साहूकार, सरकार, पुरोहित तीनों को किसान की बदहाली का जिम्मेदार बताया।
फुले कर्मकांड, मूर्तिपूजा, जाति-व्यवस्था और ब्राह्मणवादी वर्चस्व के कट्टर विरोधी थे। वे मानते थे कि शिक्षा और तर्क ही समाज को बदल सकते हैं। उनका नारा था – ‘शिक्षा ही स्त्री और शूद्रों की मुक्ति का रास्ता है।’ फुले का काम सिर्फ सुधार नहीं था, बल्कि पूरी व्यवस्था को चुनौती देना था। इसलिए आज भी उन्हें बहुजन आंदोलन का जनक माना जाता है। ज्योतिबा फुले ने शिक्षा को हथियार बनाया।1888 में मुंबई में बहुजन समाज ने उन्हें ‘महात्मा’ कहकर संबोधित किया। वह तत्कालीन समय के शिक्षा, समानता और इंसानियत की लड़ाई में सबसे बड़े पुरोधा थे। ज्योतिबा फुले की मृत्यु 28 नवंबर 1890, पुणे में पक्षाघात से हुई।



