जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय का 22वां दीक्षांत समारोह आयोजित— भारतीय ज्ञान परंपरा, बेटियों की उपलब्धियों और एआई युग में विवेकपूर्ण शिक्षा पर दिया बल, “ज्ञान को कर्म में बदलें, यही दीक्षांत का सच्चा संदेश”— राज्यपाल

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जयपुर। राज्यपाल एवं कुलाधिपति श्री हरिभाऊ बागडे ने कहा कि दीक्षांत शिक्षा का अंत नहीं, बल्कि जीवन के नए चरण की शुरुआत है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे अर्जित ज्ञान को कर्म में बदलते हुए राष्ट्र निर्माण में सहभागी बनें। राज्यपाल ने कहा कि जिस समाज में बेटियां आगे बढ़ती हैं, वही समाज तेजी से विकास करता है—यह गर्व का विषय है कि आज स्वर्ण पदकों में बड़ी संख्या में बेटियां अग्रणी रही हैं। राज्यपाल श्री बागडे गुरुवार को जोधपुर में जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय के 22वें दीक्षांत समारोह में संबोधित कर रहे थे। राज्यपाल ने भारतीय ज्ञान परंपरा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत की शिक्षा परंपरा सदियों से समग्र विकास, नैतिक मूल्यों और आत्मबोध पर आधारित रही है। उन्होंने कहा कि हमारे वेद, उपनिषद और गुरुकुल प्रणाली ने केवल विद्या नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण की शिक्षा दी है। विश्वविद्यालयों का दायित्व है कि वे आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा का समन्वय करें। इससे विद्यार्थी केवल कुशल पेशेवर ही नहीं, बल्कि संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनेंगे। उन्होंने आह्वान किया कि युवा अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हुए वैश्विक मंच पर भारत का नेतृत्व करें।उन्होंने कहा कि आज का युग सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के साथ-साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता का है। नई शिक्षा नीति के अंतर्गत ‘बोधन एआई स्टैक’ जैसी पहल शिक्षा के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को सुदृढ़ करेगी, जिससे विद्यार्थियों को अपनी भाषा में इंटरएक्टिव शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध होगी। साथ ही उन्होंने आगाह किया कि एआई मानव मस्तिष्क का स्थान नहीं ले सकती, इसे संदर्भ के रूप में उपयोग करें, पर बौद्धिक क्षमता का विकास स्वयं करें। उन्होंने “राष्ट्र प्रथम” की सोच के साथ जीवन का ध्येय निर्धारित करने और “विकसित भारत 2047” के संकल्प को साकार करने का आह्वान किया। समारोह में कुल 52,682 विद्यार्थियों को स्नातक, स्नातकोत्तर एवं शोध उपाधियां प्रदान की गईं तथा 59 स्वर्ण पदक वितरित किए गए।

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